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Monday, November 28, 2016

महानगर में हाउसवाइफ

महानगर  में हाउसवाइफ 
सूर्य उदय होता होगा,
शायद अस्त भी होता है,
हमारे घर में सिर्फ दिवारें है,
रोशनी भी आती है खिड़कियों से,
पर ट्यूब लाइट जलते रहती है,
तो दिन और रात का पता नहीं चलता,
"वो" सोकर उठने के बाद नहा-खाकर  ऑफिस जाते है,
तो लगता है दिन की शुरुआत हो गई है,
और जब लौट के आते है तो,
 लगता है अब रात हो गई,
रोज सोचती हूँ कि कल सूर्य को देखूँगी,
पीछे बॉलकनी में कपडे डालने जाती हूँ,
पर ध्यान नहीं रहता,
कभी छोटी बेटी दूध के लिए गला फाड़े जाती है,
कभी बेटा तीन साल का,
साड़ी पकड़े-पकड़े पता नहीं क्या कह रहा होता है,
नास्ता बना कर/ करा कर फ्री होना चाहती हूँ,
पर बर्तन, कपडे जैसे मेरे सर पर चढ़ कर नाचने लगते है,
फिर एक तरफ कूकर सीटी मारता है,
और दूसरी तरफ बुद्धू बॉक्स पर पता नहीं क्या टर्र -टर्र करते रहता है,
सुना है नोटबंदी हो गई है,
बला से हो गई तो हो गई,
पर टीवी पर दिन भर सही हुआ/ गलत हुआ का महाभारत चलते रहता है,
मैं  "कुमकुम भाग्य" लगा लेती हूँ,
रोज सोचती हूँ,
आज अपने कमर दर्द के बारे में "इन्हें" बताऊँगी,
छी, ये क्या इतना जरूरी है?
वैसे ही कितना हेडेक  रहता है इन्हें,
अब देखो ना, इतनी रात में 
इस अनबोलती शैतान को क्या हो गया?
बार-बार पलँग पर चढ़ कर स्विच ऑन  रही है,
मना करो तो गला फाड़ने लगेगी,
" वो" तो सो गए, बस पांच मिनट का हमसफ़र बन कर,
शादी के बाद " रोमांस " ख़त्म हो जाता है क्या? @ मनोरंजन कुमार तिवारी 

                                                                                                          

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