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Thursday, December 29, 2016

वक़्त

वक़्त
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वक़्त के धूल से भर गये,
ना जाने कितने तालाब, कुँए और नहर,
ना जाने कितने चबूतरे और चौपाल
समतल और सुनसान हो गए,
ना जाने कितने बग़ीचे वीरान हो गए,
वक़्त के अंधड़ों में,
झर गए ना जाने कितने ही पेड़ों के,
ना सिर्फ पत्ते, शाखाएं भी,
दूर कहीं बियाबान में खड़ा ठूंठ,
वक़्त की बेहरमी की कहानी बयाँ करता है,
वक़्त क्या कुछ नहीं करता?
पुराने ज़ख्मो को भरता है,
नए जख़्म बनाता है,
कितने ही ऐसे नाम जो कभी
प्राणामृत हुआ करते थे,
वक़्त ने उन्हें विस्मृत कर दिया,
वक़्त सिखाता है कि
जिंदगी सिर्फ इतनी ही नहीं है,
अभी और भी निशान बाकी है वक़्त के,
जो किस रंग के होंगे नहीं पता,
पता सिर्फ इतना है कि
वक़्त के साथ कदम मिला कर चलने के प्रयास में,
घिसटते जा रहे है वक़्त के साथ में। @ मनोरंजन 

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