सोचो जरा(1)
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मोती चुगने का हक़ सिर्फ हंस को ही क्यों हो?क्या सिर्फ इसलिए कि वह हंस है,"कौवा" जो नित नए प्रयास करता है,
मेहनत करता है,जीवन में बेहतर पाने को संघर्ष करता है,वह मोती क्यों ना चुगे?सैकड़ों वर्षों से मस्तिष्क पटल पर,परत-दर-परत चढ़ाए गए रूढ़ियों को,पोछने में कितना वक्त लगेगा?कब तक राजा का बेटा "राजा" और तवायफ की बेटी तवायफ बनते रहेगी?सोचो जरा,दो बेटियों को पैदा करने वाले शख़्स से मिलने वाला,हर जहीन और समझदार आदमी क्या कहता है?(अनपढ़ों और मूर्खों की तो कोई सीमा ही नहीं होती)"चलो ये तो ईश्वर की मर्जी है, इसमें इंसान क्या करे"अब आगे की सोचो,क्यों?अब आगे की क्यों सोचें?जिनके दो बेटे हो जाते है,वो क्या सारे जहाँ की ख़ुशी पा जाते है,और उन्हें क्या "आगे" के बारे में सोचने की जरुरत ही नहीं है?पर नहीं कहता कोई भी उनसे ऐसा,सैकड़ों सालों की जमी रूढ़ियाँ,यों ललाट के पसीने पोछ देने जितने आसान तो नहीं,सोचो जरा-------------@ Manoranjan
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मोती चुगने का हक़ सिर्फ हंस को ही क्यों हो?क्या सिर्फ इसलिए कि वह हंस है,"कौवा" जो नित नए प्रयास करता है,
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