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Saturday, April 4, 2015

ख़्वाब खुली आँखों का

ज्यादा नहीं चाहता,
मगर जितना चाहता हूँ,
उतना भी तो मुमकिन नहीं लगता,
जिनके लिये ये मुमकिन है,
वो इससे संतुष्ट नहीं,
और जिनके लिये ये जीवन त्रास है,
उनके लिये मुमकिन नहीं,
..................
एक छोटा सा घर,
उसमें एक आयताकार आँगन,
एक बड़ा सा सहन,
जिसमे लगे हो,
आम, अमरूद, केला, सहजन, पपीता, नीबू और कटहल के वृक्ष,
एक चबूतरा, उस पर तुलसी के पौधे,
चबूतरे के आजु-बाज़ू, एक नीम का और एक पीपल का पेड़,
एक तालाब, उसमें ढ़ेर सारी छोटी-बडी मछलियां,
कुछ फूलों की क्यारियां, अनार-बेल, कचनार और बोगन-बेलिया,
एक तरफ हरी, ताज़ी सब्जियां उगाने को छोटी सी जमीन,
और हरी- भरी, मुलायम दूब का बिछौना,
दो-एक दुधारू पशु धन,
एक मुस्कुराता हुआ गाँव और भविष्‍य की दुश्चिंताओं से मुक्‍त जीवन,
क्या ये सब, इतना ज्यादा है की मुमकिन नहीं?

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