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Wednesday, March 26, 2014

कैसे कहूँ,
सचमुच जीना क्या होता है,
भूल ही चुका हूँ मै,
जबसे तुम नही हो, मेरे जीवन में,
मुझे आता भी कहां है, जीना तुम्हारे बीना,
तुम्हे तो पता है ना, चल नही पता मैं,
जीवन के राहों में, तुम्हारे सहारे बिना,
हर बात में मुझे तुम्हारी,
सहमति लेने की आदत जो हो गयी है,
हर बात तुम्हे बताए बिना, कहाँ पूरा होता है दिन मेरा?
दुनिया की हर वो खूबसूरत चीज, मुझे बदसूरत लगती है,
जब तुम मेरे साथ नही होती हो,
हर वक्त आँखों में नमी लेकर,
कैसे चलूँ?
बार-बार ठोकर लगती है,
गिरता हूँ, उठता हूँ और
बदहवास सा इधर- उधार देखता हूँ,
और ढूँढता हूँ तुम्हे, मगर तुम कही नही होती हो
कैसे कहूँ की,
सचमुच साँसें रुक सी जाती है और
एक अजीब सी बेचैनी से मन व्याकुल सा  हो जाता है,
जब कभी तुम्हारी याद आती है,
ऐसा नही की मैंने तुम्हे भुलाने की कोशिश नही की कभी,
पर अकसर ही ऐसे कुछ शब्द आ जाते है जेहन में,
जो मेरी साँसो को अवरुद्ध कर देते है,…………………….
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……………………………………………………
       मनोरंजन


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