सच क्या है?
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आज-कल राजनैतिक गलियारे में क्या हो रहा है, समझना बिल्कुल मुश्किल है। एक तरफ भाजपा के नेतृत्व वाला NDA सरकार, मोदीजी के सतर्क, सूझ-बुझ और दूरदृष्टि से बेहतर काम करती नज़र आ रही है, वहीँ विपक्ष सरकार पर इतने गंभीर/ संगीन आरोप लगातार लगाए जा रहे है, जितना गंभीर आरोप शायद ही भारत के किसी भी केंद्र या राज्य सरकार पर लगाए गए हो। जहाँ एक तरफ आमजन इस सरकार के साहसिक और परिवर्तनशील नीतियों के साथ गहरा जुड़ता हुआ प्रतीत हो रहा है, वहीँ विपक्ष इसे एक छलावा/ षणयंत्र करार देने पर आमदा, इसे एक तनाशाह के उदय की कहानी बता कर आमजन में भय/ संसय को जन्म देना चाहता है।स्पष्ट है कि देश में आर-पार की राजनैतिक लड़ाई चल रही है, जो इस राजनैतिक कसमकश में अपने अस्तित्व को बचाए रख पायेगा, वही आगे भारतीय राजनीति की दशा-दिशा निर्धारित करेगा। असमंजस/ अस्पष्ट विचारधारा/ और अवसरवादी राजनीति करने वाले बिल्कुल ख़त्म हो जायेंगे।
बाहरी तौर पर देखा जाए तो मोदी सरकार का हर फैसला जनहितकारी/ आमजन में गर्व/स्वभिमान की भावना का संचार कर रहा है, और विपक्ष का हर आरोप निराधार और कोरा विलाप जैसा लग रहा है। सबसे पहले दो ऐसे मुख्यमंत्री की बात करते है, जो मोदी सरकार के स्पष्ट विरोधी है। अरविन्द केजरीवाल पहले ही अपनी छवि एक ऐसे नेता की बना चुके है, जिसकी हर बात/ आरोप बकवास होता है, और सिर्फ उनके राजनैतिक स्वार्थ से प्रेरित होता है, वहीँ ममता बनर्जी की छवि एक संघर्षशील नेत्री की रही है, मगर मोदी विरोध के नाम पर वह भी हर सीमा को पार करती नज़र आ रही है। केंद्र सरकार, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में है, इसलिए क्या उसे अपने अधिकारों/कर्तव्यों को सिर्फ इसलिए नहीं निभाना चाहिए क्योंकि मोदी एक आश्चर्यजनक विकल्प बन कर देश का नेतृत्व कर रहे है, और उनके जैसे/ उनके समकक्ष लोग उनसे चिढ़े हुए है? ममता बनर्जी का उनके प्लेन को क्रैश कराने का/ कोलकत्ता में आर्मी को तैनात कर उनके सरकार का तख्तापलट का आरोप बिल्कुल निराधार/ नाटक/ प्रायोजित प्रतीत होता है, क्योंकि केंद्र सरकार का यह कर्तव्य है कि वह देश की सुरक्षा-व्यवस्था पर नज़र रखें, ऐसे नाटक करने से आर्मी, बंगाल सरकार के अधीन तो नहीं आ जाएगी? तृणमूल काँग्रेस के सांसद, सदन में कह रहे है कि आजाद भारत के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ, नहीं हुआ तो अब होने में क्या हर्ज़ है?ऐसा बहुत कुछ हो रहा है, जो पहले नहीं हुआ ,तो क्या करें? एक सरकार जो परिवर्तन के नाम पर ही सत्ता में आई है, देश को सशक्त/सक्षम /समृद्ध राष्ट्र बनाने के वादे के साथ ही बहुमत हासील किया है, उसे पाँच साल काम करने देने में क्या हर्ज है? वह तानाशाह है तो हम देशवासी एक तानाशाह को भी भुगत लेंगे, पहले ये साफ़ तो हो जाए फिर 125 करोड़ जनता है, इस जनता ने अंग्रेजों तक को सफलता पूर्वक भगा दिया, इंदिरा गाँधी जी के ऐसा करने के मंसूबों पर दो साल में पानी फेर दिया, तो यह जनता मोदी सरकार को उखाड़ नहीं फेंकेगी?
नोटबंदी के बाद से ही ऐसा महौल बनाया जा रहा है कि किसी तरह आमजन के दिमाग में "अपातकाल " की भयवहता भर दी जाए और ऐसा करने के लिए बैंकों के बाहर लाइन में लगे लोगों के आक्रोश/ इस दौरान हुई मौत के तरफ इशारा किया जा रहा है, पर जमीन पर तो हम भी रहते है, लोगों को हो रही परेशानियों को ना सिर्फ देख रहे है, बल्कि भुगत भी रहे है, फिर भी अधिसंख्य जनसमुदाय के जुबां पर सरकार के फैसले का स्वागत ही है, ऐसा क्यों?
देश में और भी तो विपक्षी पार्टी के मुख्यमंत्री है, वे इस फैसले का स्वागत क्यों कर रहे है? क्या उन्हें अपने राज्य में हो रही मौतों का/ लोगों के आक्रोश का जरा भी परवाह नहीं है ? उन्हें अपने राज्य में लोगों ने भाजपा और मोदी को नजरअंदाज कर जीताया है, उन्हें अपने राज्य के लोगों का फ़िक्र क्यों नहीं है? इसमें सबसे अहम नाम उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की है, इसमें नवीन पटनायक ऐसे नेता माने जाते है, जो सिर्फ अपने राज्य के जनता को समर्पित, पूर्वाग्रहमुक्त राजनीति करते है। ख़ासकर सबसे ज्यादा परेशानी इन्ही राज्यों में होनी है (बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल,उत्तर प्रदेश) ये राज्य अशिक्षा और पिछड़ेपन के लिए जाने जाते है, इसलिए इन राज्यों में नोटबंदी से अधिसंख्य लोगों को प्रभावित होना है। मगर लोग परेशान होने को तैयार है, तभी तो बिहार और उड़ीसा से स्पष्ट आवाज़ आ जाती है कि हम परेशान होने को तैयार है, उत्तर प्रदेश में चुनाव है, इसलिए भाजपा के समर्थन में कुछ कहा नहीं जा सकता, दोनों प्रमुख पार्टियों की अपनी साख दांव पर लगी है, और काँग्रेस अभी तक अपने असमंजस के स्थिति से उभर नहीं पाई है। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री, नोटबंदी के स्पष्ट विरोध में है, मगर सबसे ज्यादा उनके राज्य में जान-धन खातों में पैसा जमा हो रहा है( इस मामले में यह राज्य पिछड़ा नहीं, बल्कि एक संपन्न राज्य बन जाता है)
अब सवाल उठता है कि क्या मोदी जी ने बिहार और उड़ीसा के मुख्यमंत्रियों को खरीद लिया है? अगर हाँ तो, भाई अगर कोई शख़्स इतना ताकतवर है कि वह दो बड़े प्रदेश के विपक्षी पार्टी के मुख्यमंत्रियों को अपने साथ मिला सकता है, पुरी आर्मी उसके इशारे पर कुछ भी करने को तैयार है तो हमें भी इस तानाशाह के तमाशे देखना होगा। और हमें इस अवसर को हाथ से जाने नहीं देना चाहिए, क्योंकि इतिहास में ऐसा अवसर बहुत कम ही आता है, जब देश का बागडोर इतने ताकतवर नेता के हाथ में हो। @ मनोरंजन कुमार तिवारी

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