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Sunday, October 23, 2016

ख़्वाबों के पंख

ख़्वाबों के पंख
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उड़ना था मुझे,
ख़ूब ऊँचा खुले आसमां में,
बचपन से,
सोते-जागते, चलते-फिरते,
ऐसा लगता था कि अभी उड़ने लगूँ,
अभी भी लगता है कि मैं उड़ सकता हूँ,
पर कहाँ उड़ सका मैं?
सुबह अपने पैरों को घसीटते हुए दफ्तर जाता हूँ,
और फिर सायं को धूल - गरदा और धूप से मुरझाए,
वापस अपने पैरों को घसीटते घर पहुँचता हूँ,
घर?
(वह जगह जहाँ पहुँच कर दिमाग का झनझनाहट और,
पैरों के थकावट पल भर में गायब हो जाता है)
वह घर नहीं है अब मेरे पास,
दिवारें है,जिनसे टकराकर लौट आती है हर आवाज़,
मैं ऊबने लगता हूँ, झुन्झुलाने लगता हूँ,
और कातर नज़रों से देखता हूँ उन दो खिड़कियों को,
जो अभी तैयार नहीं है, सिर्फ ख़ाका खिंचा गया है,
फिर भी मन मुस्कुरा उठता है उन्हें देख कर,
लगता है, ये खिड़कियाँ जब खुल जाएँगी,
उड़ सकूँगा फिर से मैं
जैसे पहले जब "घर" था तो ऐसा ही होता था,
मैं रात में अच्छे से नहा- खाकर सो जाता था,
और ख़्वाब वही आते थे कि मैं उड़ रहा हूँ,
सुबह फुर्ती से उठ कर,
पूरे जोश और उत्साह से दफ़्तर जाता था,
क्योंकि मुझे लगता था,
मैं एक दिन उड़ सकूँगा। @ मनोरंजन

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