जीवन का रफ़्तार
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बोलो मत,
शोर मत करो बेटा,
एकाग्र होकर सुनो परी,
साँझ के नीरवता में,
बजते हुए इस संगीत को,
पक्षियों के चहचआहट को,
उतरने दो अपने अंतर्मन में,
ये अमूल्य निधि छुपा कर रख लो,
अपने अंतर्मन के किसी कोने में,
देखो उधर
स्वच्छ, निर्मल आकाश में,
बिखरे, टिमटिमाते तारों को,
छुपा लो अपनी आँखों में कहीं,
ये अमूल्य संगीत, ये दृश्य
शायद देख ना पाओगी कभी,
कि जिस रफ़्तार में सिमटती जा रही है जमीं,
सिमटता जा रहा है आसमान,
मुझे अंदेशा है,
कि कभी चाहोगी सुनना इस संगीत को,
देखना चाहोगी इस दृश्य को तो,
वक्त नहीं होगा तुम्हारे पास,
या वक्त होगा पर ये दृश्य नहीं होगा। @मनोरंजन
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