कर्म से अस्तित्व है
------------------------
पंक्षियों को देखा है थकते?
चींटियों को सुस्ताते?
बारीस को भींगते देखा है?
या नदियों को देखा गुस्साते?
पेड़ कहाँ रोकता है किसी को
अपना फल खाने से,
नहीं टोकता है किसी को,
उसके छाया में बैठ जाने से,
धरती को देखा है रोते,
इतनी चोट जो खाती है,
फिर सयंम से रहती है,
सबको अपने आँचल में सुलाती है,
सूर्य उदित होता है समय से,
आलस नहीं करता है,
चांदा भी उगता है रात को,
बैर नहीं करता है,
कर्म से ही अस्तित्व है इनका,
कर्म अपना करते है,
देने से घबराते नहीं,
ना कल के लिए पछताते है,
कर्म, जीवन की अमूल्य निधि है,
कर्म से ही अपना पहचान बनाते है। @मनोरंजन
------------------------
पंक्षियों को देखा है थकते?
चींटियों को सुस्ताते?
बारीस को भींगते देखा है?
या नदियों को देखा गुस्साते?
पेड़ कहाँ रोकता है किसी को
अपना फल खाने से,
नहीं टोकता है किसी को,
उसके छाया में बैठ जाने से,
धरती को देखा है रोते,
इतनी चोट जो खाती है,
फिर सयंम से रहती है,
सबको अपने आँचल में सुलाती है,
सूर्य उदित होता है समय से,
आलस नहीं करता है,
चांदा भी उगता है रात को,
बैर नहीं करता है,
कर्म से ही अस्तित्व है इनका,
कर्म अपना करते है,
देने से घबराते नहीं,
ना कल के लिए पछताते है,
कर्म, जीवन की अमूल्य निधि है,
कर्म से ही अपना पहचान बनाते है। @मनोरंजन
No comments:
Post a Comment
Write here