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Monday, April 24, 2017

तो इतने मजबूर थे वे किसान कि पेसाब पीने को मजबूर हो गए थे ?

तो इतने मजबूर थे वे किसान कि पेसाब पीने को मजबूर हो गए थे ?
दरअसल अगर सही तरह से मूल्यांकन किया जाए तो सरकार ने किसानों के ख़िलाफ ऐसा कुछ भी नही किया है, जिसके वजह से उन्हे जबाव देने में कठिनाई हो, सरकार के खिलाफ किसान विरोद्धी होने का हावा बनाया जा रहा है| जब हम "किसान" कहते है तब क्या हम सिर्फ़ उन्ही "किसानों" की बात कर रहे होते है, जिनके ज़मीनों को अधिग्रहण कर 3-4 करोड़ रुपया प्रति एकड़ मुआवज़ा दिया जाता है, या उन किसानों की जो लाखों रुपया क़र्ज़ लेकर खेती करते है, और  किसी साल  जब प्राकृतिक आपदा या किसी वज़ह से फसल खराब हो जाती है तो आत्महत्या जैसे कदम उठाने पड़ जाते है, ये कैसे किसान है जो लाखों रुपया क़र्ज़ लेकर खेती करते है, और उन्हे इस खेती से इतना भी बचत नही हो पता की एक साल किसी तरह अपने परिवार का/ अपने बच्चों का भारण पोषण कर सके, सीधे आत्महत्या ही एक विकल्प बचता है उनके पास? निश्चित रूप से ये वैसे ही किसान है जैसे सिर्फ़ "मुस्लिम" ही हमारे देश में अल्पसंख्यक है|हमने तो ऐसे किसान देखे नही भाई, हम तो सिर्फ़ ऐसे किसान देखते रहे है, जो आज भी अपने बच्चों की पढ़ाई, बेटी की शादी और परिवार के दावा-बिमारी के लिए अपनी ज़मीनों को 50-60 हज़ार रुपया प्रति बीघा पर बेचने को मजबूर है| हम तो सिर्फ़ ऐसे किसानों को जानते है, जिनकी अगर फसल खराब हो जाती है, तो दूसरों के मज़दूरी कर, शहर में खुद या अपने बच्चों को भेज चार पैसे कमाने के लिए, दस गालियाँ खा कर अपना पेट भरते है, और अगर उससे भी पेट ना भरे तो गुड़  खाकर,पानी पीकर, गमछा अपने पेट पर बाँध कर सो जाते है| क्या ये किसान भारत देश के किसान नही है? ये तो आत्महत्या नही करते, क्योंकि इनके उपर अपने पूरे परिवार का भारण-पोषण का दयीत्व होता है| इन दोनों तरह के किसानों में किस तरह के किसानों की संख्या ज़्यादा है?सरकार अगर कोई क़ानून बनाए तो उसे किस तरह के किसानों के जीवन स्तर को बेहतर करने की प्राथमिकता होगी?  व्यावसाय के रूप में खेती करने के लिए लाखों रुपया क़र्ज़ लेकर फिर आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे है, सिर्फ़ यही किसान है, बाकी पूरा देश किसान विहीन हो चुका है, सिर्फ़ दिल्ली और दिल्ली के आस-पास ही किसान रहते है|अगर मोदी सरकार सच में वोट बैंक के परवाह किए बिना देशहित में काम करती है, तो इन "मौसमी मेढ़क" के परवाह किए बिना, देश के उन करोड़ों किसानो के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के उदेश्य पर काम करे| जब परिणाम आने शुरू हो जाएँगे तो अपने आप "मौसमी मेढ़क" के आवाज़ बंद हो जाएगी|
@मनोरंजन

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