विवाहेतर संबंध क्यों ?
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संवेदना और भावनाएं जैसी फिल्मों में दिखती है,
असल जिंदगी में वैसी नहीं दिखती,
एक अच्छी तरह से चित्रित फिल्म में,
जिस तरह एक प्रेमिका अपने प्रेमी को देखती है,
ना तो वैसी आँखें हमें देखने को मिलती है, ना वैसी संवेदना,
या शायद हममें से अधिकांश लोग
अपने जीवन में उस साथी मिल ही नहीं पाते,
जिसके नज़रों में हमारे लिये गहरा प्रेम और संवेदना हो,
किसी और को दोष देने का कोई मतलब नहीं,
हम खुद भी अपने जीवन साथी के साथ उस तरह नहीं जुड़ पाते,
जीवन की उबड़-खाबड़ राहें, जरूरतें और मजबूरियां,
हमारे अस्तित्व को भौतिक, दैहिक और भूगौलिक सीमाओं में बांध लेती है,
फिर संवेदनाएँ गौण हो जाती है, और जरूरतें हावी हो जाती है,
अक्सर संवेदनाएँ दर्द से जन्म लेती है,
दर्द मिलने और बिछड़ने का,
खोने और पाने का,
जैसे हम अपने किसी दोस्त या प्रेमी/प्रेमिका के
बिछड़ जाने पर महसूस करते है,
वैसी ही कशिश/ बेचैनी अपने मन में पत्नी के लिए नहीं रख पाते,
जिन रिश्तों में दर्द होता है,वहाँ संवेदनाएँ परिलक्षित होती है,
तो अगर सीधे-सरल शब्दों में कहें तो दर्द,
रिश्तों में गहराई लाता है,
और रिश्ते को सुदृढ़ करने,
सपाटपन जिंदगी को ऊब से भरने वाला,
चिड़चिड़ा बनाने वाला होता है,
इस दर्द की चाह, इस कशिश/बेचैनी की चाह ही,
भौतिक, दैहिक और भूगौलिक सीमाओं से परे जाकर प्रेम करने को प्रेरित करता है,
क्या ये सच नहीं है कि,
ज्यादातर संवेदनशील लोग इसी दर्द को पाने और,
भौतिक और भूगौलिक सीमाओं से परे जाकर प्रेम करने की चाह में,
हर वक्त मन ही मन, कोई ऐसे शख्स को ढूंढते रहते है,
जो उनके इस चाहत को पूरा कर सके?@ मनोरंजन
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