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Monday, December 22, 2014

काव्यात्मक नहीं मैं

जिंदगी हर रोज़ एक नई कहानी लिखती है,
कभी लबों पर हँसी, कभी आँखों में पानी लिखती है।
कभी कोई उलझन बुनती है, कभी कुछ पल रूहानी लिखती है,
जिंदगी हर रोज़ एक नई कहानी लिखती है।
कभी सुरमई सुबह, कभी तपती दोपहर,
तो कभी साम सुहानी लिखती है,
कभी अँधेरा गहरा, कभी चांद पुरा, कभी चांद के मुख पर हैरानी लिखती है,
जिंदगी हर रोज़ एक नई कहानी लिखती है।@ मनोरंजन

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