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Tuesday, February 28, 2017

"दिल्ली के सिंघासन"


 नहीं  . . . . . . . . .
यह सिर्फ छात्रों का मामला नहीं है, सिर्फ विश्वविद्यालयों का मामला नहीं है, यह मामला है "दिल्ली के सिंघासन" का जो हमेशा से कुलीन वर्ग के लिए आरक्षित था, यहाँ के फ़िज़ाओं में ऐसी हवा बहती है  या बहाया जाता कि  साधारण परिवार से  आने वाले  सभी प्रधानमंत्री इस हवा में उड़ा  दिए जाते है।  उदहारण के लिए चौधरी चरण सिंह, मोरारजी देसाई, देवगौड़ा, गुजराल और बहुत हद तक अटल बिहारी बाजपेयी (आसान नहीं था उनका प्रधानमंत्री बनाना, 1998 -1999 के समय संसद में क्या कुछ हुआ, उसे याद करने से सब कुछ साफ़ हो जायेगा )
यह मामला  शुरू होता है एक गरीब परिवार के बेटे का प्रधानमंत्री बन जाने के बाद।  कैसे ये अनहोनी हो गई, यह सीट सिर्फ और सिर्फ कुलीन लोगों के लिए ही रिजर्ब थी, कैसे एक साधारण व्यक्ति  तमाम घेरेबंदियों के बावजूद  इतने ठसक के साथ इस मुकाम तक पहुँच सका  . . . . . .मामला उसी समय शुरू हो गया था।  एक महीना भी नहीं गुजरा था कि  सरकार के कामकाज का हिसाब माँगे जाने लगे थे, देश के किसी भी कोने में हुई किसी भी छोटी-बड़ी घटना को इस सरकार पर थोप कर उससे जबाब माँगे जाने लगे थे। 6 महीना के अंदर ही बेहद प्रगतिशील/चिंतनशील/ देश और समाज के प्रति प्रतिबद्ध लेखक लोग अपने-अपने पुरस्कार वापस करने लगे थे, क्योंकि सरकार ने (माफ़ करें सिर्फ एक व्यक्ति ने ) पुरे देश में नफ़रत का/असहिष्णुता का जहर फैला दिया था।
नफ़रत और असहिष्णुता कौन फैला रहा है? जरा नज़र दौड़ा कर तो देखो
इससे पहले भी किसी प्रधानमंत्री को इतने तमीज़ से पुकारा था किसी ने ?  कहीं भी कोई गली का कुत्ता उठता है और भारत के प्रधानमंत्री को अपशब्द बोलता है, उसके तस्वीर को चप्पल/जूतों से पिटवाता है, ऐसा पहले हुआ है क्या? मनमोहन सिंह जैसे प्रधानमंत्री के साथ भी नहीं हुआ कभी ऐसा। पुतला जलना/विरोध प्रदर्शन करना हमेशा होते रहा है पर इतना ओछापन /इतनी नफ़रत /इतनी असहिष्णुता कब देखी आपने? और आप उसे ही कह रहे है कि वह नफ़रत और असहिष्णुता कौन फैला रहा है, कमाल है ना?
वह तो सांप्रदायिकता /धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्दों का प्रयोग भी नहीं करता , वह जनता है जैसे ही उसके मुँह से निकलेगा तुरंत मिर्ची लग जाएगी /आग लग जाएगी
पर धर्मनिरपेक्षता है क्या? ये तो बताओ
धर्म से निरपेक्ष ना? या  किसी एक धर्म को फायदा पहुँचाना ?
छोडो तुम जबाब नहीं दे पाओगे। तुम हंगामा कर सकते हो /करवा सकते हो और वो तुम बखूबी कर रहे हो। नोटबंदी के बाद तो अब कोई विकल्प भी नहीं बचा है तुम्हारे पास।  करो या मरो की स्थिति है तुमलोगों के  सामने, अब या तो येनकेन प्रकारेण लोगों को बहका कर/ उकसाकर अपनी अस्तित्व बचा लो ताकी आगे की राजनीति चलते रहे, क्योंकि असली संकट तो यही है तुमलोगों के सामने कि तुम सब लोगों की दुकान बंद ना हो जाये।
और तुम्हे भय है जिस बात का वह होकर रहेगा, क्योंकि अब लड़ाई आर-पार की है।
झुकेंगे नहीं हम,
रुकेंगे नहीं हम ,
कि अब रूक गए तो साँस थम जाएगी,
कि अब झुक गए तो टूट जायेंगे हम। जय हिन्द ((हम हिंदुस्तान मुर्दाबाद तो नहीं बोल सकते भाई, इतने प्रगतिशील/ इतने होनहार छात्र तो हम नहीं बन सकते) @ मनोरंजन 

कविता क्यों ?

क्या करोगे दोस्त कविता लिख कर,
लिखना ही है तो देश को लिखो,
देश बहुत बड़ा है,
उससे भी बड़ी समस्याएं है,
अनेकता में एक कह कर,
बहलाया जाता रहा है/भरमाया जाता रहा है,
रंग/रूप/भेष-भूषा चाहे अनेक है,
हिन्द देश के निवासी सभी जन एक है,
ये सिर्फ कहने की बातें है,
देश के कोने-कोने में,
शोषण/अत्याचार/चालाकी/धूर्तता ही एक है,
जो सब जगह समान है,
जाति /धर्म/भाषा/पहनावा /संस्कृति /संस्कार
भले ही विविधितापूर्ण हो,
पर स्वार्थता/कभी ना ख़त्म होने वाली भूख
सब जगह है,
सब जगह कमज़ोर कुचले जा रहे है,
ताकतवर फलते-फूलते जा रहे है,
लिखना है तो कमजोरों के आँसुओं को लिखो,
लिखो कि अंकुश लगे उन बाजुओं पर,
जो हर वक्त बलात्कार करने को आमदा है,
लिखो कि तुम्हारे शब्द ज्वाला बन कर,
जला डाले हर बेड़ियों को जो पड़े है
आमजन के पैरों में,
लिखो कि  तुम्हारे शब्द वज्र बन कर गिरे
अत्याचारियों पर/धूर्तों पर/चालकों पर,
जो बड़ी तेज़ी से देश के जल, जंगल और जमीं को
खाए जा रहे है अपनी भुख मिटाने के लिए। @ मनोरंजन

Tuesday, February 14, 2017

आदिम गंध

कुछ बातें ऐसी होती है,
जो कही नही जाती सिर्फ़ समझी जाती है,
कुछ रिश्ते ऐसे होते है,
जिनका कोई नाम नही होता,
सिर्फ़ मर्यादा और अभिव्यक्ति होती है,
कुछ लोग ऐसे होते है,
जो अनजान होकर भी जानें- पहचाने से लगते है,
अनायस ही कभी कोई सुगंध,
सांसो से आकर टकराती है,
जो पहले से परिचित होती है,
कोई आवाज़, कोई संगीत, कोई कंपन
कानों में ऐसे गूँज जाती है,जैसे
अभी-अभी किसी ने पुकारा है मुझे,
हर लम्हा, हर पल,
बिलकुल अंजाना सा रहता है,
मगर सब कुछ जान लेने को आतुर,
ये चेहरे और चेहरे के भाव,
आँखों के बोल,
होठों से कही बेहतर,
बेहद स्पस्ट और ईमानदारी से अपनी बात कहाँ देते है,
सिर्फ़ चलने कि अदा/बैठने/बोलने और खड़ा होने का ढंग,
पुरे वयक्तित्व और चरित्र को खोल कर रख देता है,
फिर भी मै,
तुमसे ये नही कहता,
कि मै, तुम्हारे बारे में सबकुछ जान गया हूँ,
या तुम मेरे बारे में सबकुछ जान चुके हो,
मगर एक-दुसरे को जनने की कोशिश अगर है,
तो यह महत्वपुर्ण है,
तुमसे बस इतनी गुजारिश है,
ये कोशिश मत छोड़ना
क्योंकि इस कोशिश में हमारे रिश्ते का,
आगाज और अंजाम निहित है..........
@.मनोरंजन

Monday, February 13, 2017

प्यार ऐसा तो नहीं होता ना ?

वसंतोउत्सव के उपलक्ष में एक कविता तुम्हारे लिए..............
प्यार ऐसा तो नहीं होता ना ?
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रात के तीसरे पहर में,
उठ कर बैठ जता हूँ,
और समने बैठा लेता हूँ,
तुम्हारा साया,
बातें करते हुए तुमसे,
कहता हूँ,
लो खोल कर रख दिया दिल अपना,
पर सच में ऐसा कभी हो नहीं पाया,
एक अनजाने डर और संकोच से,
इन तन्हाइयों में भी,
सच बोलने का हिम्मत ना कर पाया,
और हर बार ही मेरा मन,
असीम पीड़ा और यंत्रणा से भर आया,
तुम्हारे ही व्यक्तित्व को अडा-तिरछा कर,
कई तरह के तस्वीरें बनाता हूँ,
फिर उन तस्वीरों को सजा-संवार कर,
उससे प्रेम करना चाहता हूँ,
मगर उंगलियाँ कांपने लगती है,
और तस्वीर बिगड जाती है,
रोज कोशिश करता हूँ,
मगर तस्वीर कभी पुरा ना कर पाया,
अब ऐसे में मन खिन्न हो जाता है,
क्रोध, दुख और अक्रोश से हर बार गला भर आता है,
छाती के पास कुछ जलने सा लगता है,
मगर उस धुएँ को अंदर ही पीने के प्रयास में,
आँखों में पानी भर आता है,
इस छलके हुए आँसू का कोई कीमत होता है क्या?
क्या ये छलके हुए आँसू उस गैप को भर नहीं पाते,
जिसके तरफ इशारा किया था तुमने
मुझे समझते हुए कि
प्यार किसे कहते है? @मनोरंजन

Friday, February 10, 2017

मर्यादाहीन आचरण का इनाम

मर्यादाहीन आचरण करने वाले नेता जिन्हें कई पार्टियों ने इनाम दिया अब मर्यादा टूटने का रोना रो रहे है.........देखें एक नज़र
भारत सरकार के गृहमंत्री सिख दंगों पर हो रही जाँच के सम्बन्ध में अपनी सरकार की सफाई पेश कर रहे है, तभी एक पँजाबी युवक उठता है और उन पर अपना जूता दे मारता है, आप उस पँजाबी युवक (जरनैल सिंह) को लोकसभा का टिकट देते हो, हार जाता है, फिर विधानसभा के टिकट पर जीत कर दिल्ली प्रदेश का विधायक और एक तथाकथित सबसे स्वच्छ/सबसे ईमानदार पार्टी के सबसे बड़े नेताओं में जगह पा जाता है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में कविता पाठ के आयोजन के नाम पर छात्रों को इकठ्ठा किया जाता है, और वहाँ देश के सुप्रिमकोर्ट जिन आतंकवादियों को मौत की सज़ा सुना चुकी है /राष्ट्रपति उस फैसले पर अपना हस्ताक्षर कर चुके है, ऐसे आतंकवादियों की जयकार करते हो, "कश्मीर जब तक आज़ाद नहीं हो जाता, हमारा संघर्ष जारी रहेगा" "भारत जब तक बर्बाद नहीं हो जाता, हमारा संघर्ष जारी रहेगा" जैसे नारे लगाते हो, और प्रशासन जब आपको अरेस्ट करती है तो आपको दिल्ली से लेकर बिहार तक हीरो बना दिया जाता है, आपके "राष्ट्रनिर्माण" सम्बन्धी अमूल्य/अतुल्य विचारों को सुनने के लिए हजारों युवकों को इकठ्ठा किया जाता है। आपके इस सफलता को देखते हुए कौन अध्ययनरत युवा नहीं सोचता होगा कि यार कलम घिस-घिस कर क्या करना है/ IAS /IPS बन कर क्या करना है जब सिर्फ कुछ उत्तेजक/उग्र/ मर्यादाहीन आचरण करके हम उस जगह पहुँच सकते है जहाँ IAS /IPS हाँथ में फ़ाइल लेकर खड़े रहते है ( उत्तरप्रदेश के पूर्वमुख्यमंत्री मायावती का कथन) तो इतना परिश्रम करके पढने की क्या जरुरत है? लोकसभा चुनाव (2014 ) के दौरान एक शख़्स,(इमरान मसूद) एक पार्टी के प्रधानमंत्री पद के प्रत्यासी का सर कलम करने को कहता है, और सिर्फ इसी एक वक्तव्य से वह अपनी पार्टी के प्रदेश इकाई के सबसे बड़े नेताओं में सुमार हो जाता है, कौन नेता नहीं चाहेगा कि ऐसे ही वक्तव्य देकर वह रातों-रात राजनीति के शिखर पर पहुँच जाए ? एक बाइस साल का युवक( जिसने आरक्षण के वजह से सामान्य कोटे के छात्रों को होने वाली पीड़ा का एहसास भी नहीं हुआ होगा ) वह गुजरात जैसे प्रदेश में पटेल समुदाय के आरक्षण का मुद्दा उठता है, और देखते ही देखते लाखों लोग उसके पीछे खड़े हो जाते है, और उसे देश के हर कोने से राजनीति के धुरंधर अपने गोद में बैठाने/ सर-आँखों पर बैठाने को लालायित हो जाते है, देश के आम युवक क्या सोच रहा होगा? जब सिर्फ कुछ उत्तेजक/उग्र/ मर्यादाहीन आचरण करके हम उस जगह पहुँच सकते है जहाँ IAS /IPS हाँथ में फ़ाइल लेकर खड़े रहते है तो क्यों पढना है? क्यों अपनी आधी उम्र पढ़ाई में व्यर्थ करना है? ऐसे ना जाने कितने उदहारण है, योगी आदित्यनाथ, संगीत सोम, साक्षी महाराज, अरविन्द केजरीवाल के पार्टी का हर नेता इसी शॉर्टकट का प्रयोग करके देश के करोड़ों लोगों के नुमाइंदी करते है फिर मर्यादा क्यों?
आज हर कोई जल्दी में है, किसी के पास इतना धैर्य नहीं है कि चालीस-पचास सालों(अटल-आडवाणी की तरह) तक अपने क्षेत्र के लोगों का प्रतिनिधित्व करो, संसद में मर्यादा का पालन करो, लोगों के नज़रों में एक स्वच्छ छवि बनाओं, इतना समय नहीं है। जो करना है, अभी करना है, किसी भी कीमत पर करना है। आप मर्यादा की बात करते हो? आप संसद के नाम पर इसे गाली कहते हो और पीछे जो-जो घटनाएँ हुई, जिसे महिमामंडित किया गया/इनाम दिया गया और इस तरह इस ओच्छी राजनीति की परिपाटी शुरू हुई, उसे भूल जाते हो? क्यों भूल जाते हो?
अब तो वक्त वही आ गया है कि आप इतना जोर से बोलो कि बाकी सबकी आवाज दब जाए, सिर्फ तुम्हारी आवाज सुनाई दे, तब ही आप सफल हो सकते हो।
और सच पुछो तो इस मर्यादा/अमर्यादा से राजनीति के "धंधे" से जुड़े किसी नेता को कोई तकलीफ़ नहीं है, सब अपनी-अपनी बारी के इंतेज़ार में, जब जिसको मौका मिलता है मर्यादा तोड़ देता है।
ये सब तो हम करोड़ों ज़ाहिल लोगों के भावनाओं से खेलने के लिए प्रोपेगेंडा किया जाता है कि देखो उसने "मर्यादा" तोडा तुम करोड़ों लोग थूको उस पर ताकि हम शासन में आकर "मर्यादा" तोड़ सके। तो अपने को भी अब ज्यादा टेंसन नहीं लेना है, मदाड़ी का खेल चल रहा है, मज़ा लो ,आनंद उठाओ @ मनोरंजन कुमार तिवारी

Tuesday, February 7, 2017

एक लड़की शहर में

एक लड़की शहर में
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जीवन के थोड़े समय में ही,
ढेर सारी उपलब्धियों को,
सहेजती उस लड़की से मिलकर लगता है की,
सचमुच सिख लिया है उसने,
हर स्याह-ओ-सफ़ेद हर्फों को,
अपने आँखों में छुपाने की कला,
सिख लिया है उसने,
इस महानगर के भीड़ में ख़ुद के लिए,
एक मुकम्मल जगह तलासने की कला,
समझती है वह हर निगाहों की भाषा,
और उन निगाहों को अपने फायदे के लिए,
इस्तेमाल करने का गुर भी जानती है,
सिखा है उसने अपने जीवन के थोड़े समय में ही बहुत कुछ,
जो दिखता है उसकी अनुभवशील, चमकीली आँखों में,
सिखा है उसने अँधेरे में चलना,
और उजाला बिखेरने की कला,
आता है उसे अपने आँसुओं को ज़ब्त करना,
और मुस्कुराहटों पर भी सहज नियंत्रण है उसका,
जानती है, कब मुस्कुराना है और कब नहीं,
पूरा हिसाब लगाने के बाद ही,
खिलती है मुस्कराहट, उसके मुखमंडल पर,
जानती है वो इसकी कीमत,
इसलिए जया नहीं करती अपनी मुस्कुराहटों को,
यों ही छोटी-छोटी बातों पर,
छोटे-मोटे लोगों के लिए।@ मनोरंजन

Saturday, February 4, 2017

शर्मिला

शर्मिला
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शर्मिला नाम है उसका,
पिछले पाँच साल से ब्याहता  है,
पर अपने पति के पास नहीं गई अभी तक,
माँ, इस दुनियां से विदा ले चुकी है,
पिता बावले,
अपने रहमदिल मगर सीधे-साधे,
चाचा के पास रहती है दिल्ली में,
चाची उसकी बहुत चंट है,
कहती है,
जब तक लड़का नौकरी नहीं पकड़ लेगा,
विदा नहीं करेगी शर्मीला को,
घर में एक बेसिक फोन लगा है,
मौका पाकर  कभी-कभी,
अपने पति से बात कर लेती होगी शर्मिला,
आज बात करते हुए मैंने सुन लिया,
शर्मिला के चेहरे पर शर्म नहीं खौफ के निशां थे,
सहमते हुए सिर्फ इतना ही कह सकी,
भैया, चाची को मत बताना,
आज पहली बार ही फोन किया था मैंने। @ मनोरंजन

Thursday, February 2, 2017

साहित्यकार धंधा नहीं करते........

हम भगवान /ईश्वर/अपने ईस्ट देव पर आस्था रखते है, मंदिरों में जा कर, पुजा-अर्चना करते है, चढ़ावा देते है
पर मंदिरों में कितने प्रतिशत पुजारी ऐसे है जो वास्तव में भगवान /ईश्वर/अपने ईस्ट देव पर आस्था रखते है?
हमारे-आपके लिए मंदिर पवित्र जगह होती है, वही पुजारियों के लिए मंदिर उनके धंधा करने की दुकान होती है।
ऐसा सिर्फ मंदिरों/मस्जिदों/चर्चों  में ही नहीं होता, हर जगह होता है,
देश के सीमाओं पर सेवा करने वाले सैनिक होते है, मगर धंधे करने वाले पुजारी वहां भी होते है(बड़े ओहदे पर), उनके लिए  देश की सुरक्षा/ देशवासियों की सेहत कोई मायने नहीं रखती, वे अपने धंधे के साथ कभी, कोई समझौता नहीं करते। ये बातें फ़िल्मी नहीं है, पंजाब के बार्डर पर खुफिया नज़र  रख कर  इस बात की खबर ली जा सकती है। कोई भी अंबानी/माल्या क्रिकेट के दीवाने नहीं होते, वे सिर्फ क्रिकेट रुपी धर्म के भक्तों के जज्बातों से धंधा करना जानते है।
यह देश एक मंदिर है, अरबों लोग इसके भक्त है, मगर इस देश रुपी मंदिर के पुजारी उतने ही धंधेबाज है जितने आम मंदिरों के पुजारी।
पुजारियों का कर्म है धंधा करना, हमारा कर्म है भक्ति करना, दिक्कत तब होती है जब हम पुजारियों पर उंगली उठाना शुरू करते है।
पुजारी नहीं चाहते कि उनके धंधे की पोल खुले, क्योंकि इससे लोगों के आस्था पर प्रतिकूल असर पड़ेगा, धंधा कमजोर हो जायेगा।
 देश/समाज निरंतर बदलाव को अग्रसर रहता है, अपने दुर्गुणों से मुक्त होकर पारदर्शी बनने/ अच्छी बातें अपनाने को उद्दत रहता है, मगर उसे ऐसा करने के लिए
समाज के कुछ जागरूक लोगों के मार्गदर्शन की जरूरत पड़ती है, इन्ही जागरूक लोगों को साहित्यकार कहते है, जो समाज को/ देशवासियों को उँगली उठाना सिखाते है। साहित्यकार धंधा नहीं करते, और जो धंधा करने लगते है वे साहित्यकार नहीं रह जाते, धंधेबाज बन जाते है। @मनोरंजन

ग़ज़ल

रिश्तों के बीच जमी बर्फ की परत पिघले,
कोई नरम धूप सा मुस्कराता क्यों नहीं?
दिखता है साफ़ कि कोई गिर रहा है बोझ से डगमगा कर,
लपक कर थामने को हाथ कोई बढ़ाता क्यों नहीं?
ये जरूरी तो नहीं कि अपने अपमान का बदला लिया ही जाए,
उस पीड़ा को/कड़वाहट को कोई भूल जाता क्यों नहीं?
सिर्फ एक ज़िद/एक हवस की खातीर,
तोड़ कर बिखेर देता है मोतियों की माला,
कोई जाकर फिर वापस आता क्यों नहीं ? (क्रमश:) @ मनोरंजन