आँसू जो शब्दों में ढलते है ------------------------------लिखना नहीं चाहता मैं इसे,पर मजबूर हूँ,ख़ुद के तसल्ली के लिए/ मन बहलाने के लिएलिखना जरूरी है,किसी के दुर्भाग्य की कहानी/कविता में कोई क्यों रस लेगा?पर लिखना आत्मसर्वेक्षण भी तो हो सकता है,बने वे लोग लेखक/ कविजो पूरे मनोयोग से जुड़े हुए है इसमें / डूबे हुए है मोती पाने की आस में,चमके वे हिंदी साहित्य के आकाश में,हमें नहीं बनना लेखक/ कवि,ना योग्यता है, ना सामर्थ है,हम तो इस कदर लिपटे है दुःख/ पीड़ा के लीस्फीसाहट में,कि जब भी कुछ लिखते है,आत्मप्रवंचना सा ही लगने लगता है,ज्यों "लासा (चिपचिपा पदार्थ)" में लिपटे हुए,लासा कूटते जा रहे है,जिसका कोई तूक नहीं है, ना कोई परिणाम है,पर दुःख है/ पीड़ा है,और ये दुःख हमें रोने को मजबूर करता है,बहुत मुमकिन है कि आँसू जो शब्दों में ढ़लते है,उनका आकार -प्रकार सुगठित/ सुसंस्कृत ना हो क्योंकि आखिर ये आँसू, पानी ही तो है। @ मनोरंजन
Followers
Wednesday, October 26, 2016
आँसू जो शब्दों में ढलते है
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment
Write here