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Saturday, January 10, 2015

सतह

सतह 
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वह अक्सर मेरे सतह पर,
अपनी मौजूदगी का एहसास कराते रहता है,
थोड़ा लड़खड़ाते हुए,
संभलने के प्रयास में,
कभी मुस्कुराता है,
हॅंसने का उपक्रम करता है,
कभी खीझ जाता है,
थोड़ा परेशान सा दिखता है,
फिर मुसकुराते हूए,
जुट जाता है अपने काम में तन्मयता से,
ऐसा लगता है की,
अपने पैरों को मज़बूती से स्थिर करना चाहता है,
मेरे सतह पर,
और जब-जब-नाकाम होता है,
उसका चेहरा दर्द से पीला पड़ जाता,
मुझे एहसास है उसके दर्द का,
पर जब भी मैं हाथ बढ़ा कर उसे पकड़ना चाहता हूँ,
वह फिसल कर दूर छिटक जाता है,
अब उसके प्रयासों और उसके पैरों पर प्रश्न क्यों खड़ा करूं?
शायद मेरे व्यक्तित्व की सतह ही,
फिसलन भरी है। @ मनोरंजन

बस एक एहसास

ये जनवरी की सर्दी में बूँदा-- बांदी,
मन को मायूसी और मनहूसियत से भर देता है,
और ऐसे में बरबस ही याद आ जाता है,
तुम्हारा आँसूओं से भरा चेहरा,
जो मन को बहुत व्यथित और बेचैन कर देता है।
क्यों, कैसे, क्या हुआ,
सिर्फ इतनी सी ही तो नहीं है ना जिंदगी,
जिंदगी तो इससे बहुत बड़े अनसुलझे सवालों को समेटे ,
हर कदम इम्तहान लेती है,
पर अब भी ऐसा लगता है की,
तुम होती तो शायद कुछ सवाल अपने आप ही सुलझ जाते।@ मनोरंजन

विचार-कुविचार

यार शराफ़त, शालीनता और अच्छाई,
रोमांचक क्यों नहीं होते?
और जो लोग अपनी शराफ़त और शालीनता के वज़ह से,
ठगा हुआ महसूस करते है,
उनके मन में ये विचार आना की,
काश थोड़ी घटियापन/ ओछापन ही कर लेता तो मज़ा तो आ जाता,
क्या ये विचार उचित है?@ मनोरंजन

नदी के दो किनारों सा हमारा जीवन

नदी के दो किनारों सा हमारा जीवन
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तुम्हे लगता है की,
मैं बहुत खुश हूँ अपनी दुनिया में,
और मेरे पास तुम्हारे लिए वक़्त कहाँ होगा,
मैं समझता हूँ की,
अब इस हालात में,
जबकि मैं तुम्हारा नहीं किसी और का हूँ,
एक हद से ज्यादा अतिक्रमण तुम्हारे जीवन में,
मेरे द्वारा तुम पर की गई ज्यादाती होगी,
और इसतरह हम दोनों चले जा रहे,
नदियों के दो किनारो की तरह,
एक दूसरे के बीच अथाह जलधारा को समेटे,
कहीं तुम मेरे तरफ मुड जाती हो,
कहीं मैं तुम्हारी तरफ,
पर हम कहीं मिल नहीं पाते,
और इसतरह हम दोनों प्यासे के प्यासे रह जाते है,
नदियों के दो किनारों की तरह। @ मनोरंजन

विचार

शायद अच्छाइयां और बुराइयां सापेक्षिक होती है,
जब कोई हमारे साथ बुरा कर रहा होता है, तब हम अच्छे इंसान होते है, और जब हम किसी के साथ बुरा कर रहे होते है, तब वह निर्दोष, शरीफ़ और अच्छा इंसान होता है।
यानी अच्छे या बुरे लोग नहीं होते, हालात होते है। @ मनोरंजन

ये असमर्थता है या अपराध?

ये असमर्थता है या अपराध?
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सबसे ज्यादा आनंद व उत्सव का,
दौर तो बचपन का था,
असीम उर्जा, उत्साह और नयापन से,
लबरेज बचपन,
ख्वाबों के निकलते खूबसूरत कोपल,
अनन्त रंग और खुला आसमान,
पर तब बच्चा ना बन पाये,
डाल ली आपने सर ना जाने कैसे-कैसे- बोझ,
बोझ भले ही शुरू-शुरू-में व्यायाम लगे,
पर बोझ तो बोझ ही है,
ख्वाबों के खूबसूरत कलियों को फूल बनने से रोक देता है,
नैसर्गिक उन्मुक्तता के उत्सव को बधित कर देता है,
फिर दौर आया युवावस्था का,
भरपुर उर्जा और आकर्षण से सजित यौवन,
एहसास नये थे, ख्वाब नये,
सपनों के अनन्त आकाश नये,
कुँवारेपन को जी सकते थे पूरी ठसक के साथ,
पर जी ना सके,
ये कुँवारापन भी भेट चढ़ गया,
असुरक्षा, आशंकाओं और अव्यवस्थाओं के बेदी पर,
अब गठजोड़ हुआ है दो ख्वाबों का,
दो सपनों का, दो जिस्मों का,
दोनों के एहसास, अरमां आलिंगनबद्ध हुए,
इस उम्र के रंग भी खूबसूरत है,
ये उम्र है किसी और के लिये जीने का,
इस उम्र की जरूरत अलग ही है,
हर उम्र की खास जरूरत थी,
जिसे पूरा किया जाना हमारी जिम्मेवारी थी,
ये असमर्थता नहीं आपराध हुआहुआ है,
और सारे सवाल तो बेमानी है,
जब पैदा हुए इंसान बनाने को,
और इंसान ही ना बन पाये,
हम हिन्दू, मुस्लिम, ब्राह्मण, क्षत्रिय,
और ना जाने क्या- क्या बन गये। @ मनोरंजन

विचार

हाँ औरत का एक पुरुष के जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है।........सकारात्मक और नकारात्मक दोनो। कुछ औरतें वाकई किसी पुरुष के जीवन में उत्साह ,उमंग, व नवीन उर्जा का संचार कर सकती है, वहीं कुछ औरतें किसी पुरुष के जीवन को बिना कुछ किये उर्जाविहीन और असमर्थ बना सकती है।@ manoranjan

यादें

बचपन में सुने गए कुछ गीत के मुखडे जो आँखों को नम कर देते थे।...................
१. दुई भैया गइला हो देवर, एके काहे हो आइला,
अरे हमार स्वामी क़हाँ बिलमवल् ए देवर जी......
........... ये गीत एक देवर के द्वारा अपने भाभी , पर मोहित हो जाने और उसके बाद अपने भाई को जंगल में ले जाकर मार डालने की बेहद दर्द और करुणा से भरी कहानी पर आधारित एक मार्मिक गीत है जो अब भी आँखें नम कर देती है।
२. बाली उमरिया प्रभु जी योगी भैनी जी, दिनवा के करिहे
पार....
...................ये गीत गाँव में आने वाले एक सुन्दर नवजवान योगी जब अपने सारंगी बजा कर गाते थे तो घर में औरतें रोने लगती थी।
३. कंकड़ चुन-चुन- महल बनायो, लोग कहे घर मेरा जी,
ना यह तेरा, ना यह मेरा, चिड़ियों का है बसेरा जी।..
यह गीत एक सई फ़कीर गया करते थे। उनकी आवाज़ बहुत खास थी। @ मनोरंजन

विचार

मनुष्य के जीवन का सबसे मुश्किल संघर्ष, उसके अपनों के साथ होती है ( दिल में जिनसे भावनात्मक लगाव गहरा हो) मुश्किल इसलिए की जीन लोगों से हमारा भावनाओं का टकराहट होती है,वो हमारे प्राण के अंश होते है, इस वजह से संघर्ष हो नहीं पता और हम समझौता करते है।...............
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ये समझौता , संसार की सबसे विनाशकारी चीज़ होती है, इससे मनुष्य का मूल स्वरूप समाप्त हो जाता है, और संघर्ष क्षमता नष्ट हो जाती है। @ मनोरँजन

क्षणिका

अतृप्‍त अभिलाषा, अधूरापन, ये कोई नई बात तो नहीं,
बुलबुल भी उल्लू की तरह दिखना चाहती है। @ मनोरंजन

उसने कहा था

उसने कहा था .....................
एक रचना का अंश ...................
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रिश्तों ने तो हरदम प्रताड़ित ही किया है, 
सिवा एक माँ के, जो आज भी मुझे,
अपने ज़िस्म--व -रूह की हिस्सा समझती है।
माँ मेरे रिश्ते में नहीं, मेरे ख़ून में है,
माँ, अगर रिश्ते में होती तो वह भी इसकी किमत चाहती,
पर माँ सिर्फ मेरी माँ नहीं है,
वो मेरे सहोदरों की भी माँ है,
पिता की पत्नी है, और भी कइयों के कुछ ना कुछ लगती है माँ,
इनमें से चोट चाहे किसी को भी लगे,
दर्द माँ को ही होता है,
और मैं अपनी माँ को दर्द नहीं दे सकता,
इसलिये सहता हूँ सब कुछ चुप चाप............@ मनोरंजन