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Friday, October 10, 2014

मुझमें मैं नहीं 
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मुझे जगाने का प्रयत्न बेकार है,
क्योंकि मैं नींद में नहीं,
सो रहा हूँ मूर्छित होकर,
अपने ही अहंकारों के कवच टूट जाने से,
मेरे अपनों के बेगानेपन से विचलित,
किसी के बेरुखी से आहत,
जोड़ रहा हूँ,
अपनी टूटी सांसों की डोर को,
मैने ऐसा कुछ लिखा ही नहीं,
जो चोरी हो जाये,
लिखा है तो सिर्फ अपने आप को,
अपने अंतर्द्वन्दों को, अपने पाप को,
कौन चुराएगा ऐसा लिजलिजा सा शब्द,
शब्द, जिनके कोई मायने नहीं,
कोई रंग नहीं, कोई रस नहीं,
पतझड के सूखे पत्तों की तरह,
उड़ते, बिखरते, टूटते शब्द,
मैने ऐसा कुछ सीखा ही नहीं,
जो विमृत हो जाये,
सिखा नहीं लड़ना, जीतना,
दूसरों को गलत सिद्ध कर,
खुद को श्रेष्ट साबित करना,
सिखा नहीं पाने का गुर,
इसलिये हर बार गलत मैं ही होता हूँ,
मैने आज तक किसी को इसतरह जाना ही नहीं,
जिसके अंजान हो जाने का भय हो,
मैने ऐसा कुछ पाया ही नहीं,
जो खो जाये,
मैं तो खुद खो गया हूँ एक ऐसे राह में,
जहाँ हर व़क्त खुद को पाने की,
जुस्तजू मेरे आँखों में कभी चमक तो कभी आँसूं दे जाती है।@ मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/


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