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Thursday, June 25, 2015

कुछ बचा रह गया है

कुछ बचा रह गया है 
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कितनी नफरतें कर ली हमने,
शायद इससे ज्यादा न तुम कर सकते हो,
ना मैं,
तुम्हारी सूरत ख्वाबों में भी ना देखने की कसम ली है मैंने,
और तुम्हे मेरी आवाज़ से भी नफ़रत है,
मेरे बारे में कहीं कोई बात चले,
सुन कर तकलीफ़ होती है तुम्हे,
तुमने वह सभी जगह जाना छोड़ दिया है,
जहाँ मेरा ज़िक्र भी होता है,
बना लिया है एक मज़बूत आवरण,
जिससे मुझे ख़बर ना कुछ तुम्हारे बारे में,
मैं भी अक्सर बच कर निकलता हूँ,
हर उस जगह से,
जहाँ तुम्हारे मौजूदगी का एहसास होता है,,
मगर क्या करूँ उन पंक्तियों का,
उन हर्फ़ों का,
जिन्हे तुमने लिखा था, और मुझे सुनाया था,
जो बरबस ही जेहन में आ ही जाते है,
और कितना भी रोकूँ ख़ुद को,
मगर आँखे झर -झर बहने लगती है,
शायद प्यार भी था हमदोनों के बीच,
जो बचा रह गया है अब भी,
आँखों के पलकों में। @ मनोरंजन

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