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Friday, October 10, 2014

शायद अब........
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शायद अब दिल में रही नहीं तमन्ना,
किसी की प्यार पाने की,
किसी की झील जैसी आँखों में डूब जाने की,
किसी के ख्वाब का हिस्सा बनूँ,
बनूँ किसी का रफ़्ते-ए-ज़ीगर,
अब ललक ना रही किसी तारीफ भरे नजरानें की,
कुरुप हो गये है मेरे चाहत के रंग-ढंग,
विरूपित सी हो गयी है सूक्ष्म भावनाएँ,
कुविचार भर गया है मन में इस कदर की,
जुबां से निकले शब्दों से बू आ जाती है,
उमंग ना रही अब मधुर शब्दों से किसी को फांसने की,
और ना जुस्तजू बची,
किसी के मधुर शब्दों के जादू में बंध जाने की,
यकीन और भरोसा कभी तकियाकलाम हुआ करते थे,
पर अब कोशिशें खत्म हो गई, और चाहत भी,
किसी का यकीन और भरोसे को जीत पाने की,
मज़ा नहीं आता हर वक्त फूलों को महकने की,
इसलिये नये स्वाद और मिज़ाज के लिये,
काँटों से खेलता हूँ, पत्थर से लड़ता हूँ,
दर्द, तकलीफ़, गम और उदासी,
ये सब भी तो अच्छे है,
इच्छा नहीं होती हर वक्त,
बेशर्मी से मुस्कुराने की।

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