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Saturday, July 22, 2017

बंजर खेत

बंजर खेत 
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जिस खेत में ख़ूबसूरत कविताएं 
उगाने का प्रयत्न कर रहा हूँ,
वो बंजर पड़ा है ना जाने कब से,
आँसुओं के खरापन और लहू से दागदार,
इस खेत को उर्वर बनाना असान नहीं,
पर बड़ी तन्मयता से जुटा हुआ हूँ,
खरोच रहा हूँ इसकी हर तह को,
नई मिट्टी निकालने मे लगा हुआ हूँ,
हर बार नये उत्साह और उम्मीद से शुरू करता हूँ,
मगर पैवस्त हो गई है बंजरापन इस कदर इस खेत में,
कि निराशा ही हाथ लगती है हर बार,
जहाँ पहुँच कर मिलती है
कविताओं के लिये माकूल परिवेश,
वहां पहुँचने से पहले ही
मेरी कमजोरियाँ मुझे निढ़ाल कर देती है,
और इसतरह अधूरी रह जाती है,
कविताओं के फ़सल बोने की वह चाह,
जो सोने नहीं देती मुझे रातभर चैन से।@ मनोरंजन

विवाहेतर संबंध क्यों ?


विवाहेतर संबंध क्यों ?
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संवेदना और भावनाएं जैसी फिल्मों में दिखती है,
असल जिंदगी में वैसी नहीं दिखती,
एक अच्छी तरह से चित्रित फिल्म में,
जिस तरह एक प्रेमिका अपने प्रेमी को देखती है,
ना तो वैसी आँखें हमें देखने को मिलती है, ना वैसी संवेदना,
या शायद हममें से अधिकांश लोग
अपने जीवन में उस साथी मिल ही नहीं पाते,
जिसके नज़रों में हमारे लिये गहरा प्रेम और संवेदना हो,
किसी और को दोष देने का कोई मतलब नहीं,
हम खुद भी अपने जीवन साथी के साथ उस तरह नहीं जुड़ पाते,
जीवन की उबड़-खाबड़ राहें, जरूरतें और मजबूरियां,
हमारे अस्तित्व को भौतिक, दैहिक और भूगौलिक सीमाओं में बांध लेती है,
फिर संवेदनाएँ गौण हो जाती है, और जरूरतें हावी हो जाती है,
अक्सर संवेदनाएँ दर्द से जन्म लेती है,
दर्द मिलने और बिछड़ने का,
खोने और पाने का,
जैसे हम अपने किसी दोस्त या प्रेमी/प्रेमिका के
बिछड़ जाने पर  महसूस करते है,
वैसी ही कशिश/ बेचैनी अपने मन में पत्नी के लिए नहीं रख पाते,
जिन रिश्तों में दर्द होता है,वहाँ संवेदनाएँ परिलक्षित होती है,
तो अगर सीधे-सरल शब्दों में कहें तो दर्द,
रिश्तों में गहराई लाता है,
और रिश्ते को सुदृढ़ करने,
सपाटपन जिंदगी को ऊब से भरने वाला,
चिड़चिड़ा बनाने वाला होता है,
इस दर्द की चाह, इस कशिश/बेचैनी की चाह ही,
भौतिक, दैहिक और भूगौलिक सीमाओं से परे जाकर प्रेम करने को प्रेरित करता है,
क्या ये सच नहीं है कि,
ज्यादातर संवेदनशील लोग इसी दर्द को पाने और,
भौतिक और भूगौलिक सीमाओं से परे जाकर प्रेम करने की चाह में,
हर वक्त मन ही मन, कोई ऐसे शख्स को ढूंढते रहते है,
जो उनके इस चाहत को पूरा कर सके?@ मनोरंजन

Friday, July 21, 2017

सामाजिक कुत्तें

सामाजिक कुत्तें
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सायं ढलने लगी है,
एक पार्क है,
उसके बगल से गुजर रहा हूँ,
अत्यंत ही मनोरम और शांत वातावरण है,
सिर्फ दो-चार पंक्षियों के चहचहाने से,
नीरवता भंग नहीं होती,
बल्कि एक संगीत सा लगता है,
मन में कुछ विचारों की शृंखलाएँ चल रही है,
मेरे मन में संगीत की कोई नई धुन आकार ले रही है,
मैं बार-बार इसे गुनगुना रहा हूँ,
और आनंद के उत्कर्ष को महसूस कर रहा हूँ,
कि तभी पीछे से कुछ कुत्ते भौंकते हुए,
टूट पड़ते है मुझ पर,
मेरा संगीत बिखर जाता है,
विचारों के शब्द तीतर-बितर हो जाते है,
भय से आक्रांत,
मेरी साँसे कुछ पल के लिए ठहर जाती है,
कुत्ते जा चूके है,
मैं ठीक से साँस लेने लगा हूँ,
मगर जब अपने हृदय के अंदर झाँकता हूँ तो,
वहाँ से वे सारे शब्द/संगीत गायब हो चूके होते है,
सिर्फ खोखलापन/सन्नाटापन पसरा हुआ है,
मेरी आँखों से अनायास ही आँसू बहने लगता है,
यह एक सपना है,
जो कल रात मैंने देखी थी,
वास्तविक जीवन में भी,
अक्सर ऐसे कुत्तों से हमारा/आपका सबका पड़ता होगा,
जो हमारे जीवन के हर संगीत को,
विचारों के हर शब्द को तीतर- बितर करने में लगे है,
हम ऐसे कुत्तों से बहुत त्रस्त है,
हमें ऐसे कुत्तों से बचावो कोई। @ मनोरंजन