नहीं . . . . . . . . .
यह सिर्फ छात्रों का मामला नहीं है, सिर्फ विश्वविद्यालयों का मामला नहीं है, यह मामला है "दिल्ली के सिंघासन" का जो हमेशा से कुलीन वर्ग के लिए आरक्षित था, यहाँ के फ़िज़ाओं में ऐसी हवा बहती है या बहाया जाता कि साधारण परिवार से आने वाले सभी प्रधानमंत्री इस हवा में उड़ा दिए जाते है। उदहारण के लिए चौधरी चरण सिंह, मोरारजी देसाई, देवगौड़ा, गुजराल और बहुत हद तक अटल बिहारी बाजपेयी (आसान नहीं था उनका प्रधानमंत्री बनाना, 1998 -1999 के समय संसद में क्या कुछ हुआ, उसे याद करने से सब कुछ साफ़ हो जायेगा )
यह मामला शुरू होता है एक गरीब परिवार के बेटे का प्रधानमंत्री बन जाने के बाद। कैसे ये अनहोनी हो गई, यह सीट सिर्फ और सिर्फ कुलीन लोगों के लिए ही रिजर्ब थी, कैसे एक साधारण व्यक्ति तमाम घेरेबंदियों के बावजूद इतने ठसक के साथ इस मुकाम तक पहुँच सका . . . . . .मामला उसी समय शुरू हो गया था। एक महीना भी नहीं गुजरा था कि सरकार के कामकाज का हिसाब माँगे जाने लगे थे, देश के किसी भी कोने में हुई किसी भी छोटी-बड़ी घटना को इस सरकार पर थोप कर उससे जबाब माँगे जाने लगे थे। 6 महीना के अंदर ही बेहद प्रगतिशील/चिंतनशील/ देश और समाज के प्रति प्रतिबद्ध लेखक लोग अपने-अपने पुरस्कार वापस करने लगे थे, क्योंकि सरकार ने (माफ़ करें सिर्फ एक व्यक्ति ने ) पुरे देश में नफ़रत का/असहिष्णुता का जहर फैला दिया था।
नफ़रत और असहिष्णुता कौन फैला रहा है? जरा नज़र दौड़ा कर तो देखो
इससे पहले भी किसी प्रधानमंत्री को इतने तमीज़ से पुकारा था किसी ने ? कहीं भी कोई गली का कुत्ता उठता है और भारत के प्रधानमंत्री को अपशब्द बोलता है, उसके तस्वीर को चप्पल/जूतों से पिटवाता है, ऐसा पहले हुआ है क्या? मनमोहन सिंह जैसे प्रधानमंत्री के साथ भी नहीं हुआ कभी ऐसा। पुतला जलना/विरोध प्रदर्शन करना हमेशा होते रहा है पर इतना ओछापन /इतनी नफ़रत /इतनी असहिष्णुता कब देखी आपने? और आप उसे ही कह रहे है कि वह नफ़रत और असहिष्णुता कौन फैला रहा है, कमाल है ना?
वह तो सांप्रदायिकता /धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्दों का प्रयोग भी नहीं करता , वह जनता है जैसे ही उसके मुँह से निकलेगा तुरंत मिर्ची लग जाएगी /आग लग जाएगी
पर धर्मनिरपेक्षता है क्या? ये तो बताओ
धर्म से निरपेक्ष ना? या किसी एक धर्म को फायदा पहुँचाना ?
छोडो तुम जबाब नहीं दे पाओगे। तुम हंगामा कर सकते हो /करवा सकते हो और वो तुम बखूबी कर रहे हो। नोटबंदी के बाद तो अब कोई विकल्प भी नहीं बचा है तुम्हारे पास। करो या मरो की स्थिति है तुमलोगों के सामने, अब या तो येनकेन प्रकारेण लोगों को बहका कर/ उकसाकर अपनी अस्तित्व बचा लो ताकी आगे की राजनीति चलते रहे, क्योंकि असली संकट तो यही है तुमलोगों के सामने कि तुम सब लोगों की दुकान बंद ना हो जाये।
और तुम्हे भय है जिस बात का वह होकर रहेगा, क्योंकि अब लड़ाई आर-पार की है।
झुकेंगे नहीं हम,
रुकेंगे नहीं हम ,
कि अब रूक गए तो साँस थम जाएगी,
कि अब झुक गए तो टूट जायेंगे हम। जय हिन्द ((हम हिंदुस्तान मुर्दाबाद तो नहीं बोल सकते भाई, इतने प्रगतिशील/ इतने होनहार छात्र तो हम नहीं बन सकते) @ मनोरंजन
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