Followers

Wednesday, March 26, 2014

कैसे कहूँ,
सचमुच जीना क्या होता है,
भूल ही चुका हूँ मै,
जबसे तुम नही हो, मेरे जीवन में,
मुझे आता भी कहां है, जीना तुम्हारे बीना,
तुम्हे तो पता है ना, चल नही पता मैं,
जीवन के राहों में, तुम्हारे सहारे बिना,
हर बात में मुझे तुम्हारी,
सहमति लेने की आदत जो हो गयी है,
हर बात तुम्हे बताए बिना, कहाँ पूरा होता है दिन मेरा?
दुनिया की हर वो खूबसूरत चीज, मुझे बदसूरत लगती है,
जब तुम मेरे साथ नही होती हो,
हर वक्त आँखों में नमी लेकर,
कैसे चलूँ?
बार-बार ठोकर लगती है,
गिरता हूँ, उठता हूँ और
बदहवास सा इधर- उधार देखता हूँ,
और ढूँढता हूँ तुम्हे, मगर तुम कही नही होती हो
कैसे कहूँ की,
सचमुच साँसें रुक सी जाती है और
एक अजीब सी बेचैनी से मन व्याकुल सा  हो जाता है,
जब कभी तुम्हारी याद आती है,
ऐसा नही की मैंने तुम्हे भुलाने की कोशिश नही की कभी,
पर अकसर ही ऐसे कुछ शब्द आ जाते है जेहन में,
जो मेरी साँसो को अवरुद्ध कर देते है,…………………….
………………………………………………..
……………………………………………………
       मनोरंजन



समर्पण
जब भी देखा तुम्हारा तमतमाया चेहरा ही देखा,
तुम्हारे आँसुओं को कभी ना देखा,
अगर देख लेता तो जल कर राख हो जाता,
उन आँसुओं के तपिस में,
पर देखा नही, तुम्हारी बेबसी, तुम्हारी सादगी,
जब भी देखा, सिर्फ़ तुम्हारे बहानों को देखा,
तुम्हारी बेरुखी, तुम्हारे अभिमान को देखा,
कभी तुम्हारी चाहत को, तुम्हारी तमन्नाओ को, तुम्हारी आरज़ू को नही देखा,
कभी दिखा ही नही मुझे तुम्हारी चंचलता,
चहकना खुशी से, हर छोटी-छोटी बातों पर,
तब भी नही, जब तुम सुना रही थी,
अपने पहले शो का स्क्रिफ्ट मुझे,
तब भी नही जब पूछती हर छोटी-छोटी बातें मुझसे,
तब भी मैने सिर्फ़ इतना समझा,
बना रही हो हर कदम बुद्धू मुझे,
कोई लड़की क्यूँ गैरों के साथ बैठ,
सुनेगी अपनी गाथा?
क्यूँ चल पड़ेगी कहीं भी, कभी भी बीना कोई परवाह किए,
ऐसे तो कभी सोचा ही नही,
कभी समझा ही नही, तुम्हारे विश्वास को, तुम्हारे एहसास को,
कभी समझा ही नही तुम्हारी उदारता, तुम्हारी आत्मीयता,
कभी समझा नही कि हर कदम करती हो एहसान मुझ पर,
मगर मेरा पुरूष दंभ हर वक्त करता रहा एहसान तुम पर,
हर वक्त उबलते रहा, अपमान से, अज्ञान से,
तड़पते रहा तुम्हारी बेरुखी से, तुम्हारी दूरी से,
जलते रहा हर वक्त क्रोध में, कम-पिपसा के आग में,
उठाते रहा हर वक्त सवाल तुम्हारे समर्पण पे, तुम्हारी बफा पे,
रौंदते रहा हर वक्त तुम्हारे गरूर को, तुम्हारे स्त्री स्वाभिमान को,
जाना नही कभी की तुमने तो,
कब के समर्पित कर चुकी  हो अपना सब कुछ मुझे,
मैं ही अभगा दे सका तुम को कुछ भी.......मनोरंजन




Tuesday, March 18, 2014

चिड़िया का दर्द, बच्चे के दर्द से ज्यादा है.

कशूर तुम्हारा नही, गुनाह मुझसे हुआ है,
बच्चे जो कर जाते है अक्सर, ऐसा अक्षम्य अपराध हुआ है,

पंछी को कब प्यार है पिंजरे से?
पिंजरा चाहे सोने हा ही क्यूँ ना हो,
चिड़ियाँ नही चाहती, बाँधे जाएँ, उसके पैरों में धागे,
धागे चाहे रेशम की ही क्यूँ ना हो,

पर बच्चे तो बच्चे ही होते है,
अपनी चिड़िया को खुश करने को हर जतन करते है,
सुंदर पिंजरा, फुल लगा बनवाते है,
चिड़िया को उसमे रख,ताली बजते है,
देते है खाने को दूध,मलाई और मेवा,
पर चिड़िया को प्यारा है, दाना चुग कर खाने से,
बच्चे इतनी सी बात, समझ नही पाते है,

चिड़िया, पहले अकुला कर पंख अपना फडफ़डाती है,
बेचैन, परेशान होकर चिं-चिं कर चिल्लाती है,
बच्चा खुश होकर, ताली पिटता है,
सोचता है चिड़िया नाच रही तो ख़ुद भी नाचता है,

पर, कुछ दिन बाद चिड़िया का हिम्मत टूट जाता है,
वो खामोश, उदाश और निराश सी हो जाती है,
अपने संसार, अपने आकाश को  याद कर,
मन ही मन बहुत पछताती है,
बच्चा अब कुछ भी समझ नही पता है,
चिड़िया के साथ-साथ बच्चा भी परेशान हो जाता है,
चिड़िया को खुश करने को हर जतन करता है,
रोता है, अपने चिड़िया से बतियाता है,
चिड़िया तुम मुझसे बात करो,
क्यूँ खुश नही हो तुम?

चिड़िया को खुश करने को,
उसे पिंजरे से निकालता है,
फिर पैरों में बाँध धागे, चिड़िया को बाहर की सैर कराता है,
क्योंकि हर हाल में वो चिड़िया को अपने पास ही रखना चाहता है,
चिड़िया, दिनों- दिन दुःख, व्योग और दर्द में घुटती है,
फिर दर्द की इंतन्हा होती है,
बेबस हो चिड़िया, दम अपना तोड़ देती है........
आह! काश, बच्चा इतनी सी बात समझ पता,
अब रो रहा है दुःख, व्योग और दर्द में बच्चा भी,
पर परवाह किसे?

चिड़िया का दर्द, बच्चे के दर्द से ज्यादा है........................मनोरंजन

क्या तुम नही हो कहीं मेरे उलझे धागे के गोले में?

क्या तुम नही हो कहीं मेरे उलझे धागे के गोले में
मन बहुत उदास है आज- कल,
फिर तुम्हारी यादों के सर्द हवाओं ने जकड़ लिया है मुझे,
क्या माँग लिया था मैंने तुमसे? जो तुम दे ना सके,
थोड़ी सी धूप, थोड़ी सी साँसें, थोड़ी सी जिंदगी, थोड़ी सी मुस्कुराहट!
क्या ये सब बहुत ज्यादा था तुम्हारे लिए?
क्या तुम यही चाहती थी की मैं उड़ता रहूँ,
पतझड़ के सूखे पत्तों की तरह
बेजान, नीरस और उदास,
पिछले कई साल से मुस्कुराया नही,
बस हँसे जा रहा हूँ बेजान- सी-हँसी,
लोगों के भद्दे मजाक, बर्दस्त किए जा रहा हूँ,
हर वक्त, बस यही सवाल जेहन में बार-बार आए जा रहा है,
क्या मैं यही चाहता था?
क्या मैं सच में अपने प्राणों कि आहुति देना चाहता था?
इतना हॄदयशून्य कैसे बन पाया मैं?
हर वक्त आँखों से आँसू के कुछ बूँदें बहने को आतुर,
अपना ही चेहरा ख़ुद, पहचान नही पा रहा,
कैसे मार दी मैंने ख़ुद अपने आत्मा को?
मैं जनता हूँ, तुम्हे शायद  परवाह नही, कभी था भी नही,
बस एक कच्चे धागे सा बंधन था,
जिसे जबरदस्ती मै ही निभाये जा रहा था,
शायद वो धागा  टूट गया,
तुमने बड़ी आसनी से, समेट लिए अपने हिस्से के धागे,
पर मैं अभी भी उलझा हूँ,
अपने हिस्से के उलझे धागों को समेटने में,
बार-बार एक ही सवाल गूँज रहा है, मन में,
क्या तुम नही हो कहीं मेरे उलझे धागे के गोले में?........मनोरंजन