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Monday, April 24, 2017

किसानों के दुर्दशा पर घड़ियाली आँसू बहाने वालों सुनो .........

किसानों के दुर्दशा पर घड़ियाली आँसू बहाने वालों सुनो .........
जब किसानों की जमीनों को गाजर-मूली के भाव में अधिग्रहण करके उस पर बड़े-बड़े बिल्डिंगें बना कर उन्ही किसानों को उन संस्थानों में, उद्द्योगों में प्रवेश निषेद्ध कर दिया गया तब तो आपको वे किसान याद नहीं आये, जब एक पूरी की पूरी किसानों की पीढ़ी को बंधुआ मज़दूर बनने को मजबूर कर दिया गया तब तो आपको वे किसान प्यासे और भुखे नज़र नहीं आये अब जबकि किसानों के बेहतरी के लिए प्रयास किये जा रहे है, तो आप अहिंसक आंदोलन( गू -मूत पीकर ) का हवाला देकर इंसानियत और किसानों की अस्मिता एवं आत्मसम्मान का एहसास करा रहे है? पेशाब पीना क्या होता है जानते है आप ? आज भी देश में ऐसे बहुत से क्षेत्र है जहाँ के लोग सिर्फ नाटक के लिए नहीं बल्कि रोज पेशाब जैसे पानी पीने को मजबूर है, बीमार पड़ते है, मर जाते है, कौन सुधरेगा उनका जीवन ?ऐसा कौन सा प्रदेश है जहाँ किसानों के साथ सबसे ज्यादा अन्याय हुआ है? क्या ये तमिलनाडु के किसान, बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल के किसानों से भी गये -गुजरे है? कब सुना आपने कि बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में किसी किसान ने आत्महत्या किया? कब सुना आपने कि बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में कोई किसान पेशाब पीने को मजबूर हुआ? अपनी अस्मिता एवं आत्मसम्मान का एहसास जिसे नहीं है उनके लिए कोई सरकार क्या कर सकती है ? आप सबको पता है भारत के अर्थव्यवस्था के बारे में, उसी अर्थव्यवस्था में देश के सेनाओं का खर्च, तमाम तरह के ढांचागत विकास, शिक्षा, स्वस्थ ,किसान सबको बेहतर जीवन देने का प्रयास करना है, कहाँ से आएगा वो पैसा जो किसी एक प्रदेश के किसान पर खर्च कर दिया जाएगा ? अभी उत्तर प्रदेश में किसानों के कर्ज माफ़ किये गए तो राज्य सरकार ने खुद उस पैसे को अर्जित करने का उदेश्य रखा है। किसी एक प्रदेश के किसान, या किसी एक ख़ास वर्ग को हजारों करोड़ रूपया का तौफा दे देने से बेहतर है कि उसी पैसे से ऐसी व्यवस्था बनाई जाये कि पुरे देश के किसानों का जीवन यापन बेहतर हो सके, पुरे देश के नागरिकों का जीवन बेहतर बन सके। लॉलीपॉप देने से कुछ नहीं होगा, जिसे मिल जायेगा वो खुश हो जायेगा और जिसे नहीं मिलगा वो रोएगा। बेतुके बात करके दिमाग का दही बनाते रहते है दिन भर, " किसानों के लिए पैसे नहीं है, और साहब दस लाख के सूट पहनते है? कौन प्रधानमंत्री नंगा घुमता था ? एक चाय वाले को दस लाख का सूट नहीं पहनना चाहिए? क्यों ? उसने अपना जीवन समर्पित किया है, इस जगह पहुँचने के लिए, और फिर प्रधानमंत्री की गरिमा कुछ होती है कि नहीं?समय परिवर्तन होता है, तिलमिलाने से कुछ नहीं होगा। 1996 में जब अटल बिहारी वाजपेयी और सुषमा स्वराज एक तरह से रो रहे थे तब आपको( किसी भी पार्टी को) रहम आयी थी उन पर, तब तो ये क्षेत्रीय पार्टियां अपनी सात पुस्तों के लिए इंतेजाम करने में जुटी थी, और ये वाम पंथी तब छुप-छुप के मलाई खा रहे थे ।तब तो आपने सोचा था कि ये तो ऐसे ही चलेगा, जो हम चाहेंगे वही होगा। अब जो आप चाहते है वो नहीं हो रहा है तो तिलमिला है। अब असली लड़ाई है दक्षिण पंथ और वाम पंथ की, आप लड़ो देखते है कौन जीतता है।

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