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Friday, April 24, 2015

कुछ शब्द उधार दे दो मुझे

कुछ शब्द उधार दे दो मुझे
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यह तो तुम भी जानते हो, और मैं भी की,
हमारे बीच का ये जो रिश्ता है, जिसका कोई नाम नही,
हमारे अहंकारों और हमारे गुस्से के बिना अधुरा ही है,
हमारे बीच गुज़रे प्रेम के पलों को,
गुनगुनाने के लिए तो अनंत शब्द है मेरे पास,
पर हमारे बीच घटीत हुए, अहं के टकराहट को याद कर,
शब्दविहीन हो जाता हूँ मैं,
उन्हे भी तो लिखना चाहिए ना,
उन टकराहट के पलों के बिना तो हमारा रिश्ता ही अधूरा है,
पर शब्द नही है मेरे पास,
कुछ शब्द तुमसे उधार माँगता हूँ,
जल्दी वापस कर दूँगा,
सोचता हूँ, काश! उन टकराहट के पलों में हार मान लेता मैं ही,
मगर मैं जनता हूँ,
तुम तब भी गुस्सा होती,
ये सोच कर की मैं मुद्दे को टाल रहा हूँ,
और ज़्यादा व्यथित होती,
हर परिस्थिति के लिए कितने सारे शब्द होते थे तुम्हारे पास,
प्रेम के मधुर पलों के लिए भी, और लड़ने के लिए भी,
अब तुम्हे निशब्द देख कर हज़ार मौत मरता हूँ मैं,
मरता हूँ, और मरकर  मेरी रूह भटकती है वीराने में,
नीड वीराने में, जहाँ दूर-दूर तक कोई नही होता है,
उन अंधेरे सन्नाटे को अपनी पूरी ताक़त से चीरता हुआ,
चिल्लाता हूँ मैं,
"कोई मुझे कुछ शब्द दे दो"
ताकि लाकर कुछ शब्द,
तुम्हारी निशब्दता को तोड़ सकूँ,
मगर अभी भी तुम ही जीतती हो,
नही मिलता कहीं से कोई शब्द मुझे,
और तुम्हारी ये चिर निशब्दता बनी हुई है अभी भी,
और तुम्हारी ख़ामोशी,
बार-बार मुझे मरने को मज़बूर करती है,
देखो, जानता हूँ,
कुछ शब्द तो अवश्य ही अब भी रखे होंगे तुम्हारे पास,
इतने सारे शब्द थे तुम्हारे पास,
यों अचानक गायब कैसे हो गये,
ढुंढ़ों ना कुछ शब्द अपने अंदर,
और मुझे उधार दे दो,
यकीन करो, जल्दी ही लौटा दूँगा|@ मनोरंजन


Thursday, April 23, 2015

किसान और राजनीति



किसान और राजनीति
आज-कल केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार, किसानों के मुद्दे पर चौतरफ़ा घिरी हुई नज़र रही है, दरअसल अगर सही तरह से मूल्यांकन किया जाए तो सरकार ने किसानों के ख़िलाफ ऐसा कुछ भी नही किया है, जिसके वजह से उन्हे जबाव देने में कठिनाई हो, सरकार के खिलाफ किसान विरोद्धी होने का हावा बनाया जा रहा है| लेकिन भारतीय जनता पार्टी भी उसी कमज़ोरी की शिकार होते नज़र रही है, जिसे " वोट बैंक की राजनीति" कहते है| जब हम "किसान" कहते है तब क्या हम सिर्फ़ उन्ही "किसानों" की बात कर रहे होते है, जिनके ज़मीनों को अधिग्रहण कर 3-4 करोड़ रुपया प्रति एकड़ मुआवज़ा दिया जाता है, या उन किसानों की जो लाखों रुपया क़र्ज़ लेकर खेती करते है, और  किसी साल  जब प्राकृतिक आपदा या किसी वज़ह से फसल खराब हो जाती है तो आत्महत्या जैसे कदम उठाने पड़ जाते है, ये कैसे किसान है जो लाखों रुपया क़र्ज़ लेकर खेती करते है, और उन्हे इस खेती से इतना भी बचत नही हो पता की एक साल किसी तरह अपने परिवार का/ अपने बच्चों का भारण पोषण कर सके, सीधे आत्महत्या ही एक विकल्प बचता है उनके पास? निश्चित रूप से ये वैसे ही किसान है जैसे सिर्फ़ "मुस्लिम" ही हमारे देश में अल्पसंख्यक है|हमने तो ऐसे किसान देखे नही भाई, हम तो सिर्फ़ ऐसे किसान देखते रहे है, जो आज भी अपने बच्चों की पढ़ाई, बेटी की शादी और परिवार के दावा-बिमारी के लिए अपनी ज़मीनों को 50-60 हज़ार रुपया प्रति बीघा पर बेचने को मजबूर है| हम तो सिर्फ़ ऐसे किसानों को जानते है, जिनकी अगर फसल खराब हो जाती है, तो दूसरों के मज़दूरी कर, शहर में खुद या अपने बच्चों को भेज चार पैसे कमाने के लिए, दस गालियाँ खा कर अपना पेट भरते है, और अगर उससे भी पेट ना भरे तो गुड़  खाकर,पानी पीकर, गमछा अपने पेट पर बाँध कर सो जाते है| क्या ये किसान भारत देश के किसान नही है? ये तो आत्महत्या नही करते, क्योंकि इनके उपर अपने पूरे परिवार का भारण-पोषण का दयीत्व होता है| इन दोनों तरह के किसानों में किस तरह के किसानों की संख्या ज़्यादा है?सरकार अगर कोई क़ानून बनाए तो उसे किस तरह के किसानों के जीवन स्तर को बेहतर करने की प्राथमिकता होगी? मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण क़ानून से निश्चित रूप से ऐसे किसानों को तिलमिलाने को मजबूर किया है, जिनके बच्चे, लाखों-करोड़ों की गाड़ियों में  घूमते है हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश, राजस्थान के कुछ हिस्से, और महाराष्‍ट्रा और आंध्रा प्रदेश के कुछ हिस्सों के किसान है और, दिल्ली के किसान( अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के किसानों को 4 लाख प्रति हेक्टेयर मुआवज़ा देने का वादा किया है, और चुनौती दी है की मोदी की सरकार पूरे देश के किसानों को इतना ही मुआवज़ा देकर दिखाए, अब अरविंद केजरीवाल से पूछने वाला कोई पत्रकार ऐसा नही है, जो ये पूछ सके की दिल्ली में कितने किसान है? और जो किसान है वो भी क्या सिर्फ़ नाम के किसान नही है, जैसे सिर्फ़ मुस्लिम लोग अल्पसंख्यक है) मगर मीडिया को इन बातों से क्या लेना देना, उन्हे तो टी. आर.पि से मतलब है, जो लाखों- करोड़ों की गाड़ियों में घूमने वाले और व्यावसाय के रूप में खेती करने के लिए लाखों रुपया क़र्ज़ लेकर फिर आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे है, सिर्फ़ यही किसान है, बाकी पूरा देश किसान विहीन हो चुका है, सिर्फ़ दिल्ली और दिल्ली के आस-पास ही किसान रहते है|अगर मोदी सरकार सच में वोट बैंक के परवाह किए बिना देशहित में काम करती है, तो इन "मौसमी मेढ़क" के परवाह किए बिना, देश के उन करोड़ों किसानो के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के उदेश्य पर काम करे| जब परिणाम आने शुरू हो जाएँगे तो अपने आप "मौसमी मेढ़क" के आवाज़ बंद हो जाएगी|भूमि अधिग्रहण बिल-2015 पूरे देश में विकास और आधारभूत संरचनों को खड़ा कर "मेक इन इंडिया" के सपनों को साकार करने का उदेश्य रखता है, जिससे बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, और पश्चिम बंगाल जैसे अनेकों राज्यों के किसानों के बेटों को रोज़गार और बेहतर जीवन स्तर मुहैया कराया जा सकेगा, क्या ये सारे राज्य भारत देश के अंग नही है? यहाँ के किसान क्या किसान नही है? क्या दिल्ली और इसके आस-पास के बड़े किसानों को राष्ट्रीयता के भावना को सर्वोपरी रख कर उन करोड़ों किसानों के बेहतर जीवन के समर्थन के लिए कुछ त्याग नही करना चाहिए? इस बिल से सिर्फ़ राबर्ट बॅड्रा जैसे किसानों का अहित हो रहा है| कांग्रेस को उस समय किसानों की ज़मीनों की परवाह क्यों नही हुई, जब अपने 65 साल के शासन में किसानों की ज़मीनें गाजर- मूली के भाव अधिग्रहण करके अरबों-खराबो रुपया अपने काले धन  के खाते में जमा कर लिए, कांग्रेस को किसानों की फ़िक्र तब हुई, जब उन्हे पक्का यकीन हो गया था, की इस बार के लोकसभा चुनाव में वह बुरी तरह हार जाने वाली है, तब कांग्रेस ने ये सोचा की जीस तरह से हमने देश को लूटा, किसी और को मौका ना मिले,इस लिए भूमि अधिग्रहण क़ानून-2014 और खाद्या सुरक्षा अधिनियम -2014 अपने शासन के बिल्कुल आखरी दिनों में लेकर आए|

भारत एक बहुत बड़ा देश है, यहाँ कोई भी क़ानून सभी नागरिकों के फायदे के लिए नही होता, हर कानून से कुछ वर्ग लाभान्वित होता है तो कुछ वर्ग परेशान होता है| ऐसा सिर्फ़ भारत में ही नही होता, हर देश में होता है| भारतीय लोगों में सबसे जो बड़ी कमी है वो ये है की भारतीयों में कभी भी राष्ट्रीयता की भावना सर्वोपरी नही होती, हम देशभक्त होने का दावा तो करते है, युद्ध के समय, क्रिकेट मैच के समय या आतंकवादी घटनाओं के समय घड़ियाली आँसू बहते है, मगर सच तो ये है की हम राष्ट्रीयता को सर्वोपरी नही मानतेभारत में एक चीज़ जो सदियों से चली रही है, वो है खुद को बेवकूफ़ बनाना, कोई भी आता है और हमें बेवकूफ़ बना देता है, कारण है की हम स्वयम् बेवकूफ़ बनाने को प्रस्तुत होते है| पहले अँग्रेज़ों ने बनाया, फिर ६०-६५ साल तक कांग्रेस ने बनाया, और अब राखी सावंत को भी ड्रामेबाजी में मात देने वाले अभूतपूर्व महानतम दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जी बना रहे है| दरअसल हम इन महान लोगों के द्वारा ही छले जाते रहे है| ये दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविंद केजरीवाल तो वाह चीज़ है जो अगले पाँच सालों में पूरे देश को नचाने का अलग-अलग स्टेप्स सिखाएगा, अगर हम अभी भी होश में ना आए तो बहुत देर हो जाएगा|जब  तक हम  धर्म, जाती, भषा और क्षेत्रीयता, के अपने अंदर बैठे रक्षासों को मार कर रष्ट्रीयता को सर्वोपरी नही रखेंगे, तब तक हम सभी देशवासियों को नेहरू-गाँधी परिवार और केजरीवाल जैसे लोग ठगते रहेंगे और हम आपस में ही लड़ कर इनका काम आसान करते रहेंगे| @मनोरंजन

Saturday, April 18, 2015

मंथन


हर पल ऐसा लगता है,
कि सब ढह कर बिखर जयेगा,
झूठ-सच के रेत और गारे को मिला कर,
जोड़ा गया एक-एक ईंट,
पर ढहता भी नही,
बस ढह जाने के खौफ से आतंकित रहता है मन,
ढह जाता तो अच्छा ही होता,
फिर से जोड़ता एक-एक ईंट,
पर इस बार पुरे होश-ओ-हवास में बनाता,
पुरी सिद्धत से, इबादत से, और नफासत से बनाता,
क्या हो जयेगा?
इतना ही ना कि,
कुछ समय मुझे बेसहारा/बेछत होना पड़ेगा,
पर अच्छा होगा ग़र ये ढह जाएँ,
जब ये ईंट जोड़ रहा था,
तब बादहवास सा ही था मैं,
जो कुछ मिला, सब जोड़ता गया,
बग़ैर इसके परवाह किए की,
क्या ग्रह्य है और क्या नही,
क्या सच है और क्या नही,
और इसलिए शायद अब ये लगता है कि,
ढह जयेगा ये........@ मनोरंजन