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Friday, June 5, 2015

एक बाल मज़दूर

एक बाल मज़दूर
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एक खिड़की है,
खिड़की के पीछे से झाँकती एक जोड़ी आँख है,
उन आँखों में डर है, घबराहट है,
बेवसी है, याचना है,
हाँ एक उम्मीद की चमक भी है,
दिन-रात  चमकते रहती है ये आँखें,
ऐसा लगता है कातर स्वर में  कहना चाहती है,
मुझे निकालो यहाँ से,
जुबाँ पर ख़ामोशी है,
एक रिक्तता है,
चहरे पर इतना कुछ लिखा है,
की पढने वाले की रूह काँप जाए ,
पर पढने वाला नहीं कोई,
दिखता भी तो नहीं वो चेहरा,
मैदान में खेलते बच्चों के झुण्ड में,
दुबका रहता है दिन-रात
उसी खिड़की के पीछे,
बस एक लक़ीर  दिखती है,
जीस  पर स्पष्ट लिखा होता है,
मुझे, मेरे घर छोड़ दो,
मुझे, मेरे माँ -बापू के पास छोड़ दो। @मनोरंजन 

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