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Friday, March 31, 2017

जीवन का रफ़्तार

जीवन का रफ़्तार
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बोलो मत,
शोर मत करो बेटा,
एकाग्र होकर सुनो परी,
साँझ के नीरवता में,
बजते हुए इस संगीत को,
पक्षियों के चहचआहट को,
उतरने दो अपने अंतर्मन में,
ये अमूल्य निधि छुपा कर रख लो,
अपने अंतर्मन के किसी कोने में,
देखो उधर
स्वच्छ, निर्मल आकाश में,
बिखरे, टिमटिमाते तारों को,
छुपा लो अपनी आँखों में कहीं,
ये अमूल्य संगीत, ये दृश्य
शायद देख ना पाओगी कभी,
कि जिस रफ़्तार में सिमटती जा रही है जमीं,
सिमटता जा रहा है आसमान,
मुझे अंदेशा है,
कि कभी चाहोगी सुनना इस संगीत को,
देखना चाहोगी इस दृश्य को तो,
वक्त नहीं होगा तुम्हारे पास,


या वक्त होगा पर ये दृश्य नहीं होगा। @मनोरंजन

Thursday, March 30, 2017

हमें इनकार है

हमें इनकार है
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देश बदल रहा है,
लोगों की सोच भी बदल रही है,
हम बड़ी तेज़ी से दो धड़ों में बंटते जा रहे है,
एक समर्थन में, एक विरोध में,
हम इतने संकिर्ण क्यों होते जा रहे है?
ये समर्थन या विरोध के अलावा
हमारे जीवन में कुछ और नहीं है क्या?
हमारे दोस्त, हमारे रहवर,
हमारे बच्चें, हमारा परिवार,
हमारा गाँव, गाँव की स्वच्छन्दता,
हमारे मन/मस्तिष्क के अनंत दुनियाँ,
ख्वाबों, ख्वाहिसों और सपनों की दुनियाँ,
मधुर स्मृतियों, दर्द और आँसुओं की दुनियाँ,
हमारे शौक, हमारी खुशियाँ
मिलते-बिछड़ते अपने दिल-ए -अजीजों की दुनियाँ,
ये सब भी तो है हमारे जीवन के हिस्से,
हम इनकार करते है,
आपके किसी भी धड़े में सामिल होने से। @ मनोरंजन 

Wednesday, March 29, 2017

तुम घर वापस आ जाना

तुम घर वापस आ जाना
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सुनो,
जब दोस्ती, प्यार,शादी,
कैरीयर, नौकरी
और तुम्हारे आस-पास के
काबिल, कामयाब और सुसंस्कृत
लोगों से मन ऊबने लगे तो,
तुम अपने घर वापस आना,
वह घर जहाँ माँ -पिता
भाई-बहन और अन्य रिश्तेदार है,
वह घर तुम्हारे मन को शीतलता देगा,
क्योंकि इस घर के लोग
भले ही उतने,
काबिल, कामयाब और सुसंस्कृत नहीं है,
मगर वे जानते है तुम्हे सबसे बेहतर,
देखा है उन लोगों ने तुम्हे
लड़खड़ाते हुए/तलमलाते हुए चलना,
गिरना और उठना तुम्हारा,
देखा है,
तुम्हे छोटे निकर में या बिना निकर के,
वे जानते है कि तुम गलतियाँ करते हो,
और जब गलतियाँ करते हो तो
तुम्हारे चेहरे पर जो लिखा होता है,
उसे पढना जानते है,
छुपा नहीं है कुछ भी तुम्हारा उनसे,
इसलिए पुरानी अच्छी-बुरी बातें सोच कर,
संकोच मत करना,
मन में कोई कड़वी याद लाकर,
घर वापस आने का विचार मत त्यागना,
क्योंकि वह शीतल छाँव,
हर वक्त तुम्हे अपने छाती से लगाने को,
व्याकुल रहते है,
सुनो,
तुम्हारा जब भी मन घबराए,
तुम घर वापस आ जाना । @ मनोरंजन

Monday, March 27, 2017

किन्नर कथा

किन्नर कथा 
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एक अच्छा -खासा, चलता-फिरता आदमी(पुरुष), जो दौड़ सकता है, भाग सकता है, मगर वह दौड़ता नहीं, जरुरत पड़ने पर भागता भी नहीं,
जैसे "महवारी " के दिनों में हो और आधुनिक "पैड " भी इस्तेमाल नहीं करता हो। चेहरे पर दुःख नहीं, दर्द नहीं मगर एक बेचारगी चप्पा है। 
पुरुष होकर भी शायद स्त्रैण होने की बेचारगी, या खुद को ना पुरुष समझ पाता है ना स्त्री, इसकी बेचारगी।सर के बाल बहुत लम्बे कर लिया है उसने, वह अपने बालों को इतना प्यार करता है, जितना शायद कोई स्त्री भी नहीं करती होगी। दिन-भर वह अपने बालों को सवाँरने, धोने में लगा रहता है। अगर कोई उसे उपहार देता है तो वो बहुत खुश होता है। कपडे भी लड़कियों वाले पहनता है, क्रीम, लिपस्टिक, पावडर, तेल, अच्छे साबुन, शैम्पू उसके लिए अनमोल उपहार है 
 दाढ़ी, मूँछ और सीने पर बाल है, मगर उसे इन बालों से असुविधा होती है, उसका बस चले तो वह इन सभी गैर जरुरी बालों को हमेशा के लिए साफ़ कर दे। 
संकोच और झिझक से सिमटा रहता है हर वक्त, सिर्फ कुछ करीब बने लोगों से धीमी आवाज में बात करता है, उनके साथ ही खाता-सोता है।आप कहेंगे इसमें आश्चर्यजनक तो कुछ भी नहीं है, ऐसा ही तो होते है किन्नर मगर यहाँ एक पेंच है। किन्नर होते होंगे ऐसे मगर वह एक किन्नर नहीं है, पुरुष है और किन्नर बन कर रहने के लिए मजबूर है।साऊथ परगना जिला, पश्चिम बंगाल का रहने वाला यह शख़्स बिहार में मधेपुरा से लेकर बक्सर जिला तक पहुँचा है। यह जब आठ-दश साल का होगा तभी किसी ने इसे लाइन होटल चलने वाले के हाथ बेचा था। उस समय से लेकर अभी पैंतीस वसंत देख चुका महेश एक हाथ से दूसरे हाथ में बेचा जाता रहा है।घर-परिवार होगा कहीं, पैदा करने वाले माँ-बाप भी होंगे, मगर भूल चूका है वह अपने परिवार को, जो उसे खरीद लेता है वही उसका मालीक/उसका उस्ताद होता है, उसका गुरु/उसका भगवान होता है। वह काम करता है, मगर उसके काम करने के मजदूरी नहीं मिलती, बस खाना -पहनना और उसी उस्ताद के साथ सो जाना, इतनी सी ही है उसकी जिंदगी। वह अपने उस्ताद से कितना प्यार करता है, बताने में उसे कोई संकोच नहीं, उसकी बातें इश्क़ को एक नई ऊँचाई प्रदान करती है, और हमारे जैसे लोग सोच में पड़ जाते है कि " क्या सच में हमने कभी सच्चा इश्क़ नहीं किया?" " क्या सच में हम अपने महबूब में रब को देखने से महरूम रह गए?" वह इश्क़ को बिल्कुल एक अलग ही तरह से परिभाषित करता है, जैसे महान कवियों ने/ लेखकों ने कभी सोचा होगा, बावजूद इसके कि वह जानता है कि उसके उस्ताद ने उसे ख़रीदा है पैसा देकर और जरूरत पड़ने पर बेच भी देगा। फिर उसका मालिक/उसका उस्ताद/उसका महबूब/ उसका सबकुछ कोई और होगा। क्या वह अपने पहले के महबूब को कभी याद करता है? पुछने पर झेंप जाता है, और अंत तक जबाब नहीं देता जैसे कोई गूढ रहस्यों वाली स्त्री हो। विडम्बना यह है कि, उसे समझाया नहीं जा सकता कि वह एक चलता-फिरता इंसान है, उसे कोई बेच नहीं सकता, कोई खरीद नहीं सकता, कोई उसे खाने-पहनने को देता है तो उससे काम करवाता है, उसकी मेहनताना है। मैंने कोशिश की , उसे समझाया कि वह चाहे तो इतना ही मेहनत करके वह पैसे कमा सकता है, और पैसे बचा कर अपना एक परिवार, एक घर बना सकता है। मैंने उसे डराया भी कि उसे पुलिस पकड़ सकती है, उसके उस्ताद को भी क्योंकि इक्कीसवीं सदी है यह और देश में इस तरह इंसानो को बेचना -खरीदना ज़ुर्म है। मैंने उसे भड़काया भी कि छोटे-छोटे बच्चों की तस्करी होती है, मज़बूर बच्चे कुछ नहीं कर पाते, मगर तुम तो जवान हो, तुम्हे कोई बेचता है तो तुम्हे कुछ मिलता भी नहीं, फिर भाग क्यों नहीं जाते दिल्ली,सुरत , मुम्बई कहीं मगर सब सिफ़र ! वह अपने महबूब से जूदा होने के नाम से ही रोने लगता है। वह किन्नर नहीं, पुरुष है, जिसका पुरुषार्थ चूक गया है। @ मनोरंजन

Thursday, March 16, 2017

देश और समाज का माहौल :- एक चिंतन

देश और समाज का माहौल :- एक चिंतन
किसी बड़े साहित्यकार/समाजसेवी से एक जगह लिखा है कि "जब कोई मजदूर/किसान/कामगार अपने बच्चों को सिर्फ इसलिए पढ़ाता है कि बड़ा होकर उसका बेटा साहब बन जाये, उसे जीतोड़ मेहनत नहीं करना पड़े" तो वह मजदूर/किसान/कामगार अपने काम का/अपने परिश्रम का तौहीन कर रहा होता है, अपने काम को /अपने परिश्रम को इतना हेय दृष्टि से देखने वाले लोगों का देश कैसा होगा? बिल्कुल हमारे भारत देश जैसा ही होगा। शिक्षा बहुत जरूरी है मानव के सम्पूर्ण विकास के लिए, एक बेहतर इंसान के निर्माण के लिए, मगर कोई पिता अपने बच्चों को सिर्फ इसलिए पढाये कि बड़ा होकर उसे काम नहीं करना पड़े, सिर्फ ओहदे का इस्तेमाल करके घर भर जाये तो यह शिक्षा बहुत दोषपूर्ण है। होता भी यही है सिर्फ मजदूर/किसान/कामगार ही नहीं हममें से अधिसंख्य लोग अपने परिश्रम से/अपने काम से ऊबे होते है, और दूसरों के बनती बड़ी-बड़ी कोठियों/कारों को देख कर आह भरते है कि काश हम थोड़े और पढ़-लिख कर उसके जैसा बन जाते, उसके पद को पा जाते तो हमारे पास भी यह सब होता। यहाँ स्पष्ट होता है कि वह बड़ी-बड़ी कोठियाँ/ कार सिर्फ मासिक वेतन से नहीं बनते, हम सब जानते है कि यह पैसा बेईमानी का पैसा है, फिर भी हम उनके जैसा ही बनना चाहते है। पढ़ते समय/प्रतियोगी परीक्षाओं के तैयारियों के समय बहुत कम मित्र ऐसे थे जो बड़ा ऑफिसर बन कर देश के भ्रष्टाचार को ख़त्म करना चाहता हो, देश के हालात को बदलना चाहता हो, अधिसंख्य मित्रों का मकसद सिर्फ परीक्षा पास कर बड़ा आदमी बनने की चाह ही रहती है।
देश के हालात तब तक नहीं बदल सकता जब निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति /मजदूर/किसान/कामगार को सम्मान के नज़र से नहीं देखा जाने लगेगा। लोग कहते है कि मोदी जी के आने से देश का माहौल बदला है, मगर हम सब जानते है कि देश के माहौल को कोई मोदी/कोई सरकार नहीं बदल सकती। हाँ एक उम्मीद जरूर पैदा हुई है कि देश बदलेगा, मगर देश तब बदलेगा जब यहाँ रहने वाले लोगों का सोच बदलेगा। मोदी जी/ या सरकार क्या इस दिशा में कोई काम कर सकते है कि सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति/मजदूर/किसान/कामगार को सम्मान के दृष्टि से देखा जाने लगेगा?
हमारे देश में/हमारे समाज में या यूँ भी कह सकते है पुरी दुनिया में कामयाब लोगों की कामयाबी देखी जाती है, मेहनतकश लोगों की मेहनत नहीं देखी जाती। सम्मान उसी का होता है जो येनकेन प्रकारेण सीढ़ियाँ चढ़ते -चढ़ते ऊपर पहुँच जाता है।
सिर्फ मजदूर/किसान/कामगार ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र में मजदूर है। लेखन के क्षेत्र में लेखक अपनी उम्र गुजार देता है, दिन-रात पेपर पर कलम घिसते -घिसते मगर सम्मान/यश/धन उन्हें नहीं मिलता बल्कि प्रकाशकों को मिलता है, या उन्हें मिलता है जो जानते है लॉबिंग करना, लोगों को इस्तेमाल करके ऊपर चढ़ना जानते है, सम्मान उनका होता है। प्रेमचंद/निराला/मुक्तिबोध किसी को भी उनके जीवन काल में वह सम्मान नहीं मिला, सम्मान मिला मगर तब जब वे प्रकाशकों के जरूरत बन गए।
हमारे यहाँ शिक्षकों को पहले बहुत कम वेतन मिलता था, जिसके प्राइवेट ट्यूसन की परंपरा शुरू हुई जो आगे चल कर कोचिंग सेंटर/शिक्षण माफिया में तब्दील हो गई है। हमारे यहाँ वैज्ञानिक बनने में ज्यादा छात्रों की रुचि नहीं होती क्योंकि दिन-रात मेहनत/परिश्रम करने के बाद भी एक इंजिनियर से भी कम कमा पाते है वैज्ञानिक, और सम्मान ? उनके दफ्तर के क्लर्क का ज्यादा होता है एक वैज्ञानिक से। कारण स्पष्ट है हमारे यहाँ सब कुछ बाजारवाद से नियंत्रित होता है अगर आपके पास पैसा नहीं है तो सम्मान भी नहीं है।
चित्रकार/कलाकार/नृत्यकार /नाटककार ये सब भी जीवन भर संघर्ष करते है, मगर सम्मान सिर्फ चंद लोगों का ही होता है। यहाँ तक कि राजनीति में भी ऐसे बहुत लोगों को मैं जानता हूँ जो दिन-रात लोगों के समस्यायों को सुलझाने में लगे रहते है, अपने निजी काम को त्याग कर भी, मगर सम्मान उन्हें मिलता है जो मौके पर चौका मार कर कुछ बन जाते है।
एक बार सुविख्यात अभिनेता अक्षय कुमार ने स्वीकार किया था कि वो खुशकिस्मत है जो इस मुकाम पर है, वरना " मुझसे बेहतर दिखने वाला/प्रतिभाशाली सैकड़ों नवजवान है जो क्रूमेम्बर से आगे नहीं बढ़ पाते फिल्म इंडस्ट्री में। यह असमानता हर जगह है, हर जगह चढ़ते सूर्य को नमस्कार करने की परंपरा है।
हमारे क्रिकेटर/सेलिब्रिटी जितना अपने काम से नहीं कमाते उसके सौ गुना अपने शोहरत के बदौलत कमाते है, मेरे या आपके कहने से यह रूक नहीं सकता, मगर यदि वे क्रिकेटर/सेलिब्रिटी चाहे एक बेहतर देश बनाना /एक बेहतर समाज बनाना तो वो अपने शोहरत के कमाई को अन्य खेलों /अन्य कलाओं पर खर्च करके अपने जैसे बहुत सेलिब्रिटी पैदा कर सकते है, मगर वो ऐसा नहीं करते। प्रतियोगिता है, जहाँ इतना पाने के बावजूद भी कोई ब्रांड हाथ से निकल जाने से मलाल होने लगे वहाँ कोई क्यों अपने लिए इतने प्रतियोगी पैदा करेगा?
मगर यह परंपरा सही नहीं है, देश का यह माहौल अच्छा नहीं है। अच्छा तब होगा जब मेहनत करने वाला वर्ग सम्मान को महसूस करने लगेगा, जब मजदूर/किसान/कामगार/कलाकार/चित्रकार/नाटककार/लेखक ( मेहनत करने वाले वर्ग ) को सम्मान मिलने लगेगा। देश तब बदलेगा। मोदी जी क्या इस दिशा में कोई काम करेंगे? उम्मीद है, क्योंकि वे स्वयं उस वर्ग से आये है। मगर यह उम्मीद बहुत भारी है, मुश्किल है। देश के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है। हमारे आने वाली पीढियों को ईमानदार/मेहनती/कार्यकुशल बना कर एक सक्षम/ शक्तिशाली राष्ट्र निर्माण के लिए इस चुनौती को/इस उम्मीद को पुरा करना बेहद जरूरी है। @ मनोरंजन कुमार तिवारी

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Wednesday, March 15, 2017

हर बार सत्य पराजित होता है

हर बार सत्य पराजित होता है
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आखिर चार बूँद आँसुओं के निर्माण में,
कितनी मात्रा में दर्द, तकलीफ़
और अपमान के मिश्रण मिलाने पड़ते है?
सोच रहा था मैं कि
क्या हो गया है मुझे,
कहाँ गए मेरे आँखों से पानी?
दर्द का एहसास होता ही नहीं अब।
दिल जिसे कहते है सब,
शायद होता नहीं वो किसी के भी पास,
सबके पास बस मांस का लोथड़ा ही होता है,
जिस पर हजार हथौड़ा चलाओ,
टूटता नहीं है दिल,
सिर्फ दिल टूट जाने का खौफ़  होता है,
यह खौफ़ ही सच है और,
यह सच बार-बार हारता है,
हर बार बेशऊर, बेगैरत और बेईमान ही जीत जाते है।
कभी भी, कहीं भी गलती से भी,
जीतते हुए नहीं दिखता सच,
हर जगह, हर वक्त,
दिखावा, ढोंग और छल ही जीत जाता है,
कर्तव्यबोध, ईमानदार कोशिशें,
लड़खड़ाते हुए लहूलुहान पड़े होते है राह में,
झूठ, छल और प्रपंच पूरे वेग से,
इन्हें रौंदता हुआ आगे निकल जाता है।
नहीं हताश नहीं हूँ मैं,
मगर हताश क्यों नहीं  जाता हूँ,
यही तो जटिल प्रश्न है,
जिन आँखों में चार बूँद आँसू नहीं बन पाते,
उन्ही आँखों में शर्म/हाया क्यों
इतना बनाता है,
क्यों दूसरों के कुकर्मों से स्तब्ध होता हूँ?
आँसू दिखने वाले,
अपने आँसू के हर कतरे का मोल वसूल कर लेते है,
ऐसे लोगों के आँखों में इतना आँसू बनता है कि
एक पूरी की पूरी पीढ़ी शर्मसार हो जाती है।
खेती करने वाले इसलिए घाटे में है आज-कल,
जो बोया है, उसे ही काटना पड़ता है,
जो बोता कुछ और है, और काट कुछ और लेता है,
यह धंधा बहुत चोखा है,
इसमें फायदा बहुत है,
इसलिए तो सदियों से
इस धंधे को करने वाले वाले फलते-फूलते जा रहे है। @मनोरंजन