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Wednesday, July 8, 2015

रामराज्य नहीं जंगल राज चाहिए

रामराज्य नहीं जंगल राज चाहिए
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जंगल को साफ  कर शहर बसाये जा रहे है,
और शहर, जंगल बनते जा रहे है,
जंगल में फिर भी एक रिवायत थी,
वहाँ  के बाशिंदे सिर्फ अपना पेट भरने के लिए आखेट करते थे,
पर इस जंगल के बाशिंदे जिसे हम सभ्य और शहरी कहते है,
अपनी कभी न ख़त्म होने वाली प्यास को बुझाने के लिए आखेट करते है,
उस जंगल में कम से कम उन्मुक्तता तो थी,
चैन-ओ -सुकून  और बेफिक्र हंसी तो थी,
इस जंगल ने तो छीन लिया हमसे हँसने का हुनर,
उन्मुक्तता, बेफिक्री चैन-ओ-सुकून,
सब गिरबी है, इस जंगल के जानवरों के पास,
हवाएँ तक कैद है जिनके पास,
उनसे अपनी रिहाई की क्या उम्मीद रखें?
सरकारें रामराज्य लाने की बातें करती है,
और हमें हवा-पानी से भी महरूम किए  जा रही है,
क्या हासिल होगा रामराज्य पाकर भी,
ये शहर जो जंगल बनाते जा रहा है,
इसके जानवर और ताकतवर हो जाएँगे,
और हम अपनी साँसों  के लिए भी कीमत चुकाएंगे,
अब तो ये निष्कर्ष निकालना होगा,
हमें रामराज्य नहीं, जंगलराज चाहिए। @ मनोरंजन


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