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Tuesday, March 18, 2014

चिड़िया का दर्द, बच्चे के दर्द से ज्यादा है.

कशूर तुम्हारा नही, गुनाह मुझसे हुआ है,
बच्चे जो कर जाते है अक्सर, ऐसा अक्षम्य अपराध हुआ है,

पंछी को कब प्यार है पिंजरे से?
पिंजरा चाहे सोने हा ही क्यूँ ना हो,
चिड़ियाँ नही चाहती, बाँधे जाएँ, उसके पैरों में धागे,
धागे चाहे रेशम की ही क्यूँ ना हो,

पर बच्चे तो बच्चे ही होते है,
अपनी चिड़िया को खुश करने को हर जतन करते है,
सुंदर पिंजरा, फुल लगा बनवाते है,
चिड़िया को उसमे रख,ताली बजते है,
देते है खाने को दूध,मलाई और मेवा,
पर चिड़िया को प्यारा है, दाना चुग कर खाने से,
बच्चे इतनी सी बात, समझ नही पाते है,

चिड़िया, पहले अकुला कर पंख अपना फडफ़डाती है,
बेचैन, परेशान होकर चिं-चिं कर चिल्लाती है,
बच्चा खुश होकर, ताली पिटता है,
सोचता है चिड़िया नाच रही तो ख़ुद भी नाचता है,

पर, कुछ दिन बाद चिड़िया का हिम्मत टूट जाता है,
वो खामोश, उदाश और निराश सी हो जाती है,
अपने संसार, अपने आकाश को  याद कर,
मन ही मन बहुत पछताती है,
बच्चा अब कुछ भी समझ नही पता है,
चिड़िया के साथ-साथ बच्चा भी परेशान हो जाता है,
चिड़िया को खुश करने को हर जतन करता है,
रोता है, अपने चिड़िया से बतियाता है,
चिड़िया तुम मुझसे बात करो,
क्यूँ खुश नही हो तुम?

चिड़िया को खुश करने को,
उसे पिंजरे से निकालता है,
फिर पैरों में बाँध धागे, चिड़िया को बाहर की सैर कराता है,
क्योंकि हर हाल में वो चिड़िया को अपने पास ही रखना चाहता है,
चिड़िया, दिनों- दिन दुःख, व्योग और दर्द में घुटती है,
फिर दर्द की इंतन्हा होती है,
बेबस हो चिड़िया, दम अपना तोड़ देती है........
आह! काश, बच्चा इतनी सी बात समझ पता,
अब रो रहा है दुःख, व्योग और दर्द में बच्चा भी,
पर परवाह किसे?

चिड़िया का दर्द, बच्चे के दर्द से ज्यादा है........................मनोरंजन

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