Followers

Monday, October 31, 2016

मैं और तुम

मैं और तुम 
हर बार हम बनने को मिलते है,
हमारे अहम से टकरा कर,
हम चकनाचूर हो जाता है,
और इसके अणु पुरे ब्रह्मांड में बिखर जाते है,
एक लम्बे समयांतराल के बाद,
फिर से एक जगह जुड़ने लिए,
मैं और तुम मिलते है,
मगर एक-दूसरे को मिटाने लिए,
और ये सही भी है,
क्योंकि जब तक मैं और तुम ख़त्म नहीं हो जायेंगे,
हम आकार नहीं ले सकेगा,
मैं और तुम बात नहीं करते एक -दूसरे से,
मगर हम बात करना चाहते है,
मैं तुमसे बात इसलिए नहीं करता की,
मैं जनता हूँ, मेरी आवाज़ नहीं पहुँच पाएगी तुम तक,
तुम, मुझसे बात इसलिए नहीं करती की,
तुम चाहती हो की मैं झुकूँ तुम्हारे ज़िद के आगे,
मैं और तुम एक दूसरे से प्यार नहीं करते,
बल्कि नफ़रत करते है इतना,
जितना और कोई नहीं करता,
ना मुझसे, ना तुमसे,
पर फिर भी हम मिलते है,
ताकि एक-दूसरे को जला कर राख कर सकें,
पर अफ़सोस की ऐसा हो नहीं पाता पूरी तरह,
मैं और तुम फिर से बिखर जाते है टुकड़ों में
इसलिए हम नहीं बन पाते। @मनोरंजन

दिवाली उपहार

(कहानी )
=============
दिवाली की तैयारियाँ चल रही है, साहब के घर पर काम बहुत बढ़ गया है। रोज रात में देर से आने के बाद "हरी" अपने पत्नी से कहता है। "अपने घर में भी दिवाली की तैयारी करनी है" उसकी पत्नी कहती, इतने दिनों से सोच रहे है, घर में कोई ढंग का बर्तन नहीं है, इस धनतेरस पर बर्तन खरीदना है, तुम साहब से बोलो ना एडवांस में पैसे के लिए, वे माना नहीं करेंगे।पर हरी बात को टाल जाता है, कहता है,वे खुद ही देंगे, महिना भी तो लग गया है, इस दिवाली पर मासिक वेतन के साथ बोनस भी देंगे तो हम बर्तन खरीद लेंगे। जैसे-जैसे दिवाली नजदीक आती गई, साहब के घर पर आने-जाने वालों का दिन भर ताँता लगा ही रहता है, साहब के ऑफिस का नौकर घर चला गया है, इसलिए अपने सारे काम करने के साथ-साथ लोगों को चाय-पानी और मिठाई खिलाते रात हो जाती है। इधर हरी की पत्नी ने हर साल की तरह इस बार भी धनतेरस के दिन मिट्टी के कुछ दिए और एक झाड़ू खरीद लिया। दिवाली के दिन सबकी छुट्टी थी मगर साहब ने कहा " हरी तुम कल सुबह आ जाना, तुम्हारी दिवाली भी तो देनी है" हरी मन ही मन बहुत प्रसन्न हुआ, घर जाकर अपने पत्नी को बोला, कल साहब ने सिर्फ मुझे बुलाया है अपने घर पर, कुछ खास दिवाली के उपहार देंगे मुझे, आदमी की परख है उन्हें, साहब इसीलिए सबसे ज्यादा मुझे मानते है।अगले दिन तड़के ही उठ कर हरी साहब के घर पर चला गया, इधर उसके बच्चे पटाखे और मिठाई के लिए अपनी माँ को परेशान कर रहे थे। वह बच्चों को समझाती कि थोड़ी देर में ही उनके पापा आ जाएँगे तो चल कर ढेर सारी मिठाई और पटाखे खरीदेंगे। बच्चे दिन भर अपने पिता की राह देखते रहे, इधर-उधर भटकते रहे। जब सायं ढलने लगी तब तो हरी की घरवाली भी चिंतित हो उठी, घर में पूजा का सारा काम पड़ा था, मगर उसका ध्यान सिर्फ अपने पति के राह देखने में ही लगा रहा। उधर साहब के घर पर आज रोज से भी ज्यादा लोगों का आना-जाना लगा रहा, लोग कीमती डब्बों में मिठाई और ड्राई फ्रूट उपहार में ला रहे थे, हरी उन पैकटों को समेट कर साहब के बैठक से साहब के घर में पहुंचाता रहा, उन्हें चाय-पानी पिलाता रहा, मिठाई खिलाता रहा, और सोचता रहा कि मासिक वेतन के साथ इसी में से कोई पैकेट साहब उसको उपहार दे दें तो कितना अच्छा हो, ड्राई फ्रूट के पैकेट पर चढ़ी पन्नियों से सब दिखता था, इसमें से कई ऐसे मेवें थे, जो हरी ने कभी नहीं खाए थे। लोग बैठक में बैठ कर किस्म-किस्म के बातें करने लगते , कोई पाकिस्तान के दुनिया में अलग-थलग पड़ने की बात करता तो कोई देश की राजनीती पर बात करता। समय बहुत तेज़ी से बितता जा रहा था, और इसके साथ ही हरी मन ही मन झुंझलाते जा रहा था। वह सोच रहा था कि ये लोग ये कैसी-कैसी बात लेकर बैठ जा रहे है, पर्व-त्यौहार का दिन है, जल्दी जाए ताकी साहब भी जल्दी फुरसत पाकर उउसको दिवाली देकर, उसे विदा करें। पर ऐसा हुआ नहीं, सायं तीन-चार बजे तक हरी के चेहरे का सारा उत्साह और ख़ुशी निचोड़ी जा चुकी थी। साहब उठते हुए बोले " मैं तो बहुत थक गया हरी, तू बैठ थोड़ी देर, कोई आये तो चाय-पानी देना, मैं एक बार नाहा कर आऊ। साहब को अंदर गए करीब दो घंटे हो चुके थे, इस बीच ,पता नहीं भूख से या किस बात से, हरी के आँखों से आँसुओं के बाँध कई बार टुट चुका था। अँधेरा हो गया था, हरी अभी भी सुनी-सुनी आँखों से साहब के घर के गेट को देख रहा था। आखिर जब पूजा का समय हो गया तो साहब अपने दोनों बेटों के साथ बाहर निकले।साहब के बेटों के हाथों में बड़े-बड़े पटाखों के पैकेट थे, साहब उन्हें सावधानी से पटाखे जलाने की हिदायत दे रहे थे। फिर हरी के पास आकर ऐसे बोले जैसे कुछ हुआ ही नहीं है, "आरे हरी,कोई आया तो नहीं था? मैं तो नहा कर सो गया था, निंद आ गई थी। हरी को कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या कहे? वह मन ही मन सोच रहा था कि अभी भी भीख माँगने पर ही साहब उसे उपहार देंगे क्या? उसके हलक के अंदर एक घुटी-घुटी सी चीख़ निकल कर होठों तक आती, फिर वापस चली जाती। किसी तरह खुद को संयत करते हुए, उसने कहा " साहब मेरा वेतन दे देते तो, बच्चे मेरा राह देख रहे होंगे। साहब ने घर से लाकर उसका वेतन और एक मिठाई का पैकेट पकड़ा दिया( वेतन में से तीन हजार रूपया काट लिए थे, जो हरी ने महिने के शुरू में ही एडवांस लिया था, पत्नी के दवाई के लिए)। @ मनोरंजन

Wednesday, October 26, 2016

आँसू जो शब्दों में ढलते है

आँसू जो शब्दों में ढलते है ------------------------------लिखना नहीं चाहता मैं इसे,पर मजबूर हूँ,ख़ुद के तसल्ली के लिए/ मन बहलाने के लिएलिखना जरूरी है,किसी के दुर्भाग्य की कहानी/कविता में कोई क्यों रस लेगा?पर लिखना आत्मसर्वेक्षण भी तो हो सकता है,बने वे लोग लेखक/ कविजो पूरे मनोयोग से जुड़े हुए है इसमें / डूबे हुए है मोती पाने की आस में,चमके वे हिंदी साहित्य के आकाश में,हमें नहीं बनना लेखक/ कवि,ना योग्यता है, ना सामर्थ है,हम तो इस कदर लिपटे है दुःख/ पीड़ा के लीस्फीसाहट में,कि जब भी कुछ लिखते है,आत्मप्रवंचना सा ही लगने लगता है,ज्यों "लासा (चिपचिपा पदार्थ)" में लिपटे हुए,लासा कूटते जा रहे है,जिसका कोई तूक नहीं है, ना कोई परिणाम है,पर दुःख है/ पीड़ा है,और ये दुःख हमें रोने को मजबूर करता है,बहुत मुमकिन है कि आँसू जो शब्दों में ढ़लते है,उनका आकार -प्रकार सुगठित/ सुसंस्कृत ना हो क्योंकि आखिर ये आँसू, पानी ही तो है। @ मनोरंजन

Sunday, October 23, 2016

ख़्वाबों के पंख

ख़्वाबों के पंख
------------------
उड़ना था मुझे,
ख़ूब ऊँचा खुले आसमां में,
बचपन से,
सोते-जागते, चलते-फिरते,
ऐसा लगता था कि अभी उड़ने लगूँ,
अभी भी लगता है कि मैं उड़ सकता हूँ,
पर कहाँ उड़ सका मैं?
सुबह अपने पैरों को घसीटते हुए दफ्तर जाता हूँ,
और फिर सायं को धूल - गरदा और धूप से मुरझाए,
वापस अपने पैरों को घसीटते घर पहुँचता हूँ,
घर?
(वह जगह जहाँ पहुँच कर दिमाग का झनझनाहट और,
पैरों के थकावट पल भर में गायब हो जाता है)
वह घर नहीं है अब मेरे पास,
दिवारें है,जिनसे टकराकर लौट आती है हर आवाज़,
मैं ऊबने लगता हूँ, झुन्झुलाने लगता हूँ,
और कातर नज़रों से देखता हूँ उन दो खिड़कियों को,
जो अभी तैयार नहीं है, सिर्फ ख़ाका खिंचा गया है,
फिर भी मन मुस्कुरा उठता है उन्हें देख कर,
लगता है, ये खिड़कियाँ जब खुल जाएँगी,
उड़ सकूँगा फिर से मैं
जैसे पहले जब "घर" था तो ऐसा ही होता था,
मैं रात में अच्छे से नहा- खाकर सो जाता था,
और ख़्वाब वही आते थे कि मैं उड़ रहा हूँ,
सुबह फुर्ती से उठ कर,
पूरे जोश और उत्साह से दफ़्तर जाता था,
क्योंकि मुझे लगता था,
मैं एक दिन उड़ सकूँगा। @ मनोरंजन

Friday, October 21, 2016

सोचो जरा(1)

सोचो जरा(1)
-----------
मोती चुगने का हक़ सिर्फ हंस को ही क्यों हो?क्या सिर्फ इसलिए कि वह हंस है,"कौवा" जो नित नए प्रयास करता है,
मेहनत करता है,जीवन में बेहतर पाने को संघर्ष करता है,वह मोती क्यों ना चुगे?सैकड़ों वर्षों से मस्तिष्क पटल पर,परत-दर-परत चढ़ाए गए रूढ़ियों को,पोछने में कितना वक्त लगेगा?कब तक राजा का बेटा "राजा" और तवायफ की बेटी तवायफ बनते रहेगी?सोचो जरा,दो बेटियों को पैदा करने वाले शख़्स से मिलने वाला,हर जहीन और समझदार आदमी क्या कहता है?(अनपढ़ों और मूर्खों की तो कोई सीमा ही नहीं होती)"चलो ये तो ईश्वर की मर्जी है, इसमें इंसान क्या करे"अब आगे की सोचो,क्यों?अब आगे की क्यों सोचें?जिनके दो बेटे हो जाते है,वो क्या सारे जहाँ की ख़ुशी पा जाते है,और उन्हें क्या "आगे" के बारे में सोचने की जरुरत ही नहीं है?पर नहीं कहता कोई भी उनसे ऐसा,सैकड़ों सालों की जमी रूढ़ियाँ,यों ललाट के पसीने पोछ देने जितने आसान तो नहीं,सोचो जरा-------------@ Manoranjan


Wednesday, October 19, 2016

एक घर जो मकान रह गया

 एक घर जो मकान रह गया
-------------------------------------
कितने उल्लास/अभिमान से बताते है वे,
एक नम्बर के ईंट चुनवाया है मैंने अपने घर में,
इतने " पिल्लर" यहाँ किसी के घर में नहीं लगे,
मैंने लगवाया है,
रेती, छड़, सिमेंट ,रोड़ी  खरीदा,
तो पैसे को नहीं देखा चीज़ के आगे,
पसीने से तरबतर, सूखते हलक से चिल्लाते,
मजदूरों को ईंट पकड़ाते,
कुछ देर ज्यादा काम करने को निहोरा करते,
थकते नहीं है वे,
बाल्टियों में पानी भर-भर कर पकड़ाती,
चुनवाये गए ईंटों, प्लास्टरों पर पानी की तराई कराती,
वह बुजुर्ग औरत,हौसला बढाती है उनकी,
छत की तराई कराती, हाँफती हुई, अपने सांसों को काबू में करती,
अपने आँचल से चेहरे के पसीने को पोछती हुई,
मुस्कुरा कर अपने पति को हलकी झिड़की देती है,
"क्यों बच्चों जैसे चुहल कर रहे हो"
मुंडेर से पैर फिसल जायेगा,
इस मुंडेर को ऊँची करावा दो,
कल को हमारे नाती-पोते स्वच्छन्द होकर खेलेंगे छत पर,
सात कमरे, एक रसोई, एक स्नानघर,
खूब हवादार दलान  और एक कोठारी मवेशियों के लिए,
सायं को थाली में पति को खाना देते हुए कहती है,
जब पुरा घर भर जायेगा, बेटे-बहुओ से तो,
हम दोनों यहीं दलान में सोयेंगे,
खूब झर -झर  हवा लगता है यहाँ,
माथे पर चुनचुना आए पसीने को आँचल से साफ करती,
अद्भुत संतोष और उत्साह से कहती है,
जब चारों बहुयें सायं को छत पर हवा खाने को टहलेन्गी,
तो ऐसा लगेगा कि जैसे मेला लगा हुआ है,
रंग-बिरंगी साड़ी पहने, उछलते-कूदते बच्चों के साथ,
कितना मनभावन लगेगा  ना जी?
निर्मम वक्त और परिस्थितियों से अनजान,
वे भी बच्चों जैसे मुस्कुराने लगते है,
फिर थोड़ा चुप रह कर कहते है,
कल से दरवाजे लगाने वाले मिस्त्री, पेंट करने वाले आएंगे,
संभाल लोगी ना?
उनका नाश्ता-पानी सब कर लोगी ना?
हौसला रखो, अब पूरा ही हुआ जा रहा है घर अपना,
अपने बाँहों से पानी पोछते, पैरों के बिछिया को घुमाती हुई कहती है,
"लो जी मैं क्या बुढ्ढी हो गई हूँ? जो ऐसा कहते है"
क्या जानते नहीं इन्ही हाथों से अकेले साठ लोगों को बनाया-खिलाया है मैंने,
और वे ठहाका लगा कर हँसने लगते है,
. . . . . . . . . . . . . . . .और घर बन गया,बहुएँ भी आ गई,
दो-तीन सालों में ही नन्हे-मुन्हे भी आ गए,
पर उन्हें हँसते -खिलखिलाते देखने की हसरत रखने वाली आँखें थक गई,
उत्साह, उल्लास से भरा चेहरा मुर्झा गया,
कभी ना थकने वाली का साथ सांसों से छोड़ दिया,
वक्त क्या इतनी तेज़ी से बदलता है?
क्या सोचे होंगे वे ?
जो अब उसी खूब हवादार दलान में एक "ठूंठ"से रह गए है?
जिसके सारे पत्ते, साख, टहनियाँ
एक-एक कर टूटती गई उनसे,
. . . . . . . . . . . . . सात कमरे, एक रसोई, एक स्नानघर खड़े है ज्यों के त्यों,
बंद दरवाजे ,काश्तकारी की हुई,
कभी-कभी हवा के टकराने से बज जाते है,
तो हुलसकर दौड़ते से अंदर जाते है,
फिर ठिठक जाते है,
नहीं, होगा कौन? मन ही मन बोलते है,
फिर दलान में  लगी अपनी पत्नी के तस्वीर को देख,
आँखों को पोछते हुए कहते है,
सचमुच सठिया ही गया हूँ मैं। @ मनोरंजन

Sunday, October 16, 2016

कहानी

कहानी
--------

बात बहुत दिन पुरानी है, जब मैं पैसे घर पर मनीऑर्डर से भेजा करता था। उस दिन सुबह-सुबह ही खा-पीकर पोस्टऑफिस जाने के लिए निकल गया। रस्ते भर मन प्रसन्न रहा, क्योंकि तब घर पर पैसे भेजने का एक अलग ही उत्साह रहता था मन में, मन प्रसन्न हो तो आस-पास का माहौल भी खुशनुमा लगता है, और ऐसे में अपने आप पर गर्व सा महसूस भी होता है कि भाई हम भी कुछ खास है। तो इसीतरह के एहसास लिए हुए मैं पोस्टऑफिस में दाखिल हुआ। वहाँ भीड़ बहुत ज्यादा नहीं थी, मैं लाइन में लग गया। थोड़ी देर के बाद एक लड़का आया, कपडे उसके बिल्कुल गंदे हो रखे थे, वह ख़ुद भी मैला था नहीं गन्दा ही था, उसको देख कर ही बताया जा सकता था कि वह पढ़ा-लिखा नहीं है। पता नहीं इतने सारे लोगों में उसने मुझ में ही क्या देखा कि आकर मेरे पास कहा, भैया थोड़ा मेरा मनीऑर्डर का फार्म भर दो, पैसे घर पर भेजने है। मैं एक बार फिर गर्व के एहसास से भर गया और थोड़ी मदत करने के नियत से मैंने उसका फार्म लेकर भरना शुरू किया, उसने 200 रूपया फार्म पर लिखवाया, मुझे लगा सचमुच बेहद ग़रीब लड़का है, मुझे उससे हमदर्दी भी होने लगी । अब जहाँ पर हम दोनों लोग थे वहाँ से बाकी के लोग थोड़े दूर हो गए थे। उस लडके ने अपने जेब से रूमाल में बंधा एक नोटों की गड्डी निकली और कहा कि भैया ये पैसा हमको बैंक में जमा करना है, कैसे करेंगे? मैंने कहा कि इसके लिए तो तुम्हे बैंक जाना पड़ेगा, पर इतने पैसे तेरे पास आए कहाँ से? मैंने पूछा । उसने कहा कि वह किसी घर में नौकर का काम करता है, उसका मालिक उसे महीने का पगार नहीं देता है, इसलिए मैंने मौका पाकर उसके घर से ये नोटों का बण्डल चुरा लिया है। मेरे मन का समाजवाद तड़प उठा जो अभी बिल्कुल अंकुरित अवस्था में ही था। मेरा उम्र भी उस समय 18 -19 साल से ज्यादा ना था, ऊपर से शरीर भी बेहद कमज़ोर और दुबला-पतला था, शायद इसलिए उसने मुझे ही चुना था अपने मदत के लिए। उस लडके के आँखों ने और उसकी बातों ने मेरे ऊपर एक जादू सा कर दिया था, वह जो भी कह रहा था, मैं बस उसे सुने जा रहा था। उसने कहा कि, भैया आप मुझे कुछ पैसे दे दो क्योंकि मैं अभी घर भाग रहा हूँ, और आप ये मेरा नोट का गड्डी ले लो, क्योकि मुझे तो बैंक में पैसा जमा करने आता नहीं है। उसने अपने जेब से निकाल कर रूमाल में बंधी 100 -100 रुपये की गड्डी मुझे दिखा दी। मेरे मन में लालच आ गया और मैंने उसे अपने पास के 1700 रूपया दे दिया और उसका नोटों का गड्डी लेकर लगभग दौड़ता हुआ घर पहुँचा। ख़ुशी के मरे मेरा दम फुला जा रहा था। मैंने अपने कमरे में जाकर एकदम से दरवाज़ा बंद कर लिया और उस रूमाल में बंधी नोटों की गड्डी को खोल। उस गड्डी में सिर्फ एक नोट 100 का था,बाकी उसके नीचे कागज को नोट के साइज़ में काट कर इसतरह रखा गया था की गड्डी को उलट-पुलट कर देखने पर भी पता नहीं चलता था कि 100 के नोट के अंदर कागज का पुलिंदा रखा है। बस और क्या अब जो होना था मेरे मन को, दिमाग को और मेरे चेहरे को होना था। सब सिर्फ सेकेण्ड भर में झुलस कर काला पड़ गया,..... @ मनोरंजन

बनेगा कुछ ना कुछ.......तुम देख लेना

बनेगा कुछ ना कुछ.......तुम देख लेना
-----------------------------------------
जीवन के परिधि के,
अंदर-बाहर, यहाँ-वहाँ, जहाँ-तहाँ,
बिखरे हुए दर्द के टुकड़ों को,
शिद्धत से जीने दो मन को,
इसे बहलाओ मत, झुठलाओ मत,
भूलने मत दो अपनी स्मृति से,
एकनिष्ठ होकर एकाकार होने दो,
बनेगा कुछ ना कुछ,
तुम देख लेना। .........
ताप से खौलते पानी को,
भाप बनने दो,
बौद्धिकता,मुल्य और प्रतिमानों के,
बौछार मत फेंको,
संघनित होने दो इस भाप को,
बूंदों में ढलने दो,
बनेगा कुछ ना कुछ,
तुम देख लेना।
तिमिर को गहराने दो,
झूठे दिलासा के लौ जला कर,
टुकड़ों में मत बांटों इसे,
घबराओ मत,
समझौतों के आगे हो ना नत,
अपमान, पीड़ा, पश्चाताप,
विपत्ति, विकृति और संताप,
को सह लेने दो मन को,
छन-छन कर बहने दो आँखों से,
बनेगा कुछ ना कुछ,
तुम देख लेना।
उलझनों में उलझ जाना मत,
भावनाओं में बहक जाना मत,
बहने दो अंधड़, तूफ़ान,
उखड़ने दो जो उखड सकता है,
बिखर जाने दो जो बिखर सकता है,
जो बचा रह जाएगा आखिर,
वही बस तुम्हारा है,
उसी से बनेगा आकार तुम्हारा,
तुम देख लेना। @ मनोरंजन