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Friday, November 4, 2016

कविताएँ

समाज में अमीर और गरीब के बीच अंतर पर दो कविताएँ
समाज में सिर्फ गरीब किसान, मजदूर, भिखारी, सीमा पर लड़ रहे सैनिक, पूर्व सैनिक की पेंसन, कमजोर/ बेसहारा/ बेचारी औरत ही नहीं है जिनके हालात पर कलम घिसे जाए, बल्की एक बहुत बड़ी फौज (शायद करोड़ों में) उन नौजवानों की है जो दिन भर कठीन परिश्रम करके भी सुखद/ संतोषजनक जीवन यापन नहीं कर पा रहे है, उनके सूखे हुए होठों पर, पनियाई आँखों के कातरता में असंख्यों कविताओं/ कहानियों का समंदर छिपा है, जरा झाँक कर कोई देखो तो?

1 .
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बताता नहीं है वह,
कि पिछले तीन-चार घंटों तक,
उसके साथ क्या-क्या हुआ,
कितने अपमान के घूँट पिया उसने,
बदतमीज़ियों से, धौंस, धमकी से कितना कलेजा छिला उसका,
या फिर मारने-पीटने से,
सहम गया, आतंकित हो गया,
बस जानकारी यह मिली कि
उसे, उसके नियोक्ता ने अपने दफ़्तर में,
बंदी बना लिया था,
एक पुलिसवाले के सम्मुख
एक कागज पर उससे हस्ताक्षर करवाया गया,
पंद्रह दिन के भीतर वह पचास हजार रूपया देगा,
या फिर उस पर एक लाख रूपया चोरी का मुकदमा चलेगा,
अपराध सिर्फ इतना कि
अतिरिक्त आमदनी के लिए
उसने अपने नियोक्ता के जानकारी के बिना,
किसी और का काम भी कर रहा था,
पकड़ा गया,
शर्त पर छूटने के बाद,
फ़ोन पर अपनी पत्नी से कह रहा था,
क्या गलत किया मैंने?
इसके दिए हुए आठ हजार से हमारा खर्चा पूरा नहीं हो रहा था,
तो मैंने "पार्ट टाइम" दूसरा काम कर लिया,
इसके दफ्तर को बंद होने से मैंने बचाया था,
अब मैं इस "साले" को बताता हूँ,
और यह कहते हुए
उसकी आवाज कमजोर पड़ जाती है,
शायद डर से , आतंक से,
पर उसके आँखों में आँसू नहीं दिखता,
क्या सचमुच उसका मन रोया ना होगा,
अपने हालात पर, अपने औकात पर ? मनोरंजन

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