भागना खुद से
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उफ्फ़ ये नीरवता,
नितांत अकेलापन,
अब इतना कष्टकर क्यों लगने लगा है,
कभी कितना मन तरसता था की,
चाँदनी रात में, यों ही अकेले अपने छत पर टहलूँ,
चाँद पूरी तरह से मुस्कुरा रहा है,
रात के तीन पहर बीत चुका है,
उपर छत पर नीम स्निग्द्धता है ,
मगर मुझे ये सब अच्छा नहीं लग रहा,
गोया किसी हलचल की चाह है,
इतनी सपाट जिंदगी किस काम की?
कुछ तो रहस्यमय सा घटित हो,
कुछ तो हो जो परेशान करे,
कोई पाशविक घटना, भूतबाधा,
नहीं-नहीं- ये नीरवता,
मेरे अंदर तूफान सा खड़ा कर रहा,
पैरों को जरा जोर से पटक कर आवाज़ निकालना चाहिये,
ये आवाज़, मस्तिष्क के सभी शोर को दबा देगा,
ये मोर का क्रकस आवाज़, आज अच्छा लगा,
नहीं मोर भी नहीं चाहिये,
ये मोर फिर मुझे सर्दियों के उन मैदानों में ले जायेगा,
जहाँ तुम इन मोरों के पीछे भगती थी।@ मनोरंजन
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उफ्फ़ ये नीरवता,
नितांत अकेलापन,
अब इतना कष्टकर क्यों लगने लगा है,
कभी कितना मन तरसता था की,
चाँदनी रात में, यों ही अकेले अपने छत पर टहलूँ,
चाँद पूरी तरह से मुस्कुरा रहा है,
रात के तीन पहर बीत चुका है,
उपर छत पर नीम स्निग्द्धता है ,
मगर मुझे ये सब अच्छा नहीं लग रहा,
गोया किसी हलचल की चाह है,
इतनी सपाट जिंदगी किस काम की?
कुछ तो रहस्यमय सा घटित हो,
कुछ तो हो जो परेशान करे,
कोई पाशविक घटना, भूतबाधा,
नहीं-नहीं- ये नीरवता,
मेरे अंदर तूफान सा खड़ा कर रहा,
पैरों को जरा जोर से पटक कर आवाज़ निकालना चाहिये,
ये आवाज़, मस्तिष्क के सभी शोर को दबा देगा,
ये मोर का क्रकस आवाज़, आज अच्छा लगा,
नहीं मोर भी नहीं चाहिये,
ये मोर फिर मुझे सर्दियों के उन मैदानों में ले जायेगा,
जहाँ तुम इन मोरों के पीछे भगती थी।@ मनोरंजन
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