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Tuesday, December 15, 2015

प्यास

जी लेने दो मुझे आज,
कि बहुत दिनों से जीने की भुख लगी है,
मर रहे थे मेरे मन के सारे सुक्ष्म एहसास,
उनके लाशों को दफ़न करने में व्यस्त बहुत था,
फिर खो गया किसी मायावी रोशनी के चकाचौंध में,
रास्ता भटक गया था,
पहुँच गया था एक ऐसे देश में,
जहाँ झूठ हाथ  में लाउडस्पीकर लिए जोर-जोर से  चीख रहा था,
सच बोलने वालों ने अपने कान पर हाथ दबा लिए थे इसकदर,
कि  उनके मुँह  से सच निकलने के वजाय  कराहें निकल रही थी,
सब लाउडस्पीकर वाले को ही सच का मसीहा मान बैठे थे,
मानवीय संवेदनाओं, समाजिक मूल्यों, राजनैतिक गरिमा को,
लोग पैरों तले कुचलते दौड़े जा रहे थे,एक ऐसी जगह,
भव्य सजावटों वाले मैदान में, आलिशान शानो-शौकत से,
ढोंग, पाखंडों,और धूर्तों के हाथों,
नैतिकता, मर्यादा और आदर्शों पर कोड़े बरसाए जा रहे थे,
लोग ख़ुशी में चिल्ला रहे थे,
अपने बच्चों के कानों में कोड़े बरसाने वालों की,
 बीरता, शौर्य और सफलता के किस्से दुहरा रहे थे,
और बच्चे अपने मसीहों की तरह बनने के ख्वाबों में गुम हो रहे थे,
लाओ, वो मेरा आखिरी कनस्तर,
जिसमें जीने के लिए कुछ टुकड़े परिश्रम के रखे थे,
जी लेने दो मुझे आज,
कि बहुत दिनों से जीने की भुख लगी है। @ मनोरंजन 

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