एक घर जो मकान रह गया
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कितने उल्लास/अभिमान से बताते है वे,
एक नम्बर के ईंट चुनवाया है मैंने अपने घर में,
इतने " पिल्लर" यहाँ किसी के घर में नहीं लगे,
मैंने लगवाया है,
रेती, छड़, सिमेंट ,रोड़ी खरीदा,
तो पैसे को नहीं देखा चीज़ के आगे,
पसीने से तरबतर, सूखते हलक से चिल्लाते,
मजदूरों को ईंट पकड़ाते,
कुछ देर ज्यादा काम करने को निहोरा करते,
थकते नहीं है वे,
बाल्टियों में पानी भर-भर कर पकड़ाती,
चुनवाये गए ईंटों, प्लास्टरों पर पानी की तराई कराती,
वह बुजुर्ग औरत,हौसला बढाती है उनकी,
छत की तराई कराती, हाँफती हुई, अपने सांसों को काबू में करती,
अपने आँचल से चेहरे के पसीने को पोछती हुई,
मुस्कुरा कर अपने पति को हलकी झिड़की देती है,
"क्यों बच्चों जैसे चुहल कर रहे हो"
मुंडेर से पैर फिसल जायेगा,
इस मुंडेर को ऊँची करावा दो,
कल को हमारे नाती-पोते स्वच्छन्द होकर खेलेंगे छत पर,
सात कमरे, एक रसोई, एक स्नानघर,
खूब हवादार दलान और एक कोठारी मवेशियों के लिए,
सायं को थाली में पति को खाना देते हुए कहती है,
जब पुरा घर भर जायेगा, बेटे-बहुओ से तो,
हम दोनों यहीं दलान में सोयेंगे,
खूब झर -झर हवा लगता है यहाँ,
माथे पर चुनचुना आए पसीने को आँचल से साफ करती,
अद्भुत संतोष और उत्साह से कहती है,
जब चारों बहुयें सायं को छत पर हवा खाने को टहलेन्गी,
तो ऐसा लगेगा कि जैसे मेला लगा हुआ है,
रंग-बिरंगी साड़ी पहने, उछलते-कूदते बच्चों के साथ,
कितना मनभावन लगेगा ना जी?
निर्मम वक्त और परिस्थितियों से अनजान,
वे भी बच्चों जैसे मुस्कुराने लगते है,
फिर थोड़ा चुप रह कर कहते है,
कल से दरवाजे लगाने वाले मिस्त्री, पेंट करने वाले आएंगे,
संभाल लोगी ना?
उनका नाश्ता-पानी सब कर लोगी ना?
हौसला रखो, अब पूरा ही हुआ जा रहा है घर अपना,
अपने बाँहों से पानी पोछते, पैरों के बिछिया को घुमाती हुई कहती है,
"लो जी मैं क्या बुढ्ढी हो गई हूँ? जो ऐसा कहते है"
क्या जानते नहीं इन्ही हाथों से अकेले साठ लोगों को बनाया-खिलाया है मैंने,
और वे ठहाका लगा कर हँसने लगते है,
. . . . . . . . . . . . . . . .और घर बन गया,बहुएँ भी आ गई,
दो-तीन सालों में ही नन्हे-मुन्हे भी आ गए,
पर उन्हें हँसते -खिलखिलाते देखने की हसरत रखने वाली आँखें थक गई,
उत्साह, उल्लास से भरा चेहरा मुर्झा गया,
कभी ना थकने वाली का साथ सांसों से छोड़ दिया,
वक्त क्या इतनी तेज़ी से बदलता है?
क्या सोचे होंगे वे ?
जो अब उसी खूब हवादार दलान में एक "ठूंठ"से रह गए है?
जिसके सारे पत्ते, साख, टहनियाँ
एक-एक कर टूटती गई उनसे,
. . . . . . . . . . . . . सात कमरे, एक रसोई, एक स्नानघर खड़े है ज्यों के त्यों,
बंद दरवाजे ,काश्तकारी की हुई,
कभी-कभी हवा के टकराने से बज जाते है,
तो हुलसकर दौड़ते से अंदर जाते है,
फिर ठिठक जाते है,
नहीं, होगा कौन? मन ही मन बोलते है,
फिर दलान में लगी अपनी पत्नी के तस्वीर को देख,
आँखों को पोछते हुए कहते है,
सचमुच सठिया ही गया हूँ मैं। @ मनोरंजन
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कितने उल्लास/अभिमान से बताते है वे,
एक नम्बर के ईंट चुनवाया है मैंने अपने घर में,
इतने " पिल्लर" यहाँ किसी के घर में नहीं लगे,
मैंने लगवाया है,
रेती, छड़, सिमेंट ,रोड़ी खरीदा,
तो पैसे को नहीं देखा चीज़ के आगे,
पसीने से तरबतर, सूखते हलक से चिल्लाते,
मजदूरों को ईंट पकड़ाते,
कुछ देर ज्यादा काम करने को निहोरा करते,
थकते नहीं है वे,
बाल्टियों में पानी भर-भर कर पकड़ाती,
चुनवाये गए ईंटों, प्लास्टरों पर पानी की तराई कराती,
वह बुजुर्ग औरत,हौसला बढाती है उनकी,
छत की तराई कराती, हाँफती हुई, अपने सांसों को काबू में करती,
अपने आँचल से चेहरे के पसीने को पोछती हुई,
मुस्कुरा कर अपने पति को हलकी झिड़की देती है,
"क्यों बच्चों जैसे चुहल कर रहे हो"
मुंडेर से पैर फिसल जायेगा,
इस मुंडेर को ऊँची करावा दो,
कल को हमारे नाती-पोते स्वच्छन्द होकर खेलेंगे छत पर,
सात कमरे, एक रसोई, एक स्नानघर,
खूब हवादार दलान और एक कोठारी मवेशियों के लिए,
सायं को थाली में पति को खाना देते हुए कहती है,
जब पुरा घर भर जायेगा, बेटे-बहुओ से तो,
हम दोनों यहीं दलान में सोयेंगे,
खूब झर -झर हवा लगता है यहाँ,
माथे पर चुनचुना आए पसीने को आँचल से साफ करती,
अद्भुत संतोष और उत्साह से कहती है,
जब चारों बहुयें सायं को छत पर हवा खाने को टहलेन्गी,
तो ऐसा लगेगा कि जैसे मेला लगा हुआ है,
रंग-बिरंगी साड़ी पहने, उछलते-कूदते बच्चों के साथ,
कितना मनभावन लगेगा ना जी?
निर्मम वक्त और परिस्थितियों से अनजान,
वे भी बच्चों जैसे मुस्कुराने लगते है,
फिर थोड़ा चुप रह कर कहते है,
कल से दरवाजे लगाने वाले मिस्त्री, पेंट करने वाले आएंगे,
संभाल लोगी ना?
उनका नाश्ता-पानी सब कर लोगी ना?
हौसला रखो, अब पूरा ही हुआ जा रहा है घर अपना,
अपने बाँहों से पानी पोछते, पैरों के बिछिया को घुमाती हुई कहती है,
"लो जी मैं क्या बुढ्ढी हो गई हूँ? जो ऐसा कहते है"
क्या जानते नहीं इन्ही हाथों से अकेले साठ लोगों को बनाया-खिलाया है मैंने,
और वे ठहाका लगा कर हँसने लगते है,
. . . . . . . . . . . . . . . .और घर बन गया,बहुएँ भी आ गई,
दो-तीन सालों में ही नन्हे-मुन्हे भी आ गए,
पर उन्हें हँसते -खिलखिलाते देखने की हसरत रखने वाली आँखें थक गई,
उत्साह, उल्लास से भरा चेहरा मुर्झा गया,
कभी ना थकने वाली का साथ सांसों से छोड़ दिया,
वक्त क्या इतनी तेज़ी से बदलता है?
क्या सोचे होंगे वे ?
जो अब उसी खूब हवादार दलान में एक "ठूंठ"से रह गए है?
जिसके सारे पत्ते, साख, टहनियाँ
एक-एक कर टूटती गई उनसे,
. . . . . . . . . . . . . सात कमरे, एक रसोई, एक स्नानघर खड़े है ज्यों के त्यों,
बंद दरवाजे ,काश्तकारी की हुई,
कभी-कभी हवा के टकराने से बज जाते है,
तो हुलसकर दौड़ते से अंदर जाते है,
फिर ठिठक जाते है,
नहीं, होगा कौन? मन ही मन बोलते है,
फिर दलान में लगी अपनी पत्नी के तस्वीर को देख,
आँखों को पोछते हुए कहते है,
सचमुच सठिया ही गया हूँ मैं। @ मनोरंजन
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