काश! आप मुझे मिली होती तब, जब बचपन था,
आपकी उँगली पकड़, खिलखिलाता, मैं दिखाता,
अपने घर के सहन में लगाये उन पौधों को, सब्जियों को,
जिन्हे अपने ही हाथों, मैने वहाँ पर बोया था।
या निकल पड़ते उन बागों के उस पार,दौड़ते- भागते,
उन हरे भरे खेतों को निंद से जागते,
तलाब किनारे जाकर, अपनी साँसों को काबू में करते,
कूद जाते उस मटमैले पानी में, और
कीचड़ सने पैरों से हाथीपाँव बनाते।
या ढलती सायं के बेला में आँख- मिचौली खेलते,
पुआल के ढ़ेर पर चड़, उपर से नीचे सरकते,
रात को डिबरी के रोशनी में पढ़ते वक़्त,
सारा ध्यान उस झिंगुर, फतिंगे और
छिपकिली के गतिविधियों पर रखते हुए मंद-मंद मुस्कुराते,
या दोपहर में, चक्कर लगाते, पानी भरे, फिसलन वाली उस बाग में,
जिस बाग में मैने अपना बचपन छोड़ा था।
काश! आप मुझे मिली होती उस वक्त,
जब दिल में रुमानियत के अंकुर फूट रहे थे,
बड़ी सावधानी से, चोरी-छिपे, मिलता आपसे,
बातों-बातों में वक्त का पता चल ना पाता,
कोई देख लेता, हम डर जाते,
अनगिनीत बहाने गढ़ते, खुद को सयाना,
और सच्चा साबीत करते,
तरह-तरह की उक्ति आजमाते मिलने की,
लम्बी बातें, लम्बे ख्वाब, लम्बे खत और बड़ी रातें,
ढेर सारी नदानियों, और परेशानियों के साथ,
आपका वो लजराता, शर्माता चेहरा मेरे हाथों में होता।
काश! आप मुझे मिली होती उस उम्र में,
जब मैं होता एक भरा-पुरा मर्द, देह और दौलत से,
योंही, कहीं मिल जाते किसी इतफ़ाक से,
भावनाओं का वेग होता, प्रणय,
प्रेम, प्रतिदान का आवेग होता,
आप मुस्कुराती मेरे लिये,
वादें होते पर आँखों से,
होठों पर बस स्वीकृति होती, और
दुल्हन बन कर आप हमारे आँगन में,
अपने लाल अलता वाले पैरों से निशान बनाती।
या फिर हम मिलते उम्र के ढ़लान पर,
सेहत खातीर, टहलने के लिये पार्क में जाते,
वहीं बेंच पर बैठ, अपने-अपने सुख-दुख सुनाते,
कुछ शिकायतें सरकार की, कुछ अपनो की, कुछ गैरों की,
कुछ अतृप्त अभिलाषा जीवन की,
अफ़सोस भरी कुछ बातें, बेझिझक कह जाते,
मुझे, आपसे सहानुभूति होती,
आपके दिल में मेरे लिये हमदर्दी होती,
और हम इन्ही भावनाओं को अपने दिल में,
जीवनामृत की तरह संजोए अपने-अपने घर को वापस हो जाते।
मगर, दुर्भाग्या है हमारा की,
हम मिले है उस दौर में, जब
उपरोक्त कोई भी स्थिति नहीं है, ना अवस्था है,
एक आँधी दौड है, जिसमें, दौड रहा हूँ मैं तन्हा,
निःशब्द, भावहीन, उज्जड, निराश!
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मनोरंजन
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