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Tuesday, June 30, 2015

दानव (लघु कथा )

दानव (लघु कथा )
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अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए, उसके चहरे पर पहले तो बिल्कुल  मासूम सी मुस्कराहट फैल  जाती है, फिर वह मुस्कराहट उदासी में बदलते हुए पलकों पर अश्रु के बूँदों  के रूप में नज़र  आने लगती  है।  फिर थोड़ा नाख़ुश  सा होकर कहती है, मैँ  कहती थी ना पुरानी बातें तकलीफ़  देती है, ना  जाने क्यों तुम,हमेशा गुजरे ज़माने की बातें करते हो। उसने बताया की वह बचपन में बहुत शरारती थी, घर में सबसे छोटी थी तो सबकी लाडली भी थी। निश्चय ही वह बचपन में बहुत खूबसूरत और चंचल रही होगी। उसके दो बड़े भाई और दो बड़ी बहनें है।बहुत कहने पर उसने अपनी  संक्षिप्त आपबीती सुनाई,  उसने बताया की कैसे जब वह बारहवीं  कक्षा में थी तो, उसके घर पर उसके छोटे भैया का दोस्त आया था, वह लड़का उसको देखते ही रह गया था, और जाते समय उसके भैया से बहुत सहस करके  बोला था,"निक्कू, मुझे तुम्हारी छोटी बहन बहुत पसंद आई है" अगर संभव हो तो मैं इससे शादी करना चाहूंगा।  घर में सब लोग एक साथ बैठ कर खाना खा रहे थे, तब  निक्कू भैया ने उस लडके की मन की बात बताई तो सभी लोग ठठाकर हँस  पड़े। बात इतनी भी अजीब नहीं थी, मगर मैं अभी बहुत छोटी उम्र की थी, मुझसे बड़ी दो बहनों की शादी होनी थी, भाइयों की शादी होनी थी, इसलिए यह बात हंसी-मज़ाक  का विषय बन कर रह गया। दोनों बहनों और दोनों भाइयों की शादी होते-होते काफी साल गुजर गए, इस दौरान उस लडके ने भी शादी कर ली और अपने परिवार के साथ ना जाने कहाँ जिंदगी गुजरने लगा।  मैं अपने कॉलेज  की पढ़ाई ख़त्म कर जीवन में कुछ करने के लिए दिल्ली आ गई। दिल्ली आये हुए मुझे आठ साल हो गए है, गुजर-बसर तो हो रहा है.............. ये कहते हुए उसके आँखों अश्रु की धरा बह  निकली, जो उसने काफी देर से ज़ब्त  कर रखा था।
इस दौरान उसके साथ क्या-क्या हुआ, ये सब लिखना तो संभव नहीं है, मगर इतना बताना जरुरी है की, उसके दोनों भाइयों की शादी होने के बाद वे अलग अपनी जिंदगी गुजारने लगे। पिता जी जो एक प्राइवेट फार्म में काम करते थे, सेवानिवृत हो गए, और उनकी सारी  जमा-पूंजी, दो बेटियों के शादी, बेटों के जीवन सुचारू रूप से शुरू कराने  में खाप गई। बच गई एक छोटी लड़की, जिसकी शादी की फ़िक्र माँ  को तो होती है, पर पिता असमर्थ है, भाइयों ने भी हाथ खड़े कर रखे है, और हर तरह से ख़ूबसूरत , प्रतिभावान और चरित्रवान होते हुए भी, दिल्ली में वह सिर्फ गुजर -बसर करने के लिए ना जाने कितने घाट  का पानी  पीने को अभिशप्त है। घर जाकर बैठ जाने से कुछ भी हासील  नहीं होने वाला, सिवा  जीवन भर माँ -पिता के सेवा के लिए, चूल्हा झोंकने  के ,क्योंकि एक पढ़ी-लिखी, प्रतिभावान लड़की के लिए सुयोग्य लड़का ढूंढने के लिए लाखों का दहेज़ लगता है। ये  दहेज़ रुपी दानव, उसकी खूबसूरती और प्रतिभा को दिनों-दिन निगलते जा रहा है, और वह इस उम्मीद में जिंदगी गुजार रही है की,कभी तो वैसा ही एक लड़का आएगा उसके जीवन में जो कहेगा की,"तुम मुझे बहुत पसंद हो,अगर संभव हो तो मैं तुमसे शादी करना चाहूंगा"( बिना दहेज़ के )। @ मनोरंजन

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