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Wednesday, April 26, 2017

हम शर्मिंदा है

हम शर्मिंदा है
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अब ये आँसू बहा कर हम क्या करेंगे,
हमारे आँखों का नूर तो चला गया,
हाँ हमें गर्व है कि वो भारत माँ
के फटे हुए आँचल को ढ़ँकने के प्रयास में,
शहीद हो गया,
मगर इस गर्व का हम क्या करें,
हमारे जीवन का गरूर तो चला गया,
तिरंगे में लिपटी हुई लाश आयी है उसकी,
सलामी देकर उसके शहादत को
मान/सम्मान दे रहे है
देश के सिपाही
मगर मान/सम्मान का क्या करें हम,
हमारे मान/सम्मान का रक्षक,
वो हमारे जीवन का सुरूरतोचला गया,
आप रखो इन आँसुओं को बचा कर अपने पास,
अगले चुनाव में शायद कोई काम आ जाये,
ये गर्व का एहसास, ये मान/ सम्मान भी,
आप लेकर जाओ,
रख देना अपने "ड्राइंग रूम" में टांग कर,
लोगों को दिखने के काम आएगा,
हम शर्मिंदा है,
भारत माँ के फटे हुए आँचल को देख कर,
हमें शर्मिंदा ही रहने दो,
हमें शर्मिंदा ही रहने दो । @ मनोरंजन

Tuesday, April 25, 2017

आम आदमी पार्टी के विधायकों/सांसदों ,एक नेक सलाह सुनो...................

आम आदमी पार्टी के विधायकों/सांसदों ,एक नेक सलाह सुनो.....................
किसी भी प्रदेश का विधायक/सांसद बन जाना बहुत बड़ी उपलब्धि होती है, हम-आप सभी जानते है कि ऐसे बहुत से लोग है जो पिछले 15 -20 सालों से ईमानदारी, लगन और मेहनत से किसी संगठन में काम कर रहे है, उनका मकसद इतना ही है कि उन्हें पार्टी का टिकट मिल जाये और वो चुनाव जीत कर विधायक/सांसद बन जाये। आपको यह मौका मिल चुका है, भले ही "बिल्ली के भाग से छींका फूटा" हो मगर आप सम्मानित विधायक/सांसद है, आपके पास अधिकार है, फंड है, अभी सत्ता है और 2 साल से ज्यादा का समय भी है। मैं नहीं कहता कि आप केजरीवाल के ख़िलाफ़ खड़े हो जाओ, लेकिन उनकी बातों को भगवान का आदेश मत मानो, अपने अधिकार और अपने कर्तव्य को जानो और इस बचे हुए 2 -3 सालों में अपने क्षेत्र में रात-दिन लगा दो, आपकी कोई और महत्वाकांक्षा नहीं होना चाहिए, आप पहले ही अपनी योग्यता से बहुत अधिक पा चुके हो, अब इस यश/उपलब्धि को संचित करने का समय है। बिल्कुल पार्टी लाइन कुछ नहीं आपके लिए, एक विधायक के जो अधिकार है उसे इस्तेमाल करो और अपने क्षेत्र में जाकर इतना काम करो कि अगले चुनाव में निर्दलीय भी खड़े होते हो तो जीत जाओगे। ये केजरीवाल अपनी महत्वाकांक्षा के लिए आप सभी की बली दे देगा। अपना कर्तव्य पुरा करो। अपना भविष्य सुरक्षित करो। @ मनोरंजन कुमार तिवारी

नक्सलीयों की सच्ची कहानी

नक्सलीयों की सच्ची कहानी
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मैं बक्सर जिला, बिहार का रहने वाला हूँ, बक्सर जिला भी नक्सल प्रभावित जिला के रूप में जाना जाता था,  मगर सच्चाई इससे मीलों दूर है। हमारे गाँव के पास ही एक "बरूहां" नाम का गाँव है, वहाँ पर दो जातियों का गुट था एक यादव और एक चौधरी गुट, दोनों गुटों में अक्सर खूनी संघर्ष होता था। हम जब स्कूल जाते थे तो एक बार इस गोली-बारी में फंस भी गए थे। हमारे गाँव के बधार में दो तरफ से गोलियाँ चल रही थी। उस जातीय सघर्ष को/ दो गुटों के बीच अपना सिक्का ज़माने, "भय" का कारोबार करने को अख़बार वाले नक्सली हमला, नक्सली आंदोलन का नाम देते थे, अभी भी उसे नक्सली लिखा जाता है, अभी पिछले साल उनका एक नेता मारा गया तो इसे नक्सली हमला में मारा गया लिखा गया हर जगह। जबकि यह दो अपराधिक गुटों के बीच अपना सिक्का ज़माने का संघर्ष था। बाद में और उस समय भी ये दोनों गुट, बच्चों का अपहरण करने, चोरी-डकैती, बैंक लूट, थाना पर हमला कर हथियारों की लूट और उगाही करने में लगे रहे थे। पुरे क्षेत्र में भय का माहौल व्याप्त था। आलम यह था कि उस गाँव में, शिक्षा का माहौल बिल्कुल ख़त्म हो चुका था, गाँव में अनपढ़ पीढ़ी की एक जमात तैयार हो गई थी, जो भी बच्चा बड़ा होता था, उसका पहला ध्येय एक बंदूक लेकर अपनी जाति के गुट में शामिल हो जाना था। ये सब लोग किसी मुद्दे को लेकर सघर्ष नहीं कर रहे थे, ना ही उनका जमींदारों से कोई संघर्ष था, बल्कि यह सब इनकी  वर्चस्व की लड़ाई का नतीजा था। कई लोग मरे गए और कई लोग जेल में जाकर फिर रिहा होकर नेता भी बन गए यह बात 1995 -96  की है, तब प्रदेश में लालु यादव की सरकार थी, दोनों गुटों को राजनैतिक समर्थन हासिल था, फिर इसी में से निकल कर कोई पुरे क्षेत्र में चौधरी (कुर्मियों) का नेता बन गया कोई यादवों का नेता बन गया, और इनका जाल बक्सर, आरा, बिक्रमगंज, सासाराम और कुछ हद तक उत्तरप्रदेश तक फ़ैल गया।  मगर फिर भी इसे नक्सली आंदोलन से जोड़ा जाता है। इसमें संघर्ष करने वाले दोनों गुट के मुखिया खुद अच्छी-खासी जमीन रखते थे, तो उनका किसी ब्राह्मण, राजपुत, भुमिहार, लाला से जमीन की लड़ाई नहीं थी, लेकिन जो इनके नज़र में आ जाता था, उससे ये पैसे, धन-दौलत ऐंठ लेते थे। ये था हमारे बक्सर का नक्सली संघर्ष, जिसमें अन्य जातियाँ भी जुड़ती गई, मुसहरों को लाल झंडे के तले बुला कर बताया जाता रहा कि यहाँ के मुल निवासी (आदिवासी) वे ही है, बाद में आर्यों ने आकर्मण कर उनकी जमीनें कब्ज़ा ली थी तो वे भी लाल झंडा लेकर घुमने लगे थे। बाद में इस नक्सली आंदोलन को तोड़ने के लिए रणबीर सेना का गठन हुआ, कहानी वही थी सिर्फ अपने वर्चस्व की लड़ाई में जीत हासिल करना, उसके लिए धन चाहिए जो लूट-पाट से आएगी, हथियार चाहिए तो किसी थाने पर हमला करना पड़ेगा।  पुरे देश में जहाँ भी नक्सली संघर्ष जारी है, वहाँ की यही कहानी है। कोई शोषण के खिलाफ नहीं लड़ रहा है, बल्कि सब "भय" का कारोबार कर अपने महत्वाकांक्षाओं को पुरा करने में लगे है। इसमें  जो बंदूक़  हाथ में लेकर  हमला करते है, उन्हें तो  अभियान तक की खबर नहीं होती, उन्हें जो आदेश दे दिया जाता है, वे करने निकल पड़ते है, अभावग्रस्त, अशिक्षित परिवार से होते है, परिवार का पालन-पोषण हो जाता है,आस-पास में एक रुतबा बन जाता है । इसमें सबसे बड़ा कारण शिक्षा का आभाव है, शिक्षा के आभाव में उन्हें कोई रोजगार नहीं सूझता, और पास में एक विकल्प दिखता है, हथियार से खेलने का शौक बस और कुछ भी इनके दिमाग में नहीं होता है। जब इनमें से कोई पुलिस के हाथों लग जाता है, तब इन्हे कोई पुछने वाला नहीं होता, नक्सली का ठप्पा लगा रहता है, पूरी उम्र जेल में गुजरना पड़ता है। जेल में बंद हो जाने के बाद, इन्ही बंदूक लेकर कहीं भी बिना सोचे समझे हमला करने वालों के परिवार से जाकर मिलो तो पता चलेगा, पत्नी किसी और की हो चुकी है, उसे बच्चे पालने है, बच्चों की जिंदगी नर्कीय हो चुकी है। अब आप बताओ इसमें शोषित वर्ग का संघर्ष दिखता है आपको ? आपको लगता है कि ये नक्सली /कश्मीर के पत्थरबाज  अपने वाज़िब हक़ के लिए लड़ रहे है? आज छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले में मारे गए लोगों के लिए बहुत दुःख है, और निश्चित रूप से सरकार इस हमले को रोक पाने में असफल रही है, मगर जिस तरह से  कुछ  बुद्धिजीवी लोगों द्वारा नक्सली हमले को/कश्मीर के पत्थरबाजों को, उनके वाज़िब हक़ की लड़ाई बता कर महिमामंडित किया जाता है, वह बहुत खतरनाक है। कुछ मित्र मानते है कि छत्तीसगढ़ में आदिवासी लोगों के जमीनों को जबरजस्ती सरकार कब्ज़ा कर रही है, आदिवासियों का जनसंहार किया जा रहा है, आदिवासी औरतों के साथ बलात्कार किया जाता है,  इसलिए वहाँ नक्सली आंदोलन चल रहा है, मुझे इस सच पर संदेह है, और अगर यह सत्य है तो शर्मनाक है।

 लेकिन हम भी इसी देश में रहते है, तमाम दोस्त है छत्तीसगढ़ से जो इस जमीनी सच्चाई को, इस ये बीभत्ससा का कभी उल्लेख नहीं करते, देखिये भुमि अधिग्रहण का एक कानून बना है, और उस कानून के हिसाब से ही जमीनों का अधिग्रहण किया जाता है, ये सच है कि आदिवासी समाज इस अधिग्रहण के खिलाफ संघर्षरत है, मगर आदिवासी संघर्ष को नक्सलियों से जोड़ देना बहुत गलत है। नक्सली आज से नहीं है पिछले 25 -30 सालों से नक्सलियों के बारे में सुनते आ रहे है। यह एक भटके हुए लोगों का रास्ता है, जिन्हे बिना वजह बंदूकों से प्यार है। मैं आपको एक सच्चाई बताता हूँ, बिहार के जहानाबाद जिले में मेरा एक दूर के रिश्ते में लगने वाला ब्राह्मण नक्सली था, मारा गया, मैं उससे मिल चूका हूँ, बात भी किया है, उसके नक्सली होने की कोई वजह नहीं थी, लेकिन वह अपने आप को नक्सली कमांडर होने को बहुत गर्व से बताता था, एक रौब पड़ता था लोगों पर कि इसके पास सोते समय भी बन्दूक रहती है। यह सोच, यह रौब नक्सलवादियों से जुड़ने का कारण बनता है।  ये ऐसा ही है, जैसे सेना में भर्ती होना है, ये बंदूक चलने वाले लोग सिर्फ अपने कमांडर का ऑर्डर लेते है, आदेश हो पूरा कर देते है। कमांडर और उससे भी बड़े पदों पर जो नक्सली है, उनकी महत्वकांक्षाएं अनंत है कहानी ऐसी है, जिसे आदिवासी संघर्ष से जोड़ कर सरकार के खिलाफ हवा बनाया जा रहा है। जो भी हो नक्सली हिंसा में मरे लोगों के प्रति दुःख व्यक्त करता हूँ, और निश्संदेह ही इस घटना को नाकाम ना कर सकने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार जिम्मेवार है। और मैं चाहता हूँ कि इन नक्सलियोंको निर्दयता से कुचलने के लिए सरकार कोई ठोस कदम उठाये। @ मनोरंजन कुमार तिवारी

Monday, April 24, 2017

किसानों के दुर्दशा पर घड़ियाली आँसू बहाने वालों सुनो .........

किसानों के दुर्दशा पर घड़ियाली आँसू बहाने वालों सुनो .........
जब किसानों की जमीनों को गाजर-मूली के भाव में अधिग्रहण करके उस पर बड़े-बड़े बिल्डिंगें बना कर उन्ही किसानों को उन संस्थानों में, उद्द्योगों में प्रवेश निषेद्ध कर दिया गया तब तो आपको वे किसान याद नहीं आये, जब एक पूरी की पूरी किसानों की पीढ़ी को बंधुआ मज़दूर बनने को मजबूर कर दिया गया तब तो आपको वे किसान प्यासे और भुखे नज़र नहीं आये अब जबकि किसानों के बेहतरी के लिए प्रयास किये जा रहे है, तो आप अहिंसक आंदोलन( गू -मूत पीकर ) का हवाला देकर इंसानियत और किसानों की अस्मिता एवं आत्मसम्मान का एहसास करा रहे है? पेशाब पीना क्या होता है जानते है आप ? आज भी देश में ऐसे बहुत से क्षेत्र है जहाँ के लोग सिर्फ नाटक के लिए नहीं बल्कि रोज पेशाब जैसे पानी पीने को मजबूर है, बीमार पड़ते है, मर जाते है, कौन सुधरेगा उनका जीवन ?ऐसा कौन सा प्रदेश है जहाँ किसानों के साथ सबसे ज्यादा अन्याय हुआ है? क्या ये तमिलनाडु के किसान, बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल के किसानों से भी गये -गुजरे है? कब सुना आपने कि बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में किसी किसान ने आत्महत्या किया? कब सुना आपने कि बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में कोई किसान पेशाब पीने को मजबूर हुआ? अपनी अस्मिता एवं आत्मसम्मान का एहसास जिसे नहीं है उनके लिए कोई सरकार क्या कर सकती है ? आप सबको पता है भारत के अर्थव्यवस्था के बारे में, उसी अर्थव्यवस्था में देश के सेनाओं का खर्च, तमाम तरह के ढांचागत विकास, शिक्षा, स्वस्थ ,किसान सबको बेहतर जीवन देने का प्रयास करना है, कहाँ से आएगा वो पैसा जो किसी एक प्रदेश के किसान पर खर्च कर दिया जाएगा ? अभी उत्तर प्रदेश में किसानों के कर्ज माफ़ किये गए तो राज्य सरकार ने खुद उस पैसे को अर्जित करने का उदेश्य रखा है। किसी एक प्रदेश के किसान, या किसी एक ख़ास वर्ग को हजारों करोड़ रूपया का तौफा दे देने से बेहतर है कि उसी पैसे से ऐसी व्यवस्था बनाई जाये कि पुरे देश के किसानों का जीवन यापन बेहतर हो सके, पुरे देश के नागरिकों का जीवन बेहतर बन सके। लॉलीपॉप देने से कुछ नहीं होगा, जिसे मिल जायेगा वो खुश हो जायेगा और जिसे नहीं मिलगा वो रोएगा। बेतुके बात करके दिमाग का दही बनाते रहते है दिन भर, " किसानों के लिए पैसे नहीं है, और साहब दस लाख के सूट पहनते है? कौन प्रधानमंत्री नंगा घुमता था ? एक चाय वाले को दस लाख का सूट नहीं पहनना चाहिए? क्यों ? उसने अपना जीवन समर्पित किया है, इस जगह पहुँचने के लिए, और फिर प्रधानमंत्री की गरिमा कुछ होती है कि नहीं?समय परिवर्तन होता है, तिलमिलाने से कुछ नहीं होगा। 1996 में जब अटल बिहारी वाजपेयी और सुषमा स्वराज एक तरह से रो रहे थे तब आपको( किसी भी पार्टी को) रहम आयी थी उन पर, तब तो ये क्षेत्रीय पार्टियां अपनी सात पुस्तों के लिए इंतेजाम करने में जुटी थी, और ये वाम पंथी तब छुप-छुप के मलाई खा रहे थे ।तब तो आपने सोचा था कि ये तो ऐसे ही चलेगा, जो हम चाहेंगे वही होगा। अब जो आप चाहते है वो नहीं हो रहा है तो तिलमिला है। अब असली लड़ाई है दक्षिण पंथ और वाम पंथ की, आप लड़ो देखते है कौन जीतता है।

तो इतने मजबूर थे वे किसान कि पेसाब पीने को मजबूर हो गए थे ?

तो इतने मजबूर थे वे किसान कि पेसाब पीने को मजबूर हो गए थे ?
दरअसल अगर सही तरह से मूल्यांकन किया जाए तो सरकार ने किसानों के ख़िलाफ ऐसा कुछ भी नही किया है, जिसके वजह से उन्हे जबाव देने में कठिनाई हो, सरकार के खिलाफ किसान विरोद्धी होने का हावा बनाया जा रहा है| जब हम "किसान" कहते है तब क्या हम सिर्फ़ उन्ही "किसानों" की बात कर रहे होते है, जिनके ज़मीनों को अधिग्रहण कर 3-4 करोड़ रुपया प्रति एकड़ मुआवज़ा दिया जाता है, या उन किसानों की जो लाखों रुपया क़र्ज़ लेकर खेती करते है, और  किसी साल  जब प्राकृतिक आपदा या किसी वज़ह से फसल खराब हो जाती है तो आत्महत्या जैसे कदम उठाने पड़ जाते है, ये कैसे किसान है जो लाखों रुपया क़र्ज़ लेकर खेती करते है, और उन्हे इस खेती से इतना भी बचत नही हो पता की एक साल किसी तरह अपने परिवार का/ अपने बच्चों का भारण पोषण कर सके, सीधे आत्महत्या ही एक विकल्प बचता है उनके पास? निश्चित रूप से ये वैसे ही किसान है जैसे सिर्फ़ "मुस्लिम" ही हमारे देश में अल्पसंख्यक है|हमने तो ऐसे किसान देखे नही भाई, हम तो सिर्फ़ ऐसे किसान देखते रहे है, जो आज भी अपने बच्चों की पढ़ाई, बेटी की शादी और परिवार के दावा-बिमारी के लिए अपनी ज़मीनों को 50-60 हज़ार रुपया प्रति बीघा पर बेचने को मजबूर है| हम तो सिर्फ़ ऐसे किसानों को जानते है, जिनकी अगर फसल खराब हो जाती है, तो दूसरों के मज़दूरी कर, शहर में खुद या अपने बच्चों को भेज चार पैसे कमाने के लिए, दस गालियाँ खा कर अपना पेट भरते है, और अगर उससे भी पेट ना भरे तो गुड़  खाकर,पानी पीकर, गमछा अपने पेट पर बाँध कर सो जाते है| क्या ये किसान भारत देश के किसान नही है? ये तो आत्महत्या नही करते, क्योंकि इनके उपर अपने पूरे परिवार का भारण-पोषण का दयीत्व होता है| इन दोनों तरह के किसानों में किस तरह के किसानों की संख्या ज़्यादा है?सरकार अगर कोई क़ानून बनाए तो उसे किस तरह के किसानों के जीवन स्तर को बेहतर करने की प्राथमिकता होगी?  व्यावसाय के रूप में खेती करने के लिए लाखों रुपया क़र्ज़ लेकर फिर आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे है, सिर्फ़ यही किसान है, बाकी पूरा देश किसान विहीन हो चुका है, सिर्फ़ दिल्ली और दिल्ली के आस-पास ही किसान रहते है|अगर मोदी सरकार सच में वोट बैंक के परवाह किए बिना देशहित में काम करती है, तो इन "मौसमी मेढ़क" के परवाह किए बिना, देश के उन करोड़ों किसानो के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के उदेश्य पर काम करे| जब परिणाम आने शुरू हो जाएँगे तो अपने आप "मौसमी मेढ़क" के आवाज़ बंद हो जाएगी|
@मनोरंजन

Thursday, April 20, 2017

मेरी माँ

मेरी माँ
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तुम्हारा जाना,हमारे लिए सिर्फ माँ का दुनियाँ से चले जाना नहीं है,
तुम्हारा जाना,हमारी दुनियाँ को उजाड़ गया है माँ।
घनघोर अँधेरे के सम्राज्य में एक टिमटिमाते दीपक की तरह थी तुम,
तुम्हारे जाने के बाद वो टिमटिमाता दीपक भी हमसे छीन गया है माँ।
विपत्ति के दिनों में जब सारे घर में मरघट पसरा रहता है,
तब थोड़ा सा गुड़ और एक लोटा पानी पकड़ने वाली हाथ थी तुम,
तुम्हारे बिना इस मरघट पसरे घर में शुष्क गले प्यास से तड़पने को मजबूर हो गए माँ।
तुम्हारे जाने का दुःख बयां करना आसान नहीं,
आँखें रिक्त है आँसुओं से, शब्दों को जैसे लकवा मार गया है,
कि तुम्हारे बिना अपने दुःख-दर्द को बयां करने का तरीका भी हमसे रूठ गया माँ।
जी ऐसे रहे है, जैसे कोई फर्क नहीं पड़ा तुम्हारे जाने से,
कि शैतान की एक बस्ती है, जहाँ नाचना पड़ता है सबको जहर पीकर,
तुम्हारे बिना " हे राम यह घोर पाप है" ऐसे शब्दों के अमृत से महरूम हो गए है माँ। @मनोरंजन 

Friday, April 7, 2017

जनकृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका का अंक 23, जनवरी-मार्च 2017 में प्रकाशित मेरी भी छः कविताएँ

जनकृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका का अंक 23, जनवरी-मार्च 2017 सयुंक्त अंक आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है. यह अंक आप पत्रिका की वेबसाईट [www.jankritipatrika.in] पर पढ़ सकते हैं. यह अंक जनकृति के नए स्वरुप के साथ प्रस्तुत है...... इसमें मेरी भी छः कविताएँ प्रकाशित हुई है। इसके लिए कुमार गौरव मिश्रा जी(प्रधान संपादक) एवं समस्त संपादक मंडल के सदस्यों को हृदय से धन्यवाद। @ मनोरंजन कुमार तिवारी