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Wednesday, March 15, 2017

हर बार सत्य पराजित होता है

हर बार सत्य पराजित होता है
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आखिर चार बूँद आँसुओं के निर्माण में,
कितनी मात्रा में दर्द, तकलीफ़
और अपमान के मिश्रण मिलाने पड़ते है?
सोच रहा था मैं कि
क्या हो गया है मुझे,
कहाँ गए मेरे आँखों से पानी?
दर्द का एहसास होता ही नहीं अब।
दिल जिसे कहते है सब,
शायद होता नहीं वो किसी के भी पास,
सबके पास बस मांस का लोथड़ा ही होता है,
जिस पर हजार हथौड़ा चलाओ,
टूटता नहीं है दिल,
सिर्फ दिल टूट जाने का खौफ़  होता है,
यह खौफ़ ही सच है और,
यह सच बार-बार हारता है,
हर बार बेशऊर, बेगैरत और बेईमान ही जीत जाते है।
कभी भी, कहीं भी गलती से भी,
जीतते हुए नहीं दिखता सच,
हर जगह, हर वक्त,
दिखावा, ढोंग और छल ही जीत जाता है,
कर्तव्यबोध, ईमानदार कोशिशें,
लड़खड़ाते हुए लहूलुहान पड़े होते है राह में,
झूठ, छल और प्रपंच पूरे वेग से,
इन्हें रौंदता हुआ आगे निकल जाता है।
नहीं हताश नहीं हूँ मैं,
मगर हताश क्यों नहीं  जाता हूँ,
यही तो जटिल प्रश्न है,
जिन आँखों में चार बूँद आँसू नहीं बन पाते,
उन्ही आँखों में शर्म/हाया क्यों
इतना बनाता है,
क्यों दूसरों के कुकर्मों से स्तब्ध होता हूँ?
आँसू दिखने वाले,
अपने आँसू के हर कतरे का मोल वसूल कर लेते है,
ऐसे लोगों के आँखों में इतना आँसू बनता है कि
एक पूरी की पूरी पीढ़ी शर्मसार हो जाती है।
खेती करने वाले इसलिए घाटे में है आज-कल,
जो बोया है, उसे ही काटना पड़ता है,
जो बोता कुछ और है, और काट कुछ और लेता है,
यह धंधा बहुत चोखा है,
इसमें फायदा बहुत है,
इसलिए तो सदियों से
इस धंधे को करने वाले वाले फलते-फूलते जा रहे है। @मनोरंजन


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