मरे हुए हम
नहीं, बल्कि मरे
हुए तो आप लोग है
जो हमें मरा
हुआ समझते है
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प्रश्न: क्या करते
हो ?
जवाब मिला : अपने
बच्चों का पालन पोषण करता
हूँ।
प्रश्न: हाँ ठीक
है,वो तो सब लोग
करते है, और क्या करते
हो?
जवाब मिला : बस
जी, मुझे इससे
ही फुरसत नहीं
मिलती
प्रश्न: आरे
भाई, पढ़े-लिखे
हो, नौकरी करते
हो, काम करते
हो, बच्चों के
पालन-पोषण के अलावा भी
तुम्हारी अपनी जिंदगी
होनी चाहिए ना?
जवाब मिला: हमारे
माँ-बाप,दादा-दादी,परदादा-परदादी सभी
यही काम करते
रहे, अपने बच्चों
का सामर्थ अनुसार
अच्छे-से अच्छे
तरीके से पालन-पोषण, और
वो लोग बहुत
खुश रहते थे,
खूब ठठाकर हँसते
थे, स्वस्थ जीवन
जीते थे, उन्मुक्त
और आनंद जीवन
जीते थे, अपने
सभी गुण- संस्कार
वे अपने बच्चों
को देते गए,
मुझमें उनका ही संस्कार है, इसके
अलावा तो उन्हें
कुछ और करते हुए ना
मैंने देखा ना सुना है।
प्रश्न: अज़ीब घनचक्कर
आदमी हो यार !
तो अब इस इक्कीसवीं सदी में तुम अपने
बाप-दादा के संस्कारों वाली जिंदगी
जिवोगे? दुनिया कहाँ
से कहाँ पहुँच
गई अब, कुछ सोशल नेटवर्क-
सेटवर्क ,फेसबुक-व्हाट्सअप
करते हो या नहीं ?देश-दुनिया में
क्या-क्या चल रहा है,
कुछ खबर रखते
हो या नहीं?
जवाब मिला : नहीं।
प्रश्न : क्या नहीं
? आरे अपने विचारों
का आदान -प्रदान
कहीं करते हो की नहीं?
कुछ लिखते-पढ़ते
हो कि नहीं?
जवाब मिला : बोल
तो रहा हूँ,
मुझे अपने बच्चों
से ही फुरसत
नहीं मिलती वैसे
भी विचार मेरे
अभिव्यक्त करने लायक
नहीं होते है,
सुबह बच्चों को
स्कूल छोड़ने जाता
हूँ, कभी लेट हो जाता
है तो मैडम डांट लगाती
है, मैं मुस्कुरा
देता हूँ, फिर
घर आकर ऑफिस
जाने के लिए तैयार होता
हूँ, सुबह के भागा-दौड़ी
से कभी पत्नी
की कमर अकड़ जाती है
तो खुद ही नाश्ता निकाल
कर खा लेता हूँ, दौड़ते-भागते ऑफिस
पहुँचता हूँ, वहाँ
अपना काम करता
हूँ, कुछ दोस्त
है उनके साथ
गपसप -हँसी -मजाक
कर लेता हूँ,
बॉस आम को महुआ और
महुआ को आम कहने को
बोलता है तो बोल देता
हूँ, डांटे तो
दांत निपोर देता
हूँ,सायं को घर पहुँचने
की जल्दी रहती
है, एक बाजू के कंधे पर
पाँच किलो का लैपटॉप का
बैग,और दोनों
हाथों में राशन-सब्जी के
थैले लेकर एक किलोमीटर
पैदल चल कर घर पहुँचता
हूँ। दो बच्चे
है मेरे, दोनों
इतने उधम मचाते
है कि सायं को सात
बजे तक पत्नी
बिल्कुल पस्त हो चुकी होती
है या हो सकता है
मुझे देखते ही
उन्हें सर दर्द होने लगता
हो, दोनों ही
हालत में मुझे
तुरंत बिना कपड़े
बदले ही दोनों
बच्चों को पार्क में
जाना पड़ जाता है।
फिर आधा-एक
घंटे के बाद आता हूँ
तो बच्चों को
होमवर्क करवाता हूँ,खाना खाता
हूँ, और पत्नी
टीवी पर जो कुछ देख
रही होती है,उसे देखते
हुए सो जाता हूँ।
प्रश्न: आरे यार
तुम तो बिल्कुल
ही मरे हुए लोग हो,
ऐसी जिंदगी जीने
से तो मर जाना बेहतर
है, तुम्हारे आस-पास क्या
हो रहा है,इसकी तुम्हे
कोई परवाह नहीं
? देश-दुनिया में
क्या हो रहा है, इसकी
कोई परवाह नहीं
तुम्हे? देश में कैसे-कैसे
नफ़रत के जहर फैलाये जा
रहे है, तुम्हे
इससे कोई फर्क
नहीं पड़ता? भीड़
द्वारा कई लोगों
की हत्यायें हो गई,
उनके प्रति कोई
संवेदना नहीं है तुम्हारे मन में? आडवाणी जी
बेचारे जिस पार्टी
को खड़े किये,
उसी पार्टी में
उन्हें मार्गदर्शक मंडल
में डाल दिया
गया, एक राष्ट्रपति
बन जाने की उम्मीद थी
वह उम्मीद की
थाली भी
उनके सामने से
खींच ली गई, बुजुर्गों का ऐसा अपमान देख
कर तुम्हारे मन में कोई
आवाज़ नहीं उठती?
देश राष्ट्रवाद के
उन्मांद में उफन रहा है
और सरकारी अस्पतालों
में ऑक्सीजन की
कमी से दर्जनों
बच्चें मर रहे है कोई
फर्क नहीं पड़ता
तुम्हे ?सरकारी स्कूलों
में बच्चों
को सिर्फ
मिड-डे मिल खिलाने, ड्रेस के
पैसों के हिसाब-किताब रखने
के लिए लाखों
शिक्षकों को करोड़ों
रूपया दिया जा रहा है,
क्या इनमें से
कुछ भी तुम्हारे
दिमाग को नहीं झकझोरता है ?
जवाब मिला : देखिये
जहाँ तक सरकार
के काम-काज से जुडी
हुई बातें है,
उसके बारे में
मेरा मत यह है कि
सरकारें ऐसे ही काम करती
है, हमारे आवाज़
उठाने-आंदोलन करने
से क्या हो जायेगा? यह सरकार
चली जाएगी, दूसरी
पार्टी की सरकार
आ जाएगी। और
यह सब तो होता भी
रहता है लेकिन सच्चाई
यह है कि सरकारें देश की जनता के
जीवन को बेहतर
बनाने के लिए काम नहीं
करती है, सरकारें
देश की समस्याओं
को/ विसंगतियों को
दूर करने के लिए काम
नहीं करती है बल्कि सरकारें
उन समस्यायों/विसंगतियों
को अपने राजनीतिक
स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करने के लिए काम
करती है।
आज राष्ट्रवाद का
उन्माद है, तो पिछले साठ
-सत्तर साल से भी ऐसे
ही कई उन्माद
राजनीतिक पार्टियों को सत्ता
तक पहुँचते रहे
है। इनमें गाँधी
जी/नेहरू जी का
नाम आजादी दिलाने
वाले नायकों के
रूप में
परोस कर मीठा उन्माद फैलाया
जाता रहा, सत्ता
मिलती रही, दूसरी
आज़ादी, मंडल-कमंडल
/आरक्षण का
उन्माद, मुस्लिमों की
जिंदगी को नारकीय
बनाये रखते हुए
उन्हें अपने वोट
बैंक बनाने का
उन्माद, ये सारे उन्माद सत्ता
तक पहुंचाती रही
विभिन्न पार्टियों को,
हमें सरकार के
द्वारा /शासन-प्रशासन
द्वारा किसी
भी अच्छे-बुरे
कार्य से कोई शिकायत नहीं
है। वैसे
भी सरकार ताकतवर
होती है, तो अपनी ताकत
दिखाती ही है, इसमें आश्चर्य
क्या है? सरकार
से भी ताकतवर
बाजार होता है,
सभी सरकारों को
बाजार के हिसाब
से चलना पड़ता
है इसलिए सरकार
से कोई शिकायत
नहीं है।
अब आपने कुछ
सामाजिक मुद्दे जो
गिनाए थे कि भीड़ द्वारा
व्यक्तियों की हत्याएँ
की जा रही है तो
सचमुच ही ऐसी घटनाओं के
प्रति मेरे मन में कोई
संवेदना नहीं उठती
है। मैं
समझाता हूँ आपको,
मेरा एक छोटा भाई है,
शिक्षित है, मगर बेरोज़गार
है। उसकी
शादी हो चुकी है। बाहर
जाकर करोड़ों लोगों
की तरह कुछ छोटे-मोटे
काम करके अपना
गुजर-बसर करने
की कोशिश की
उसने, मगर कहीं
भी टिक नहीं
पाता है, मेरे
जैसे दाँत निपोरने
नहीं आता उसको,
मुस्कुराने भी नहीं
आता तो लड़ाई हो जाती
है और काम छूट जाता
है, अब उसने कसम
है कि गाँव
में रहेगा और
अपना काम करेगा।
अपना काम करने
के लिए कुछ पूँजी चाहिए,
वह पूँजी ना
तो मेरे पिता
दे पते है, ना मैं
दे पाता हूँ,
ना मेरे भाई
लोग दे पाते है, ऊपर
से गाँव के लोग, रिश्तेदार/समाज के
लोग सब लोग उसकी इमेज
ऐसी बना रखे है कि
वो पूँजी डूबा
देगा, सब बर्बाद
कर देगा। तो मेरा
छोटा भाई अब एक तरीका
ढूंढ लिया है अपनी सभी
कमजोरियों को ढँकने
और अपनी पत्नी
के नज़रों में
सम्मान पाने के लिए, वह
पिता जी से या किसी
भाई से झगड़ा करता है
तो खूब जोर-जोर से
चीखता है, बर्तन-दरवाजे -सामान सब
उठा कर फेंकता
है और इस पागलपन में
सबको गाली देता
है, सबको कहता
है कि इसने मेरी जिंदगी
ख़राब कर दिया,
अड़ोसी- पड़ोसियों को
भी गाली देता
है , जिस बात का कोई
तुक नहीं ऐसी
बिना सर-पैर भी
करता है और फिर जोर-जोर से
रोने लगता है। उसकी
पत्नी उसे चुप कराती है,
लेकर अंदर जाती
है। मैं
अक्सर ही यह सब होते
हुए देखता हूँ
मगर कुछ नहीं
कर पाता बल्कि सचमुच ऐसा
लगता है कि हम घरवाले,
गाँव वाले, समाज/व्यवस्था/ रिश्तेदार सब
लोग एक भीड़ है जो
मेरे छोटे भाई
को रोज मौत देते है। मैं
इस भीड़ का हिस्सा हूँ
कैसे किसी भीड़
द्वारा किसी शख़्स को
मार दिए जाने
पर मेरा कलेजा
फटेगा?
आडवानी जी
के बहाने आपने
भारतीय परंपरा अनुसार
बुजुर्गों का अपमान
होने पर दुःखी
होने को कहते है, मगर
जब मेरा भाई
पागलों की तरह चीखता-चिल्लाता
है और उसी पागलपन में
माँ के गुजर जाने के
बाद अकेले हुए पिताजी
को क्या कुछ
नहीं कह देता है तो
पिता जी मुझे फोन करते
है और फोन पर अपनी
बेचारगी/लाचारगी पर
बुक्का फाड़ कर रोते है,
पिता जी का रोना ऐसा
दर्दनाक होता है कि महीनों
तक मेरे छाती
के एक हिस्से
में दर्द और चुभन सी
रहती है। अब आप ही
बताओ मुझे अडवानी
जी के अपमान/उनके दर्द
का एहसास हो
सकता है क्या
?
प्रश्न: अरे-रे-रे ये
- ये क्या-क्या
बोल रहे हो यार?
जवाब मिला: मैं
वही बोल रहा हूँ जो
आप जैसे खुद
को जिन्दा समझने
वाले लोगों में
बोलने का गुर्दा
नहीं होता है,
आप हमें मरे
हुए लोग समझते
है जबकि आपलोग
खुद मरे हुए लोग है
जो लकीर को पीटते रहते
है। आपकी
विचारों की अभिव्यक्ति
सिर्फ अपने श्रेष्ठ
साबित करने की प्रवृति और ढ़कोसला
है। आपकी क्रान्ति
/क्रांति के मुद्दे
हर दूसरे दिन
बदल जाते है। दरअसल
आपकी सिर्फ एक
क्रांति है खुद को सराहे
जाने की प्यास।
आप जैसे लकीर
के फकीरों से
देश को क्या हासिल हुआ?
आप लिखते रहे
पेड़ कटते रहे,
अब दिन-दिन भर बैठ
कर कम्प्यूटर और
मोबाइल पर अपनी आँखे जमाये
कौन सी क्रांति
करना चाहते है
आप ?
दरअसल आप जैसे
लिखाड़ लोग ही देश में
फैली हुई हर नफ़रत के
जहर को हर व्यक्ति के हलक तक पहुंचाते हो,
आप जैसे लिखाड़
लोग ही चुनावों
में किसी पार्टी
का लहर बनाते
हो, उन्माद फैलते
हो, और देशवासियों
को उनकी असली
समस्याओं से ही
विमुख कर सिर्फ
उन्मादी चुनाव जीताते
हो। "मरे
हुए हम नहीं है सर,
मरे हुए तो आप लोग
हो " और आप
ऐसे मरे हुए हो कि
मर कर चुड़ैल/
ब्रह्मपिचास/भूत बन
गए हो और अब आप
सबको अपने जैसे
ही बना देना
चाहते हो।
जिन्दा गृहस्त आदमी
का एक मात्र
कर्तव्य अपने बच्चों
का पालन-पोषण
करना ही होता है, और
उम्र भर इससे उबार
नहीं नहीं पाता
है एक साधारण
गृहस्त आदमी। @ मनोरंजन
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