हम भगवान /ईश्वर/अपने ईस्ट देव पर आस्था रखते है, मंदिरों में जा कर, पुजा-अर्चना करते है, चढ़ावा देते है
पर मंदिरों में कितने प्रतिशत पुजारी ऐसे है जो वास्तव में भगवान /ईश्वर/अपने ईस्ट देव पर आस्था रखते है?
हमारे-आपके लिए मंदिर पवित्र जगह होती है, वही पुजारियों के लिए मंदिर उनके धंधा करने की दुकान होती है।
ऐसा सिर्फ मंदिरों/मस्जिदों/चर्चों में ही नहीं होता, हर जगह होता है,
देश के सीमाओं पर सेवा करने वाले सैनिक होते है, मगर धंधे करने वाले पुजारी वहां भी होते है(बड़े ओहदे पर), उनके लिए देश की सुरक्षा/ देशवासियों की सेहत कोई मायने नहीं रखती, वे अपने धंधे के साथ कभी, कोई समझौता नहीं करते। ये बातें फ़िल्मी नहीं है, पंजाब के बार्डर पर खुफिया नज़र रख कर इस बात की खबर ली जा सकती है। कोई भी अंबानी/माल्या क्रिकेट के दीवाने नहीं होते, वे सिर्फ क्रिकेट रुपी धर्म के भक्तों के जज्बातों से धंधा करना जानते है।
यह देश एक मंदिर है, अरबों लोग इसके भक्त है, मगर इस देश रुपी मंदिर के पुजारी उतने ही धंधेबाज है जितने आम मंदिरों के पुजारी।
पुजारियों का कर्म है धंधा करना, हमारा कर्म है भक्ति करना, दिक्कत तब होती है जब हम पुजारियों पर उंगली उठाना शुरू करते है।
पुजारी नहीं चाहते कि उनके धंधे की पोल खुले, क्योंकि इससे लोगों के आस्था पर प्रतिकूल असर पड़ेगा, धंधा कमजोर हो जायेगा।
देश/समाज निरंतर बदलाव को अग्रसर रहता है, अपने दुर्गुणों से मुक्त होकर पारदर्शी बनने/ अच्छी बातें अपनाने को उद्दत रहता है, मगर उसे ऐसा करने के लिए
समाज के कुछ जागरूक लोगों के मार्गदर्शन की जरूरत पड़ती है, इन्ही जागरूक लोगों को साहित्यकार कहते है, जो समाज को/ देशवासियों को उँगली उठाना सिखाते है। साहित्यकार धंधा नहीं करते, और जो धंधा करने लगते है वे साहित्यकार नहीं रह जाते, धंधेबाज बन जाते है। @मनोरंजन
पर मंदिरों में कितने प्रतिशत पुजारी ऐसे है जो वास्तव में भगवान /ईश्वर/अपने ईस्ट देव पर आस्था रखते है?
हमारे-आपके लिए मंदिर पवित्र जगह होती है, वही पुजारियों के लिए मंदिर उनके धंधा करने की दुकान होती है।
ऐसा सिर्फ मंदिरों/मस्जिदों/चर्चों में ही नहीं होता, हर जगह होता है,
देश के सीमाओं पर सेवा करने वाले सैनिक होते है, मगर धंधे करने वाले पुजारी वहां भी होते है(बड़े ओहदे पर), उनके लिए देश की सुरक्षा/ देशवासियों की सेहत कोई मायने नहीं रखती, वे अपने धंधे के साथ कभी, कोई समझौता नहीं करते। ये बातें फ़िल्मी नहीं है, पंजाब के बार्डर पर खुफिया नज़र रख कर इस बात की खबर ली जा सकती है। कोई भी अंबानी/माल्या क्रिकेट के दीवाने नहीं होते, वे सिर्फ क्रिकेट रुपी धर्म के भक्तों के जज्बातों से धंधा करना जानते है।
यह देश एक मंदिर है, अरबों लोग इसके भक्त है, मगर इस देश रुपी मंदिर के पुजारी उतने ही धंधेबाज है जितने आम मंदिरों के पुजारी।
पुजारियों का कर्म है धंधा करना, हमारा कर्म है भक्ति करना, दिक्कत तब होती है जब हम पुजारियों पर उंगली उठाना शुरू करते है।
पुजारी नहीं चाहते कि उनके धंधे की पोल खुले, क्योंकि इससे लोगों के आस्था पर प्रतिकूल असर पड़ेगा, धंधा कमजोर हो जायेगा।
देश/समाज निरंतर बदलाव को अग्रसर रहता है, अपने दुर्गुणों से मुक्त होकर पारदर्शी बनने/ अच्छी बातें अपनाने को उद्दत रहता है, मगर उसे ऐसा करने के लिए
समाज के कुछ जागरूक लोगों के मार्गदर्शन की जरूरत पड़ती है, इन्ही जागरूक लोगों को साहित्यकार कहते है, जो समाज को/ देशवासियों को उँगली उठाना सिखाते है। साहित्यकार धंधा नहीं करते, और जो धंधा करने लगते है वे साहित्यकार नहीं रह जाते, धंधेबाज बन जाते है। @मनोरंजन
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