Followers

Wednesday, March 26, 2014


समर्पण
जब भी देखा तुम्हारा तमतमाया चेहरा ही देखा,
तुम्हारे आँसुओं को कभी ना देखा,
अगर देख लेता तो जल कर राख हो जाता,
उन आँसुओं के तपिस में,
पर देखा नही, तुम्हारी बेबसी, तुम्हारी सादगी,
जब भी देखा, सिर्फ़ तुम्हारे बहानों को देखा,
तुम्हारी बेरुखी, तुम्हारे अभिमान को देखा,
कभी तुम्हारी चाहत को, तुम्हारी तमन्नाओ को, तुम्हारी आरज़ू को नही देखा,
कभी दिखा ही नही मुझे तुम्हारी चंचलता,
चहकना खुशी से, हर छोटी-छोटी बातों पर,
तब भी नही, जब तुम सुना रही थी,
अपने पहले शो का स्क्रिफ्ट मुझे,
तब भी नही जब पूछती हर छोटी-छोटी बातें मुझसे,
तब भी मैने सिर्फ़ इतना समझा,
बना रही हो हर कदम बुद्धू मुझे,
कोई लड़की क्यूँ गैरों के साथ बैठ,
सुनेगी अपनी गाथा?
क्यूँ चल पड़ेगी कहीं भी, कभी भी बीना कोई परवाह किए,
ऐसे तो कभी सोचा ही नही,
कभी समझा ही नही, तुम्हारे विश्वास को, तुम्हारे एहसास को,
कभी समझा ही नही तुम्हारी उदारता, तुम्हारी आत्मीयता,
कभी समझा नही कि हर कदम करती हो एहसान मुझ पर,
मगर मेरा पुरूष दंभ हर वक्त करता रहा एहसान तुम पर,
हर वक्त उबलते रहा, अपमान से, अज्ञान से,
तड़पते रहा तुम्हारी बेरुखी से, तुम्हारी दूरी से,
जलते रहा हर वक्त क्रोध में, कम-पिपसा के आग में,
उठाते रहा हर वक्त सवाल तुम्हारे समर्पण पे, तुम्हारी बफा पे,
रौंदते रहा हर वक्त तुम्हारे गरूर को, तुम्हारे स्त्री स्वाभिमान को,
जाना नही कभी की तुमने तो,
कब के समर्पित कर चुकी  हो अपना सब कुछ मुझे,
मैं ही अभगा दे सका तुम को कुछ भी.......मनोरंजन




No comments:

Post a Comment

Write here