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Tuesday, June 30, 2015

धृष्टता

वो हर काम,
जिसे छुपाने की जरुरत होती है,
अपराध कही जाती है,
सिवा एक प्रेम को छोड़ कर,
बिना छुपाए प्रेम,
अपने सम्पूर्णता को प्राप्त ही नहीं होता,
अफ़सोस नहीं है मुझे अपनी धृष्टता का,
तुम्हे छूने के लिए,
किस हद की चोरी कर जाता था,
आज भी मेरी अँगुलियों में तुम्हारी ख़ुश्बू,
वैसी की वैसी ही है,
अगर चोरी ना करता तो,
मेरे पास तुम्हारा कुछ नहीं बचता। @मनोरंजन 

कर्म से अस्तित्व है

कर्म से अस्तित्व है
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पंक्षियों को देखा है थकते?
चींटियों  को सुस्ताते?
बारीस  को भींगते देखा है?
या नदियों को देखा गुस्साते?
पेड़ कहाँ रोकता है किसी को
अपना फल खाने से,
नहीं टोकता है किसी को,
उसके छाया में बैठ जाने से,
धरती को देखा है रोते,
इतनी चोट जो खाती है,
फिर सयंम से रहती है,
सबको अपने आँचल में सुलाती है,
सूर्य उदित होता है समय से,
आलस नहीं करता है,
चांदा भी उगता है रात को,
बैर नहीं करता है,
कर्म से ही अस्तित्व है इनका,
कर्म अपना करते है,
देने से घबराते नहीं,
ना कल के लिए पछताते है,
कर्म, जीवन की अमूल्य निधि है,
कर्म से ही अपना पहचान बनाते है। @मनोरंजन

दानव (लघु कथा )

दानव (लघु कथा )
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अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए, उसके चहरे पर पहले तो बिल्कुल  मासूम सी मुस्कराहट फैल  जाती है, फिर वह मुस्कराहट उदासी में बदलते हुए पलकों पर अश्रु के बूँदों  के रूप में नज़र  आने लगती  है।  फिर थोड़ा नाख़ुश  सा होकर कहती है, मैँ  कहती थी ना पुरानी बातें तकलीफ़  देती है, ना  जाने क्यों तुम,हमेशा गुजरे ज़माने की बातें करते हो। उसने बताया की वह बचपन में बहुत शरारती थी, घर में सबसे छोटी थी तो सबकी लाडली भी थी। निश्चय ही वह बचपन में बहुत खूबसूरत और चंचल रही होगी। उसके दो बड़े भाई और दो बड़ी बहनें है।बहुत कहने पर उसने अपनी  संक्षिप्त आपबीती सुनाई,  उसने बताया की कैसे जब वह बारहवीं  कक्षा में थी तो, उसके घर पर उसके छोटे भैया का दोस्त आया था, वह लड़का उसको देखते ही रह गया था, और जाते समय उसके भैया से बहुत सहस करके  बोला था,"निक्कू, मुझे तुम्हारी छोटी बहन बहुत पसंद आई है" अगर संभव हो तो मैं इससे शादी करना चाहूंगा।  घर में सब लोग एक साथ बैठ कर खाना खा रहे थे, तब  निक्कू भैया ने उस लडके की मन की बात बताई तो सभी लोग ठठाकर हँस  पड़े। बात इतनी भी अजीब नहीं थी, मगर मैं अभी बहुत छोटी उम्र की थी, मुझसे बड़ी दो बहनों की शादी होनी थी, भाइयों की शादी होनी थी, इसलिए यह बात हंसी-मज़ाक  का विषय बन कर रह गया। दोनों बहनों और दोनों भाइयों की शादी होते-होते काफी साल गुजर गए, इस दौरान उस लडके ने भी शादी कर ली और अपने परिवार के साथ ना जाने कहाँ जिंदगी गुजरने लगा।  मैं अपने कॉलेज  की पढ़ाई ख़त्म कर जीवन में कुछ करने के लिए दिल्ली आ गई। दिल्ली आये हुए मुझे आठ साल हो गए है, गुजर-बसर तो हो रहा है.............. ये कहते हुए उसके आँखों अश्रु की धरा बह  निकली, जो उसने काफी देर से ज़ब्त  कर रखा था।
इस दौरान उसके साथ क्या-क्या हुआ, ये सब लिखना तो संभव नहीं है, मगर इतना बताना जरुरी है की, उसके दोनों भाइयों की शादी होने के बाद वे अलग अपनी जिंदगी गुजारने लगे। पिता जी जो एक प्राइवेट फार्म में काम करते थे, सेवानिवृत हो गए, और उनकी सारी  जमा-पूंजी, दो बेटियों के शादी, बेटों के जीवन सुचारू रूप से शुरू कराने  में खाप गई। बच गई एक छोटी लड़की, जिसकी शादी की फ़िक्र माँ  को तो होती है, पर पिता असमर्थ है, भाइयों ने भी हाथ खड़े कर रखे है, और हर तरह से ख़ूबसूरत , प्रतिभावान और चरित्रवान होते हुए भी, दिल्ली में वह सिर्फ गुजर -बसर करने के लिए ना जाने कितने घाट  का पानी  पीने को अभिशप्त है। घर जाकर बैठ जाने से कुछ भी हासील  नहीं होने वाला, सिवा  जीवन भर माँ -पिता के सेवा के लिए, चूल्हा झोंकने  के ,क्योंकि एक पढ़ी-लिखी, प्रतिभावान लड़की के लिए सुयोग्य लड़का ढूंढने के लिए लाखों का दहेज़ लगता है। ये  दहेज़ रुपी दानव, उसकी खूबसूरती और प्रतिभा को दिनों-दिन निगलते जा रहा है, और वह इस उम्मीद में जिंदगी गुजार रही है की,कभी तो वैसा ही एक लड़का आएगा उसके जीवन में जो कहेगा की,"तुम मुझे बहुत पसंद हो,अगर संभव हो तो मैं तुमसे शादी करना चाहूंगा"( बिना दहेज़ के )। @ मनोरंजन

Thursday, June 25, 2015

नेपाल में भुकंप

नेपाल में  भुकंप
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अभी जिंदगी आँख मिच रही थी,
नींद से जाग  कर,
देख रही थी मुस्कुरा कर,
अँगड़ाइयाँ लेते सुबह को,
अभी उमंग उठे थे दिल में,
नए सूर्य के साथ आगे बढ़ने को,
जीने को एक नया सवेरा,
चल  पड़े थे पाँव उठ कर,
अभी-अभी निकले थे कुछ नन्हे पाँव,
नया कुछ रचने  को,
चल पड़े थे मज़बूत  कदम,
अर्जन कुछ करने को,
अभी-अभी देखा था माँओं ने,
अपने नैनिहालों को हुलस कर,
किसे पता था,
की काल  रच चुका था अपना खेल,
माँ  धरती के आँचल में होने लगा था हलचल,
पल भर में ही जिंदगी,
बदल गई थी चीख़, हाहाकारों में,
हाय ये कैसी विडम्बना,
धरणी ही बन गई हन्ता,
माँ  तुम ये कभी न करना,
ऐसा विकट  रूप कभी न धरना। @ मनोरंजन

सज़ा

सज़ा
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हाँ, तुम्हारे बाद किसी से कुछ कहता नहीं,
सुनता  भी नहीं कुछ किसी का,
सब अर्थहीन सा लगता है,
शायद इसिलिए सब मुझे अभिमानी समझते है,
 घमंडी हूँ,
ये सोच कर कोई पास नहीं आना चाहता है,
जबकि मुझे किसी के स्नेहहिल साथ की सख़्त  जरुरत है,
पर मन पढने को फ़ुर्सत किसे है,
सब रिश्ते में आदान-प्रदान की अनिवार्यता को रेखांकित करते है,
और मैं उनके बनाए वसूलों पर खरा नहीं उतर  पाता,
ये विवसता है मेरी,
तुमसे जुड़े होने की कुछ तो सज़ा  मिलनी ही चाहिए। @ मनोरंजन

कुछ बचा रह गया है

कुछ बचा रह गया है 
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कितनी नफरतें कर ली हमने,
शायद इससे ज्यादा न तुम कर सकते हो,
ना मैं,
तुम्हारी सूरत ख्वाबों में भी ना देखने की कसम ली है मैंने,
और तुम्हे मेरी आवाज़ से भी नफ़रत है,
मेरे बारे में कहीं कोई बात चले,
सुन कर तकलीफ़ होती है तुम्हे,
तुमने वह सभी जगह जाना छोड़ दिया है,
जहाँ मेरा ज़िक्र भी होता है,
बना लिया है एक मज़बूत आवरण,
जिससे मुझे ख़बर ना कुछ तुम्हारे बारे में,
मैं भी अक्सर बच कर निकलता हूँ,
हर उस जगह से,
जहाँ तुम्हारे मौजूदगी का एहसास होता है,,
मगर क्या करूँ उन पंक्तियों का,
उन हर्फ़ों का,
जिन्हे तुमने लिखा था, और मुझे सुनाया था,
जो बरबस ही जेहन में आ ही जाते है,
और कितना भी रोकूँ ख़ुद को,
मगर आँखे झर -झर बहने लगती है,
शायद प्यार भी था हमदोनों के बीच,
जो बचा रह गया है अब भी,
आँखों के पलकों में। @ मनोरंजन

Wednesday, June 24, 2015

तू चले ना चले

तू चले ना चले
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तू चले ना चले,
राहें चलती जाएँगी,
अपनी-अपनी मंज़िल की ओर
सूर्य उदय हुआ है तो अस्त भी होगा,
अँधेरा गहराता जाएगा,
तू चले ना चले।

सांसे चलती रहेंगी निरंतर,
थकने और फिर थम जाने तक,
रक्त नाड़ियों में अपने रफ़्तार से बहता रहेगा,
तू चाहे तो उबाल आएगा लहू में,
नहीं तो ख़ून पानी हो जायेगा,
तू कहे ना कहे,
वक्त तेरा हर हर्फ़ लिखेगा,
तू चले ना चले।

जिंदगी चलते जायेगी,
अतित को विस्मृत कर,
वर्तमान के छाती पर,
किसी मासूम बच्चे की  अँगुलियों की तरह,
कभी गुदगुदी करते तो,
कभी छाती के बालों को नोच कर पीड़ा पहुँचाते,
यों ही खिलखिलाती रहेगी जिंदगी,
जब तक तू उस पीड़ा में भी आनंद पाते रहेगा,
झुन्झुलाने, गुस्साने पर बिदक कर दूर चली जाएगी जिंदगी,
तू चले ना चले,
चलते जाएगी जिंदगी।@ मनोरंजन

Monday, June 22, 2015

क्या नरेन्द्र मोदी भारत के छठे प्रधानमंत्री नहीं है?

क्या नरेन्द्र मोदी भारत के छठे प्रधानमंत्री नहीं है?
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कहने को तो अब भी कुछ थेथ्थर टाइप के लोग कह रहे है की " अच्छे दिन आ गए क्या" अब उन बक्लोलों को कौन समझाए की अच्छे दिन के मतलब हर भारतीय के बैंक खाते में 15 लाख रुपये डालना नहीं होता......पता नहीं कौन उजबुक ऐसी बेसिर-पैर की बातें करके सोचता है की भारत के लोग अब भी बेवकूफ है, हवा बना देने से हवा के साथ बह जायेंगे........ उन्हें कुछ दिखाई नहीं देगा क्या? ये उजबुक देश के जनता को बेवकूफ़ मानते-मानते 60-65 साल में खुद ही बकलोल बन गए है....... अगर सिर्फ हवा बनाने से सरकार बन सकती तो दिल्ली का मुख्यमंत्री कोई भाजपा का नहीं होता? और इतने बड़े उदहारण से भी नहीं सिख रहे ये बकलोल लोग....... स्वच्छता अभियान और योग दिवस जैसे पहल को भी टारगेट करने लगते है..... ये क्या कम है की देश एक ऐसे प्रधानमंत्री को देख रहा है, जो पुरे देश को अपना परिवार मनाता है, परिवार का मुखिया भी तो कई बार अपने परिवार के लोगों के सभी आकाँक्षाओं को पूरा नहीं कर पता और कई बार तो परिवार को बेहद मुश्किल से गुजरना पड़ता है तो क्या परिवार वाले अपने मुखिया को छोड़ देते है?
पहली बार हम एक ऐसे प्रधानमंत्री को देख रहे है, जो पहल करता है देशवासियों को कुछ अच्छा करने को प्रेरित करता है..... इससे पहले क्या आपने सुना है किसी प्रधानमंत्री को देशवाशियों को कुछ अच्छा करने को प्रेरित करते हुए? राजीव गाँधी और अटल बिहारी वाजपेयी के बीच के प्रधानमंत्रियों के तो नाम याद रखने को मसक्कत करने पड़ते है, खीज भी होती है, उन प्रधानमंत्रियों के बारे में हेरा-फेरी और तमाम अरुचिकर बातो के सिवा कुछ भी याद नहीं आता....... मेरे लिए तो मोदी, भारत के छठे प्रधान मंत्री है.... नेहरू जी, लालबहादुर शाष्त्री जी, इंदिरा जी, राजीव गाँधी जी, अटल बिहारी वाजपेयी जी और छठे नरेन्द्र मोदी जी।@ मनोरंजन 

Friday, June 5, 2015

एक बाल मज़दूर

एक बाल मज़दूर
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एक खिड़की है,
खिड़की के पीछे से झाँकती एक जोड़ी आँख है,
उन आँखों में डर है, घबराहट है,
बेवसी है, याचना है,
हाँ एक उम्मीद की चमक भी है,
दिन-रात  चमकते रहती है ये आँखें,
ऐसा लगता है कातर स्वर में  कहना चाहती है,
मुझे निकालो यहाँ से,
जुबाँ पर ख़ामोशी है,
एक रिक्तता है,
चहरे पर इतना कुछ लिखा है,
की पढने वाले की रूह काँप जाए ,
पर पढने वाला नहीं कोई,
दिखता भी तो नहीं वो चेहरा,
मैदान में खेलते बच्चों के झुण्ड में,
दुबका रहता है दिन-रात
उसी खिड़की के पीछे,
बस एक लक़ीर  दिखती है,
जीस  पर स्पष्ट लिखा होता है,
मुझे, मेरे घर छोड़ दो,
मुझे, मेरे माँ -बापू के पास छोड़ दो। @मनोरंजन 

Wednesday, June 3, 2015

फर्क

प्यार होने और प्यार नहीं होने में बहुत फर्क होता है परी ,
जब हमें किसी से सच्चा प्यार होता है तो,
उसकी हर बात अच्छी लगती  है,
हर माँग  जायज़  लगती  है,
उसके साथ रहना और जीना  बेहद आसान होता है,
क्योंकि उसके साथ  होने मात्र से बाकी  सब कमियों का एहसास नहीं होता,
बाकी  सब दुर्बलताएँ और असफलताएँ गौण हो जाती है,
और इसतरह जीवन हर्ष,उल्लास,और उत्साह से भर कर सफलता की ओर अग्रसर हो जाती है,
पर,
जब हमें किसी से प्यार नहीं होता,
और हमें साथ जीवन जीना  होता है तो,
जीवन अनेक कठिनाइयों से भर जाती है,
भले ही वह निर्दोष हो, मासूम हो और चारित्रिक गुणों से भी भरपूर हो,
मगर हमें हर बात-बात में कुछ खोट नज़र आती है,
उसकी हर बात नापसंद सी होने लगती  है,
उसकी हर माँग गलत लगाने लगती है,
और सबसे बड़ी बात,
जीवन सिर्फ एक इसी बिंदु के इर्द-गिर्द घूमने लगती है की,
कैसे परस्पारिकता स्थापित करें,
कैसे सब अच्छा हो जाए ,
क्या करें की ख़ुशी  उल्लास का माहौल बने,
और हम चाहे कितने भी बुद्धिमान और समझदार शख़्स क्यों न हो,
बात बिगङते चली जाती है,
और अंततः जीवन खीझ, चिड़चिड़ापन,गुस्सा और क्षोभ के भेंट चढ़ जाती है। @मनोरंजन   

Monday, June 1, 2015

क्षणिकाएँ

तू वृक्ष चन्दन की,
लिपटे रहते है अनंत विषधर तुमसे,
फिर भी अपनी खुशबू नहीं खोती। @ मनोरंजन 

क्षणिकाएँ

उसकी स्मृतियों की लकीरें इतनी गहरी है की,
वक्त और हालत के वर्षों से जमते धूल भी उसे समतल नहीं कर पाते ,
वक़्त -बेवक्त आ जाने वाली उसकी यादों की बयार में,
और मेरे आंसुओं के धार में,
बाह जाती है सारी धूल ,
और उसकी स्मृतियों की लकीरें ज्यों के त्यों बनी रहती है@ मनोरंजन