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Thursday, July 9, 2015

बावरा मन(गीत)

बावरा मन(गीत)
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बावरा मन,
सुन बावरे,
ढूंढता है किसे, साँझ-सकेरे,
बावरा मन..........सुन बावरे....
कली, तरुणाई की कुम्भला गई,
भटकते ही भटकते, दोपहर भी आ गई,
झुलस गई पंखुड़ियाँ, नींद से अब जाग रे,
मन बावरे.....
बावरा मन, सुन बावरे।
मिला जो राह में पत्थर,
वो पत्थर पारस हो जाता,
फेंका ना जो तुमने,
तो तेरा भी एक घर होता,
बावरा मन, सुन बावरे............
ढूं ढ़ ता है किसे, साँझ-सकेरे, बावरा मन.......सुन बावरे।@ मनोरंजन

Wednesday, July 8, 2015

परवरिस (लघु-कथा)

परवरिस (लघु-कथा)
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बहुत देर से नन्ही आरोही अपने पापा से बारिस में खेलने की ज़िद कर रही थी,
उसके पापा उसे समझते हुए बोले "नहीं बेटा, बारिस में खेलेंगे तो हम बिमार पड़ जायेंगे"
आरोही बोली " अगर बिमार पड़ जायेंगे तो टैबलेट ले लेंगे", माँ भी तो बिमार पड़ती है,
तो वह टैबलेट लेकर सो जाती है, और फिर अगले दिन ठीक हो जाती है।
पिता को समझ नहीं आ रहा था की वह अपनी बेटी को कैसे समझाए की, 
उन्हें बिमार पड़ने को इज़ाज़त नहीं है, क्योंकि बिमार पड़ कर एक दिन घर बैठने का मतलब है,
महीने के आखिर में तीन दिन भुखा सोना पड़ेगा। 
फिर पापा बोले " देखो बेटा जब हम बिमार पड़ते है तो काफी कमज़ोर हो जाते है, 
जैसे माँ कई दिनों तक बाहर घुमने नहीं जा पाती है, तुम भी अगर बिमार पड़ोगी तो पार्क में घुमने कैसे जाओगी?
चलो ऐसा करते है की तुम अपना कागज़ का नाव बनाओ, हम बिना बारिस में भींगे, अपना नाव चलाएँगे। 
यह सुन कर नन्ही आरोही खुश हो गई, और दौड़ती हुई जाकर कागज का नाव बनाने लगी। @ मनोरंजन

रामराज्य नहीं जंगल राज चाहिए

रामराज्य नहीं जंगल राज चाहिए
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जंगल को साफ  कर शहर बसाये जा रहे है,
और शहर, जंगल बनते जा रहे है,
जंगल में फिर भी एक रिवायत थी,
वहाँ  के बाशिंदे सिर्फ अपना पेट भरने के लिए आखेट करते थे,
पर इस जंगल के बाशिंदे जिसे हम सभ्य और शहरी कहते है,
अपनी कभी न ख़त्म होने वाली प्यास को बुझाने के लिए आखेट करते है,
उस जंगल में कम से कम उन्मुक्तता तो थी,
चैन-ओ -सुकून  और बेफिक्र हंसी तो थी,
इस जंगल ने तो छीन लिया हमसे हँसने का हुनर,
उन्मुक्तता, बेफिक्री चैन-ओ-सुकून,
सब गिरबी है, इस जंगल के जानवरों के पास,
हवाएँ तक कैद है जिनके पास,
उनसे अपनी रिहाई की क्या उम्मीद रखें?
सरकारें रामराज्य लाने की बातें करती है,
और हमें हवा-पानी से भी महरूम किए  जा रही है,
क्या हासिल होगा रामराज्य पाकर भी,
ये शहर जो जंगल बनाते जा रहा है,
इसके जानवर और ताकतवर हो जाएँगे,
और हम अपनी साँसों  के लिए भी कीमत चुकाएंगे,
अब तो ये निष्कर्ष निकालना होगा,
हमें रामराज्य नहीं, जंगलराज चाहिए। @ मनोरंजन


Friday, July 3, 2015

अज्ञानता में आनंद

अज्ञानता में आनंद
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रेत का घर बना रहे बच्चें,
उसके अंजाम से बेख़बर होते है,
या फिर जानते हुए भी की एक चोट में ढह जाएगा,
फिर भी पूरी तत्लिनता से सवांरने में लगे होते है उस रेत के घर को,
अज्ञानता में आनंद होता है,
प्रेम होता है, समर्पण होता है और लगन होता है,
देखो मैं नहीं जानना चाहता सब कुछ तुम्हारे बारे में,
बस निरंतर तुम्हे जानने की जुस्तजू बनाए रखना चाहता हूँ,
और अंजाम से भी अनभिज्ञ ही रहने दो मुझे,
संवारने दो हमारे रिश्ते के रेत महल को,
और तुम भी खड़े रहो यहीं,
देखो कितना खुबसूरत घर है अपना,
डरो मत उन लहरों से,
वे वापस चली जाएँगी।@मनोरंजन

हौसला

शीर्षक- हौसला
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यूँ तो गाँव के लोग बहुत खुल कर हँसने, बोलने और जीने के लिए जाने जाते है, पर उसी गाँव में कुछ ऐसे लोग भी होते है जिनके चेहरे पर मुस्कुराहट बमुश्किल ही आ पाती है।जानार्दन पाल ऐसे ही सीरत का आदमी है। उसे बचपन से देखता आ रहा हूँ, कभी उसे मुस्कुराते हुए ना देखा। गरीबी, लचारी और स्वाभिमान ये सब मिल कर शायद किसी भी शख्स के चेहरे की मुस्कराहट छीन सकते है। जनार्दन बहुत गरीब है, पर कभी सुनने में नहीं आया की उसने किसी से कुछ माँगा हो या चुराया हो। जवानी के दिनों में उसके एक हूनर की सर्वत्र चर्चा होती थी, वह आल्हा-उदल की कहानी को ढोलक पर थाप देकर इतने रोमांचक तरीके से गाता था की सुनने वालों में सचमुच वीररस हिलोरें मरने लगता था। तब वह जवान था, मगर तीन कुँवारी बहनों की शादी के जिम्मेवारी के एहसास ने उसे मूक बना दिया था। वह पुरे दिन मजदूरी करता फिर अपने बकरियों के लिए चारा लाता और आठ-नौ बजे( जब गाँव के बहुत सारे लोग सोने लगते) गाँव के बाहर, एक बांस और फ़ूस के बने झोपड़ी में अपना ढोलक निकाल कर शुरू करता था आल्हा-उदल का गान। गाँव के काफी लोग जिन्हें संगीत से प्यार था आ जाते थे। मगर इस गायन से उसको कुछ भी प्राप्त नहीं होता था न वह किसी से कुछ माँगता था ना कोई उसे कुछ देता था। एक बार बनारस से एक प्रोफ़ेसर साहब आए थे, जब उन्होंने उसे गाते हुए सुना और ढोलक पर पड़ कर जादू कर देने वाली अँगुलियों का कमल देखे तो आश्चर्य का ठिकाना ना रहा। पुछे, मेरे साथ बनारस चलोगे? जनार्दन को जैसे मनचाही मुराद पूरी हो गई, तुरंत तैयार हो गया। जनार्दन ने तमाम मुसीबतों के बाबजूद जितनी निष्ठा से, लगन से और परिश्रम से अपनी कला से प्यार करते रहा था, उसी कला ने उसकी जिंदगी बदल दी। काफी अरसे के बाद मिला मुझे। घर- परिवार का हाल पूछा फिर बताया तीन लड़कियाँ है उसकी और उन लड़कियों से मिल कर मुझे ऐसा एहसास हुआ की जनार्दन ने अपनी बेटियों में भी वही हौसला और लगन भर दिया है जो उसमें थी। जनार्दन की तीनों बेटियां स्कुल से आने के बाद घर का काम, मवेशियों को चारा देना और खेत-खलिहान के सारे काम करने के बाद देर रात तक लालटेन की रोशनी में पढ़ती हुई दिख जाती है।@मनोरंजन

थके हुए लोग

थके हुए लोग
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जीवन से हारे हुए,
थके हुए कुछ लोग,
सिमटा कर रख लेते है ख़ुद को,
किसी अँधेरे कोने में,
बुनते है वहीँ फिर बहानों की चादर,
जिसे ओढ़ कर छुप  सकें लोगों की नज़रों से,
इज़ाद करते है नए-नए तरीके,
लोगों को हड़काए रखने,
डराए रखने के लिए,
बर्दाश्त नहीं होता उनसे,
जो कोई उन पर अँगुली उठाए,
इसलिए पहले से सतर्क,
अपने आस-पास के लोगों पर रखते है चोर नज़र,
ताकी  ढूँढ सके कोई ऐब,
खुद को सही और सामने वाले को गलत सिद्ध करने के लिए,
बनाते रहते है,
रहस्यमय जालें,
जिसमें उलझा सके मासूमों को,
और तुष्ट कर सकें अपनी कुंठाओं को,
पर नहीं समझते की,
वे रहस्य्मय जालें ख़ुद उन्हें ही रोशनी से महरूम किए जाती है,
और वे धंसते  जाते है,
अनंत अंधकार में,
जहाँ उनकी रूह तक पर कालिख़ पूत जाती है। @ मनोरंजन