कितना अच्छा लगता था,
लिखना तुम्हे सोच कर,
लिखना बस सिर्फ अपने लिए,
ना कहीं छपने की चाह थी,
ना तारीफ़ की/ इनाम की हवस,
वो लम्हा बेसकीमती/ अनमोल होता था,
जब तुम्हे सोचते हुए लिखता था,
रौशनी चाहूँ ओर होती थी,
हर हर्फ़ चमकता था तुम्हारे दाँतों की तरह,
इधर लोग कहते है कि " वह कविता नहीं है"
और मैं कविता लिखने के प्रयास में,
खोए जा रहा हूँ भीड़ के अँधेरे में,
सर्दियों में मन अनायास ही उदास हो जाता है।@ मनोरंजन
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