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Friday, November 27, 2015

काक्की

काक्की
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अँगुलियों पर जोड़ कर बता देती है वो,
की अभी अमावस कितने दिन बाद है,
पूर्णिमा, एकादशी और चौथ,
सब उसके अँगुलियों पर गिने जाते है,
सर्दियों में गुनगुना धूप,
सिर्फ उसके आँगन में ही नहीं उतरता,
पर ना जाने क्यों मोहल्ले भर की लड़कियों का,
हुजूम जुटता है उसके यहाँ सर्दियों में धूप निकलने के बाद,
वहाँ आज भी लड़कियाँ फेसबुक, फोन,और टीवी की बातें नहीं करती,
बल्कि जितनी लड़कियाँ, उतनी बातों का खज़ाना होता है उनके पास,
लड़कियाँ सिखती है, स्वेटर में फंदा डालना,
सलाई को घुमाकर सुन्दर फूल बनाना,
खूब झक सफ़ेद चादर पर धागों से कढाई करना,
कई लड़कियां सिखती है रंगों से छपाई करना,
काक्की गुणों की खान है,
चुहल करती किसी लड़की के पीठ पर धौल जमाती कक्की कहती है,
हमारे समय में लड़कियाँ सब गुन सिखती थी ससुराल जाने से पहले,
तुम्हारी तरह नहीं की चूल्हे में आँच भी ना जोरने आए,
और चल पड़ता है बातों का एक लम्बा सिलसिला,
अनेकानेक लड़कियों के बारें में जिनके ससुराल में क्या-क्या हुआ था,
और वहाँ बैठी लड़कियों के भावी ससुराल की रूप-रेखा तैयार होने लगता है,
तभी कोई लड़की बोलती है,
आरे कक्की अब हमें चूल्हा झोंकने की जरुरत नहीं,
मेरे बाउ जी, मेरा ब्याह शहर में करने वाले है,
वहाँ  गैस स्टोव पर बनता है खाना,
अचार के मर्तबान को हिलाती काक्की कहती है,
अपने घर को सवाँरने की कला को सबको सिखना चाहिए बेटी,
ससुराल शहर में हो की गाँव में,
ससुराल तो ससुराल ही होता है। @मनोरंजन

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