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Tuesday, June 6, 2017

मन्त्र

ज़िद ऐसी की वज़ूद भूल जाते है,
सारे नियम,कायदे,वसूल भूल जाते है,
मंजिल उन्हें मिलती है,
जो मंजिल पर पहुँचने की चाह में,
असफल हो लौटने की राह भूल जाते है। @मनोरंजन

तड़प

कुछ बनने की तड़प बहुत सालों से मन को बेचैन कर रखा था,
अब लग रहा है,
कुछ बन रहा हूँ,
फ़िलहाल पशु से इंसान बनने की प्रक्रिया जारी है,
देखते है सफलता मिलती है या नहीं। @ मनोरंजन 

Friday, June 2, 2017

फिल्म #हिंदीmedium
मार्केटिंग वह चीज़ है जो गंजे को कंघी बेच दे। " कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा" यह लाइन एक मार्केटिंग स्ट्रैटजी थी, क्योंकि पहली फिल्म को देख कर ही पता चल गया था कि कटप्पा को राजमाता ने ऐसा करने को कहा होगा। क्यों कहा होगा यह भी साफ़ था, बाहुबली के सामान पराक्रमी उसका भाई भल्लाल देव राज सिंघासन के लिए लालायित था और उसका पिता उसको हर हाल में राजा बनाना चाहता था। फिल्म की कहानी कथानक में ऐसा कुछ भी नहीं था जिसे हमने/आपने पहले पढ़ा/ देखा/ सुना न हो। मगर फिल्म की  मार्केटिंग जबरदस्त थी, यही कारण है कि फिल्म " बाहुबली -2 " सभी रिकार्डों को तोड़ते हुए हिंदुस्तान की अब तक की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन गई।  फिल्म ने कितना कमाया इससे मतलब नहीं है, फिल्म बनी ही थी एक " प्रोजेक्ट" की तरह, "प्रोडक्ट" की तरह तो बिकी भी "प्रोडक्ट" की तरह मगर जिस तरह से प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति जैसे पदों पर असिन लोगों ने, मंत्रियों ने, नेताओं ने, बुद्धिजीवियों ने, लेखकों ने अपने जुबानों से/अपने कलम से "बाहुबली-2 " फिल्म के कसीदे काढ़े, यह फिल्म उस लायक नहीं है। फिल्म भव्य है मगर भव्य तो सलमान खान की " प्रेम रतन धन पायो" भी थी। फिल्म "बाहुबली -2 " को, इसके नायक प्रभास को, निर्देशक राजमौली को हमारे प्राचीन हिन्दू सम्राटों के सवाहक बनाया गया और हर जुबां में/बच्चे - बच्चे के दिमाग में इनके नाम को घुसेड़ा गया। प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति जैसे पदों पर असिन लोगों /मंत्रियों / नेताओं /बुद्धिजीवियों / लेखकों  के  जुबानों से/कलम से अगर किसी फिल्म की चर्चा होनी चाहिए तो वह फिल्म #हिंदीmedium है। इस फिल्म में प्राचीन भारतीय समाज/हिन्दू सम्राट कितने गौरवशाली थे, इसका उल्लेख तो नहीं है मगर वर्तमान के भारतीय समाज के समस्यायों को उभार कर दिखाया गया है। फिल्म #हिंदीmedium में एक तरफ तो हिंदी भाषा के दिनों-दिन होते जा रही पतन को दिखने की कोशिश की गई है वहीं शिक्षा व्यवस्था  में व्याप्त धंधेबाजी/घपलेबाजी/दुकानदारी को साफ़-साफ़ हूबहू दिखाया है, जिसे हममें से अधिकांश लोगों से समय-समय पर अनुभव किया है। फिल्म वर्तमान शिक्षा व्यवस्था को सुधारने की पहल भी करती है। जब किसी अमीर व्यक्ति का बच्चा सरकारी स्कूल जाने लगेगा तो देश के सरकारी स्कूलों का काया पलट हो जायेगा, साथ ही देश की शिक्षा व्यवस्था भी पटरी पर आ जाएगी। इसके लिए कुछ संपन्न लोगों/सरकारी अधियकारियों/नेताओं/बुद्धिजीवियों को  आगे बढ़ कर पहल करने  की जरूरत है।  इलाहबाद हाईकोर्ट ने शिक्षा सुधार के लिए इसी कदम की पैरवी की।  पूरा देश वर्तमान शिक्षा व्यवस्था के समस्या से ग्रस्त है, सबलोग इसमें सुधार करने की जरूरत की वकालत कर रहे है। मगर पहल कोई नहीं करना चाहता। पहल करना तो दूर की बात है, अगर कोई साहित्य/कला द्वारा इस पहल करने को उत्साहित किया जा रहा है तो हम इस प्रयास को भी ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाने की कोशिश नहीं कर रहे है। हम  प्राचीन भारतीय गौरव गाथा के गुणगान में वर्तमान भारतीय जनमानस के मौलिक समस्यायों की आवाज को दबा देना चाहते है।  अगर ऐसा नहीं होता तो प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति जैसे पदों पर असिन लोगों /मंत्रियों / नेताओं /बुद्धिजीवियों / लेखकों  के  जुबानों से/कलम से #हिंदीmedium फिल्म की चर्चा होनी चाहिए थी। @ मनोरंजन 

समर्पण
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जब भी देखा तुम्हारा तमतमाया चेहरा ही देखा,
तुम्हारे आँसुओं को कभी ना देखा,
अगर देख लेता तो जल कर राख हो जाता,
पर देखा नही, तुम्हारी बेबसी, तुम्हारी सादगी,
जब भी देखा, सिर्फ़ तुम्हारे बहानों को देखा,
तुम्हारी बेरुखी, तुम्हारे अभिमान को देखा,
कभी तुम्हारी चाहत को,
तुम्हारी तमन्नाओ को/ तुम्हारी आरज़ू को नही देखा,
कभी दिखा ही नही मुझे तुम्हारी चंचलता,
चहकना खुशी से, हर छोटी-छोटी बातों पर,
तब भी नही, जब तुम सुना रही थी,
अपने पहले शो का स्क्रिफ्ट मुझे,
तब भी नही जब पूछती हर छोटी-छोटी बातें मुझसे,
तब भी मैने सिर्फ़ इतना समझा,
बना रही हो हर कदम बुद्धू मुझे,
कोई लड़की क्यूँ गैरों के साथ बैठ,
सुनाएगी अपनी गाथा?
क्यूँ चल पड़ेगी कहीं भी,
कभी भी बीना कोई परवाह किए,
ऐसे तो कभी सोचा ही नही,
ये भरोशा ही तो था तुम्हारा मुझ पर?
तुम मुझ पर स्नेह रखती हो/ विश्वास करती हो,
इसका और क्या सबूत हो सकता था?
कभी समझा ही नही, तुम्हारे विश्वास को/तुम्हारे एहसास को,
तुम्हारी उदारता, तुम्हारी आत्मीयता,
कि हर कदम करती हो एहसान मुझ पर,
मगर मेरा पुरूष दंभ हर वक्त करता रहा एहसान तुम पर,
हर वक्त उबलते रहा, अपमान से/ अज्ञान से,
तड़पते रहा तुम्हारी बेरुखी से/तुम्हारी दूरी से,
जलते रहा हर वक्त क्रोध में/कम-पिपसा कीआग में,
उठाते रहा हर वक्त सवाल तुम्हारे समर्पण पे/ तुम्हारी बफा पे,
रौंदते रहा हर वक्त तुम्हारे गरूर को/ तुम्हारे स्त्री स्वाभिमान को,
जाना नही कभी भी कि
कब के समर्पित कर चुकी हो अपना सब कुछ मुझे,
मैं ही अभगा दे सका तुम को कुछ भी@मनोरंजन