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Tuesday, March 18, 2014

क्या तुम नही हो कहीं मेरे उलझे धागे के गोले में?

क्या तुम नही हो कहीं मेरे उलझे धागे के गोले में
मन बहुत उदास है आज- कल,
फिर तुम्हारी यादों के सर्द हवाओं ने जकड़ लिया है मुझे,
क्या माँग लिया था मैंने तुमसे? जो तुम दे ना सके,
थोड़ी सी धूप, थोड़ी सी साँसें, थोड़ी सी जिंदगी, थोड़ी सी मुस्कुराहट!
क्या ये सब बहुत ज्यादा था तुम्हारे लिए?
क्या तुम यही चाहती थी की मैं उड़ता रहूँ,
पतझड़ के सूखे पत्तों की तरह
बेजान, नीरस और उदास,
पिछले कई साल से मुस्कुराया नही,
बस हँसे जा रहा हूँ बेजान- सी-हँसी,
लोगों के भद्दे मजाक, बर्दस्त किए जा रहा हूँ,
हर वक्त, बस यही सवाल जेहन में बार-बार आए जा रहा है,
क्या मैं यही चाहता था?
क्या मैं सच में अपने प्राणों कि आहुति देना चाहता था?
इतना हॄदयशून्य कैसे बन पाया मैं?
हर वक्त आँखों से आँसू के कुछ बूँदें बहने को आतुर,
अपना ही चेहरा ख़ुद, पहचान नही पा रहा,
कैसे मार दी मैंने ख़ुद अपने आत्मा को?
मैं जनता हूँ, तुम्हे शायद  परवाह नही, कभी था भी नही,
बस एक कच्चे धागे सा बंधन था,
जिसे जबरदस्ती मै ही निभाये जा रहा था,
शायद वो धागा  टूट गया,
तुमने बड़ी आसनी से, समेट लिए अपने हिस्से के धागे,
पर मैं अभी भी उलझा हूँ,
अपने हिस्से के उलझे धागों को समेटने में,
बार-बार एक ही सवाल गूँज रहा है, मन में,
क्या तुम नही हो कहीं मेरे उलझे धागे के गोले में?........मनोरंजन



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