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Saturday, January 10, 2015

ये असमर्थता है या अपराध?

ये असमर्थता है या अपराध?
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सबसे ज्यादा आनंद व उत्सव का,
दौर तो बचपन का था,
असीम उर्जा, उत्साह और नयापन से,
लबरेज बचपन,
ख्वाबों के निकलते खूबसूरत कोपल,
अनन्त रंग और खुला आसमान,
पर तब बच्चा ना बन पाये,
डाल ली आपने सर ना जाने कैसे-कैसे- बोझ,
बोझ भले ही शुरू-शुरू-में व्यायाम लगे,
पर बोझ तो बोझ ही है,
ख्वाबों के खूबसूरत कलियों को फूल बनने से रोक देता है,
नैसर्गिक उन्मुक्तता के उत्सव को बधित कर देता है,
फिर दौर आया युवावस्था का,
भरपुर उर्जा और आकर्षण से सजित यौवन,
एहसास नये थे, ख्वाब नये,
सपनों के अनन्त आकाश नये,
कुँवारेपन को जी सकते थे पूरी ठसक के साथ,
पर जी ना सके,
ये कुँवारापन भी भेट चढ़ गया,
असुरक्षा, आशंकाओं और अव्यवस्थाओं के बेदी पर,
अब गठजोड़ हुआ है दो ख्वाबों का,
दो सपनों का, दो जिस्मों का,
दोनों के एहसास, अरमां आलिंगनबद्ध हुए,
इस उम्र के रंग भी खूबसूरत है,
ये उम्र है किसी और के लिये जीने का,
इस उम्र की जरूरत अलग ही है,
हर उम्र की खास जरूरत थी,
जिसे पूरा किया जाना हमारी जिम्मेवारी थी,
ये असमर्थता नहीं आपराध हुआहुआ है,
और सारे सवाल तो बेमानी है,
जब पैदा हुए इंसान बनाने को,
और इंसान ही ना बन पाये,
हम हिन्दू, मुस्लिम, ब्राह्मण, क्षत्रिय,
और ना जाने क्या- क्या बन गये। @ मनोरंजन

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