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Friday, October 10, 2014

शायद अब........
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शायद अब दिल में रही नहीं तमन्ना,
किसी की प्यार पाने की,
किसी की झील जैसी आँखों में डूब जाने की,
किसी के ख्वाब का हिस्सा बनूँ,
बनूँ किसी का रफ़्ते-ए-ज़ीगर,
अब ललक ना रही किसी तारीफ भरे नजरानें की,
कुरुप हो गये है मेरे चाहत के रंग-ढंग,
विरूपित सी हो गयी है सूक्ष्म भावनाएँ,
कुविचार भर गया है मन में इस कदर की,
जुबां से निकले शब्दों से बू आ जाती है,
उमंग ना रही अब मधुर शब्दों से किसी को फांसने की,
और ना जुस्तजू बची,
किसी के मधुर शब्दों के जादू में बंध जाने की,
यकीन और भरोसा कभी तकियाकलाम हुआ करते थे,
पर अब कोशिशें खत्म हो गई, और चाहत भी,
किसी का यकीन और भरोसे को जीत पाने की,
मज़ा नहीं आता हर वक्त फूलों को महकने की,
इसलिये नये स्वाद और मिज़ाज के लिये,
काँटों से खेलता हूँ, पत्थर से लड़ता हूँ,
दर्द, तकलीफ़, गम और उदासी,
ये सब भी तो अच्छे है,
इच्छा नहीं होती हर वक्त,
बेशर्मी से मुस्कुराने की।
मेरा अस्तित्व
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तुम्हे याद ना करने से,
मेरा बहुत नुकशान होता है,
सीखा है मैने अपने अनुभवों से,
वक्त की खिसकती रेत पर खड़े होकर,
तुम्हे याद ना करने से,
जो आँसू की बूँदें, आँखों से बहते,
अब अंदर ही ज़ब्त हो जाते है,
और करके कोई रसायनिक अभिक्रिया,
तेज़ाब बन जाते है,
ये तेज़ाब,
मेरे अंतःकरण की अनेक सुक्ष्म,
एहसासों और भावनाओं को जलाये जा रहा है,
ये तेज़ाब,
मेरे अंदर से सड़ाये जा रहा है,
मेरी कविताओं के शब्दों को,
बनाये जा रहा है मुझे,
नित खोखला अंदर से,
मिटाए जा रहा है मेरे अस्तित्व को,
मुझे, मेरा होने के एहसास को विस्मृत करने लगा है,
तुम्हे याद ना करने से,
मेरा बहुत नुकशान हो रहा है।......................मनोरंजन
बहाने ढून्ढ लिया कर ए मन हॅंसने का कोई,
तेरी हालात तो तुझे कभी हॅंसने ना देगा।.....
मेरी पहचान
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क्या मैं मदहोश हूँ नशे में,
जो अपनी हस्ती मिटाए जा रहा हूँ उनके लिये,
जिनके नज़र का पानी मर गया है जाने कबसे,
या हूँ मैं बेगैरत फकीरा कोई,
जो चडा देता है,
अपनी ख़ाक छान कर रोज जमा की गई सारी पूँजी,
उस मंदिर में,
जहाँ के देवों ने मुझे महरूम कर रखा है,
अपने आशीर्वाद से,
क्यामैं हूँ, अपने ही धुन का मतवाला,
कोई बावरा संगीत साधक,
बजाये जा रहा हूँ धुन, बहरों की इस बस्ती में,
या हूँ मैं फ़कत किसी के आँखों का धोखा,
लिपटे हुए चिथड़ों में,
असर्फियां दान करता हूँ,
या हूँ मैं कोई प्रेमी पागल सा,
किसी मरहूम प्रेमिका का,
पुकारता हूँ शिद्धत से की,
मुझे यकीन है, एक दिन वो जाग उठेगी अपने कब्र से,
सुना है आज भी हंसता वो शख़्स मुझ पे,
रोता रहा हूँ जिसके लिये,
जाने कितने सदियों से। @ मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/
जब आदतें लत बन जाती है
=====================सुना है, वो आज भी रोया है बेज़ार होकर,
जिसके चेहरे पर उदासी देख कर,
मेरे कलेजे के सौ टुकड़े हो जाते है,
पर अफसोस की बात है की,
सिखता नहीं वो अपने गलतियों से कभी,
गलतियाँ करते जाने की ज़िद पर आड़ा है।
अपनी कमजोरियों,
अपनी आदतों के गिरफ्त में जकड़ा,
शब्द उसके कानों तक जाकर वापस हो जाते है,
एक पगलपन सा है,
जिसे महसूस नहीं करना चाहता है,
कई बार जानने की कोशिश की,
उसके हाले--दिल का सबब,
पर बताता नहीं कुछ, मुझसे बोलना ही बंद कर देता ह्है,
और इसतरह,
ना ख़ुद बदलता है, ना मुझे बदलने देता है।
@मनोरँजन

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मुझमें मैं नहीं 
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मुझे जगाने का प्रयत्न बेकार है,
क्योंकि मैं नींद में नहीं,
सो रहा हूँ मूर्छित होकर,
अपने ही अहंकारों के कवच टूट जाने से,
मेरे अपनों के बेगानेपन से विचलित,
किसी के बेरुखी से आहत,
जोड़ रहा हूँ,
अपनी टूटी सांसों की डोर को,
मैने ऐसा कुछ लिखा ही नहीं,
जो चोरी हो जाये,
लिखा है तो सिर्फ अपने आप को,
अपने अंतर्द्वन्दों को, अपने पाप को,
कौन चुराएगा ऐसा लिजलिजा सा शब्द,
शब्द, जिनके कोई मायने नहीं,
कोई रंग नहीं, कोई रस नहीं,
पतझड के सूखे पत्तों की तरह,
उड़ते, बिखरते, टूटते शब्द,
मैने ऐसा कुछ सीखा ही नहीं,
जो विमृत हो जाये,
सिखा नहीं लड़ना, जीतना,
दूसरों को गलत सिद्ध कर,
खुद को श्रेष्ट साबित करना,
सिखा नहीं पाने का गुर,
इसलिये हर बार गलत मैं ही होता हूँ,
मैने आज तक किसी को इसतरह जाना ही नहीं,
जिसके अंजान हो जाने का भय हो,
मैने ऐसा कुछ पाया ही नहीं,
जो खो जाये,
मैं तो खुद खो गया हूँ एक ऐसे राह में,
जहाँ हर व़क्त खुद को पाने की,
जुस्तजू मेरे आँखों में कभी चमक तो कभी आँसूं दे जाती है।@ मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/