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Tuesday, January 31, 2017

तुम, मुझे भूल तो ना जाओगे

तुम, मुझे भूल तो ना जाओगे
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जब मुट्ठी से रेत की तरह फिसल रहा होता है रिश्ता,
जब प्यार अपने आखिरी पड़ाव में होता है,
तब एक तड़प/ एक त्रास के रूप में निकलता है जुबां से,
" तुम, मुझे भूल तो ना जाओगे "
ये आग्रह है/ मिन्नत है/ एक लाचार उच्छास है,
बावजूद इसके कि आग्रह करने वाला जानता है,
कि उसके मुट्ठी में अब कुछ भी नहीं बचना है,
सिवा कुछ चिपके हुए रेत के,
पर इस चिपके हुए रेत के सहारे ही,
जिन्दा रहना चाहता है अपने प्रियतम के  यादों में,
पानी के खूबसूरत बुलबुले में दिखता रहे अक्स अपना,
ये चाह क्षणिक होता है,
काश ! याद रह जाता वह आँसू/ वह दर्द,
मीठा-मीठा सा ख़्वाब,
छुप कर निहारना, और पकड़े जाने का डर,
खुद से बतियाना और होठों-होठों में मुस्कुराना,
काश याद रह जाता वह डर,
जो उठता था दिल में किसी के रूठ जाने से/ दूर जाने से/ उदास हो जाने से,
वह ख़ुशी/ वह उमंग/ वह उत्साह याद रह जाता,
तो जिंदगी कितनी खूबसूरत होती .......
काश याद रह जाते वे लोग,
जिन्हें ना भुलाने की कसमें खाई थी,
पर याद नहीं रहते वे लोग जो कभी,
जीवन में अमृत के धार की तरह बहा करते थे,
जैसे दिल कोई जख्मों से भरा अंग हो,
जिसके ऊपर की परत उघड़ते रहती है निरंतर,
झरते रहते है उस परत के साथ,
वे सारे शब्द, भाव, एहसास और संवेदनाएँ,
फिर नया परत चढ़ता है,
नए शब्द, नए भाव, नए एहसास और नई संवेदनाएँ,
यह क्रम निरंतर चलते रहता है,
पुराने परत के उखड़ने और नए परत के चढने का,
यह सिलसिला चलते रहता है उम्र भर,
आखिरी साँस ले रहे शख़्स के आँखों में झांक कर देखो,
वहाँ भी वही पानी का बुलबुल होता है,
वही प्रश्न, वही चाह, वही याचना होती है,
"तुम मुझे भूल तो ना जाओगे?"     @ मनोरंजन कुमार तिवारी



Wednesday, January 18, 2017

गीत

गीत 
ये वो दौर है कि जिसमें,
मोहब्बत, शराफ़त, नफ़ासत 
सहमे हुए है। ----2 
यहाँ सब सयाने, सभी डेढ़ सयाने है,
सभी के यहाँ अपने-अपने तराने है,
किसी का किसी से ना वास्ता यहाँ है,
सभी अपने आप में डहके हुए है।
ये वो दौर है कि जिसमें,
मोहब्बत, शराफ़त, नफ़ासत
सहमे हुए है। ----2 @ मनोरंजन

Tuesday, January 17, 2017

बेचारी बन्नी की मम्मी

बेचारी बन्नी की मम्मी 
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सुबह से रात हो जाती है,
लगी रहती है,
अपने घर को सजाने में,
बच्चे जो है बिगड़ैल,
उन्हे सँवारने में।
वह रोज अपने दो कमरे के घर में,
सेण्ट छिटकती है,
कोने-कोने- को चमकाती है,
सारे सोफा, तकिया करीने से लगाती है,
और वह बच्चा, जो आठवी में पहुँच कर भी,
शब्दों को पढ़ नहीं पता,
उसे पुचकारती है,
झिड़क देता है वह अपनी माँ को,
जैसे वह, उसकी नौकरानी हो,
सायं को अपने घर में अगरबत्ती जला कर,
जैसे किसी देवता के आने की इंतज़ार करती है,
पति घर आता है,
हुलास कर जाती है पति के पास,
जुटी रहती है, उसके तीमारदारी में,
एक मिनट के लिये भी दूर नहीं जाती उससे,
क्या पता, कब क्या माँग ले वे,
बैठी रहती है,
तब तक, जब तक,
वह अपने पान मशाला भरे मुंह से,
उसके घर की और उसकी हालत,
पहले जैसा करके पैर पसार के सो ना जाये,
फिर अगले दिन वही कहानी,
कुछ दर्द जीवन में घुल कर जिंदगी जैसे ही लगने लगते है ना @ मनोरंजन

Monday, January 16, 2017

जिस्म

लाखों बार कही गई किसी बात को,
नकारने में डर तो लगता ही है,
फिर भी जी करता है कि,
फूलों, कलियों और चाँदनी के दूधिया प्रकाश से,
सजाया जाता रहा जिस्म को,
काँटों का झुण्ड लिख दूँ,
कि उलझ जाता है इश्क इसमें,
और लहूलुहान हो जाता है। मनोरंजन

Sunday, January 8, 2017

शासकों की तुलनात्मक विश्लेषण

अँग्रेजों ने हमें कलकता, बम्बई ,शिमला, दिल्ली और पोर्ट ब्लेयर जैसे अनेक शहर बना कर दिए, (यहाँ पर और पुराने भारतीय शासकों ने जो बनाया/ विकास किया, उसको नजरअंदाज नहीं कर रहा हूँ, इसलिए बकलोली मत करना कोई, तुलनात्मक विश्लेषण करो, मैं वही करना चाहता हूँ) 
मुझे आश्चर्य होता है, क्या सच में वे लूटेरे/ दमनकारी/क्रूर शासक थे? और पिछले 70 साल से जो सरकारें है वह न्यायपूर्ण/ जनसेवक/लोकहितार्थ कार्य कर रही है?अँग्रेज भेद-भाव करते थे, और पिछले 70 सालों से देश के लोगों से शासक वर्ग, भाईचारा का रिश्ता रखे है? कहीं कोई भेद-भाव नहीं है? 
विकास की बात करें? विकास तब ज्यादा हुआ था या अब हुआ है? कौन डेढ़ सायना कहता था कि भारत में तब एक सूई तक नहीं बनती थी ? ये कलकता, बम्बई ,शिमला, दिल्ली और पोर्ट ब्लेयर की इमारतें भूत बना जाते थे?कौन फैला रहा है ये सब बातें? भारत में तब सूई भी नहीं बनती थी ! दमन की बात करें? आजादी के बाद जितने लोग हिंसा के शिकार हुए, उतने अंग्रेजों के 200 सालों में भी नहीं हुए थे। ये हिंसा अंग्रेजों ने नहीं हमारे राष्ट्रभक्तों ने कराया था और कराते रहे है।आप एक "जालियावाला बाग़" के नाम पर अब तक रोये जा रहे हो, ऐसे ना जाने कितने "जालियावाला बाग़" आजादी के बाद हो चुके है। थोड़ा पढ़ो और विश्लेषण करो तब पता चलेगा कि अमीर लोगों के लिए तब भी अलग व्यवहार था, गरीब के लिए अलग था। ग़रीबों के खून चूसे जाते थे, अब भी चूसे जाते है, और आगे भी चूसे जाते रहेंगे। ग़रीब तब भी इस्तेमाल करने के चीज़ थे, अब भी है, आगे भी इस प्रवृति के शिकार होते रहेंगे। ये किसी शासक का दोष नहीं है, प्रवृति का दोष है और प्रवृतियाँ, परिवेश के अनुकूल आकार ग्रहण करती है। दुनियाँ के हर हिस्से में गरीबों का शोषण होता था, अब भी होता है और आगे भी होता रहेगा। सोचने की बात यह है कि आप ग़रीब क्यों हो? और ग़रीब हो तो इसका बेहतर इस्तेमाल कैसे कर सकते हो ? आज देश के निर्वाचन चुनावों में 60 -65 प्रतिशत मतदान होता है, इसमें 50 % हिस्सा गरीबों का होता है, 14 % मध्यवर्ग और सिर्फ १% अमीर होता है (एक अनुमान है) तो अब आपको सोचना है कि आप 50 % की तरह सोचोगे या 15% मुस्लिम, 15 % दलित 15 % पिछड़ा और 5 % स्वर्ण के रूप में बँट कर सोचोगे? @ मनोरंजन