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Tuesday, April 25, 2017

नक्सलीयों की सच्ची कहानी

नक्सलीयों की सच्ची कहानी
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मैं बक्सर जिला, बिहार का रहने वाला हूँ, बक्सर जिला भी नक्सल प्रभावित जिला के रूप में जाना जाता था,  मगर सच्चाई इससे मीलों दूर है। हमारे गाँव के पास ही एक "बरूहां" नाम का गाँव है, वहाँ पर दो जातियों का गुट था एक यादव और एक चौधरी गुट, दोनों गुटों में अक्सर खूनी संघर्ष होता था। हम जब स्कूल जाते थे तो एक बार इस गोली-बारी में फंस भी गए थे। हमारे गाँव के बधार में दो तरफ से गोलियाँ चल रही थी। उस जातीय सघर्ष को/ दो गुटों के बीच अपना सिक्का ज़माने, "भय" का कारोबार करने को अख़बार वाले नक्सली हमला, नक्सली आंदोलन का नाम देते थे, अभी भी उसे नक्सली लिखा जाता है, अभी पिछले साल उनका एक नेता मारा गया तो इसे नक्सली हमला में मारा गया लिखा गया हर जगह। जबकि यह दो अपराधिक गुटों के बीच अपना सिक्का ज़माने का संघर्ष था। बाद में और उस समय भी ये दोनों गुट, बच्चों का अपहरण करने, चोरी-डकैती, बैंक लूट, थाना पर हमला कर हथियारों की लूट और उगाही करने में लगे रहे थे। पुरे क्षेत्र में भय का माहौल व्याप्त था। आलम यह था कि उस गाँव में, शिक्षा का माहौल बिल्कुल ख़त्म हो चुका था, गाँव में अनपढ़ पीढ़ी की एक जमात तैयार हो गई थी, जो भी बच्चा बड़ा होता था, उसका पहला ध्येय एक बंदूक लेकर अपनी जाति के गुट में शामिल हो जाना था। ये सब लोग किसी मुद्दे को लेकर सघर्ष नहीं कर रहे थे, ना ही उनका जमींदारों से कोई संघर्ष था, बल्कि यह सब इनकी  वर्चस्व की लड़ाई का नतीजा था। कई लोग मरे गए और कई लोग जेल में जाकर फिर रिहा होकर नेता भी बन गए यह बात 1995 -96  की है, तब प्रदेश में लालु यादव की सरकार थी, दोनों गुटों को राजनैतिक समर्थन हासिल था, फिर इसी में से निकल कर कोई पुरे क्षेत्र में चौधरी (कुर्मियों) का नेता बन गया कोई यादवों का नेता बन गया, और इनका जाल बक्सर, आरा, बिक्रमगंज, सासाराम और कुछ हद तक उत्तरप्रदेश तक फ़ैल गया।  मगर फिर भी इसे नक्सली आंदोलन से जोड़ा जाता है। इसमें संघर्ष करने वाले दोनों गुट के मुखिया खुद अच्छी-खासी जमीन रखते थे, तो उनका किसी ब्राह्मण, राजपुत, भुमिहार, लाला से जमीन की लड़ाई नहीं थी, लेकिन जो इनके नज़र में आ जाता था, उससे ये पैसे, धन-दौलत ऐंठ लेते थे। ये था हमारे बक्सर का नक्सली संघर्ष, जिसमें अन्य जातियाँ भी जुड़ती गई, मुसहरों को लाल झंडे के तले बुला कर बताया जाता रहा कि यहाँ के मुल निवासी (आदिवासी) वे ही है, बाद में आर्यों ने आकर्मण कर उनकी जमीनें कब्ज़ा ली थी तो वे भी लाल झंडा लेकर घुमने लगे थे। बाद में इस नक्सली आंदोलन को तोड़ने के लिए रणबीर सेना का गठन हुआ, कहानी वही थी सिर्फ अपने वर्चस्व की लड़ाई में जीत हासिल करना, उसके लिए धन चाहिए जो लूट-पाट से आएगी, हथियार चाहिए तो किसी थाने पर हमला करना पड़ेगा।  पुरे देश में जहाँ भी नक्सली संघर्ष जारी है, वहाँ की यही कहानी है। कोई शोषण के खिलाफ नहीं लड़ रहा है, बल्कि सब "भय" का कारोबार कर अपने महत्वाकांक्षाओं को पुरा करने में लगे है। इसमें  जो बंदूक़  हाथ में लेकर  हमला करते है, उन्हें तो  अभियान तक की खबर नहीं होती, उन्हें जो आदेश दे दिया जाता है, वे करने निकल पड़ते है, अभावग्रस्त, अशिक्षित परिवार से होते है, परिवार का पालन-पोषण हो जाता है,आस-पास में एक रुतबा बन जाता है । इसमें सबसे बड़ा कारण शिक्षा का आभाव है, शिक्षा के आभाव में उन्हें कोई रोजगार नहीं सूझता, और पास में एक विकल्प दिखता है, हथियार से खेलने का शौक बस और कुछ भी इनके दिमाग में नहीं होता है। जब इनमें से कोई पुलिस के हाथों लग जाता है, तब इन्हे कोई पुछने वाला नहीं होता, नक्सली का ठप्पा लगा रहता है, पूरी उम्र जेल में गुजरना पड़ता है। जेल में बंद हो जाने के बाद, इन्ही बंदूक लेकर कहीं भी बिना सोचे समझे हमला करने वालों के परिवार से जाकर मिलो तो पता चलेगा, पत्नी किसी और की हो चुकी है, उसे बच्चे पालने है, बच्चों की जिंदगी नर्कीय हो चुकी है। अब आप बताओ इसमें शोषित वर्ग का संघर्ष दिखता है आपको ? आपको लगता है कि ये नक्सली /कश्मीर के पत्थरबाज  अपने वाज़िब हक़ के लिए लड़ रहे है? आज छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले में मारे गए लोगों के लिए बहुत दुःख है, और निश्चित रूप से सरकार इस हमले को रोक पाने में असफल रही है, मगर जिस तरह से  कुछ  बुद्धिजीवी लोगों द्वारा नक्सली हमले को/कश्मीर के पत्थरबाजों को, उनके वाज़िब हक़ की लड़ाई बता कर महिमामंडित किया जाता है, वह बहुत खतरनाक है। कुछ मित्र मानते है कि छत्तीसगढ़ में आदिवासी लोगों के जमीनों को जबरजस्ती सरकार कब्ज़ा कर रही है, आदिवासियों का जनसंहार किया जा रहा है, आदिवासी औरतों के साथ बलात्कार किया जाता है,  इसलिए वहाँ नक्सली आंदोलन चल रहा है, मुझे इस सच पर संदेह है, और अगर यह सत्य है तो शर्मनाक है।

 लेकिन हम भी इसी देश में रहते है, तमाम दोस्त है छत्तीसगढ़ से जो इस जमीनी सच्चाई को, इस ये बीभत्ससा का कभी उल्लेख नहीं करते, देखिये भुमि अधिग्रहण का एक कानून बना है, और उस कानून के हिसाब से ही जमीनों का अधिग्रहण किया जाता है, ये सच है कि आदिवासी समाज इस अधिग्रहण के खिलाफ संघर्षरत है, मगर आदिवासी संघर्ष को नक्सलियों से जोड़ देना बहुत गलत है। नक्सली आज से नहीं है पिछले 25 -30 सालों से नक्सलियों के बारे में सुनते आ रहे है। यह एक भटके हुए लोगों का रास्ता है, जिन्हे बिना वजह बंदूकों से प्यार है। मैं आपको एक सच्चाई बताता हूँ, बिहार के जहानाबाद जिले में मेरा एक दूर के रिश्ते में लगने वाला ब्राह्मण नक्सली था, मारा गया, मैं उससे मिल चूका हूँ, बात भी किया है, उसके नक्सली होने की कोई वजह नहीं थी, लेकिन वह अपने आप को नक्सली कमांडर होने को बहुत गर्व से बताता था, एक रौब पड़ता था लोगों पर कि इसके पास सोते समय भी बन्दूक रहती है। यह सोच, यह रौब नक्सलवादियों से जुड़ने का कारण बनता है।  ये ऐसा ही है, जैसे सेना में भर्ती होना है, ये बंदूक चलने वाले लोग सिर्फ अपने कमांडर का ऑर्डर लेते है, आदेश हो पूरा कर देते है। कमांडर और उससे भी बड़े पदों पर जो नक्सली है, उनकी महत्वकांक्षाएं अनंत है कहानी ऐसी है, जिसे आदिवासी संघर्ष से जोड़ कर सरकार के खिलाफ हवा बनाया जा रहा है। जो भी हो नक्सली हिंसा में मरे लोगों के प्रति दुःख व्यक्त करता हूँ, और निश्संदेह ही इस घटना को नाकाम ना कर सकने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार जिम्मेवार है। और मैं चाहता हूँ कि इन नक्सलियोंको निर्दयता से कुचलने के लिए सरकार कोई ठोस कदम उठाये। @ मनोरंजन कुमार तिवारी

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