Followers

Tuesday, January 12, 2016

क्षणिकाएँ

1. 
चेहरे पर कहाँ लिखी होती है,
सफ़ेद लोगों के साज़िशों की बद्ख्यालियाँ,
चेहरे पर तो बदनशिबों के,
अँधेरे जीवन की लकीरें खिंची होती है।@मनोरंजन
2.
तुम समझो ना,
उनकी भी बेबसी,
जो बातों में मिश्री घोल कर,
तुम्हारे बर्बादी की साज़िश करते है।@मनोरंजन
3.
एक चिड़िया है,
एक बच्चा है,
बच्चे के हाथ में एक धागा है,
उस धागे का दूसरा सिरा चिड़िया के पैरों में बाँधा है,
चिड़िया फुदकती है तो,
बच्चा हँसता है, ताली बजाता है,
चिड़िया अब फुदकना बंद कर शांत हो गई है,
बच्चा बेज़ार होकर रो रहा है।@ मनोरंजन

4.
जिन्दगी के टुकड़े बहुत दूर-दूर पर पड़े है भाई.......
समेटने-सहेजने और संवारने में तो मुश्किल होगा ही।@मनोरंजन

5.
क्या हुआ था, क्यों हुआ था,
कुछ याद नहीं रहता है,
जब सोचता हूँ,
तुम्हारे साथ अपने आखिरी मुलाकात के लम्हे।@मनोरंजन

6.
दिन भर चलने के बाद सायं को कहीं ना पहुँचाने का दर्द तुम नहीं समझ सकते बाबु......
तुम्हे दूसरों के कंधे पर बैठ चलने की आदत जो हो गई है।@ मनोरंजन
7.
बाबा रे......जीस आदमी को कुछ भी नहीं करना होता है, उसकी थिंकिंग एबिलिटी कितनी बढ़ जाती है.......वह एक साथ कई बातों को सोच लेता है, कितने आइडिया आते है ऐसे लोगों के दिमाग में।@ मनोरंजन
8.
शैतानों के भीड़ में कहीं भगवन भी होते है,
पढ़ लेते है चेहरे का दर्द और 
उन आसुंओं से भीग जाते है,
जो आँखों में ही कहीं सूख जाते है,
बढ़ा देते है अपना हाथ थामने को उसे,
जो बस बदहवास हो गीरने को होता है,
हाँ, भगवान है
यहीं कहीं हमारे बीच ही रहते है।@ मनोरंजन


देश की व्यथा

काम करो प्रधानमंत्री जी,
जो जमीं पर दिखने लगे,
हवा में उड़ते बोल से कोई फायदा नहीं,
मीडिया में, टीवी पर चाहे कितना भी कह लो,
भारत की साठ प्रतिशत आबादी आज भी,
अपने घर में पकने वाले या ना पकने वाले खाना को ही देखती है,
काम करो प्रधानमंत्री जी,
जो इन साठ प्रतिशत से भी ज्यादा भारतवंसियों के,
आँगन में दिखे, रसोई में दिखे, चूल्हें पर दिखे,
काम करो प्रधानमंत्री जी,
सम्राज्य स्थापित करने को उतावली में,
देश की आत्मा को मत भूलो,
यहाँ सम्राज्य स्थापित उसी ने किया है,
जो लोगों के दिलों में उतर जाता है,
दिमाग में कुछ भी भर देने से कुछ नहीं होगा,
काम करो प्रधानमन्त्री जी,
ऐसा की मौकापरस्तों के मुँह बंद हो जाये,
अपने जोकरों के जुमलों पर रोक लगाओ प्रधानमंत्री जी,
ऐसी बातों से भारत के नब्बे प्रतिशत से भी ज्यादा लोग,
इत्तेफ़ाक नहीं रखते,
काम करो प्रधानमंत्री जी,
जो चन्दन की खुशबू सी महके,
हम तो आपको ही पसंद करते है,
आपके तरफ ही आशा, उम्मीद और विश्वास से देखते है,
आज जो जीता है,
वह चन्दन(नितीश) है,
क्या फर्क पड़ता है की
उससे कितने सांपनाथ और नागनाथ लिपटे है,
उसने अपनी खुशबू जमीं पर, फिजाओं में बिखेरी है,
हम उनसे ज्यादा आशा भी नहीं कर रहे,
हम तो आपसे आशा करते है की,
काम करो प्रधानमंत्री जी,
जिससे आप चन्दन बन जाओ और,
आपकी खुशबू देश के फिजाओं में महके,
जमीं पर दिखे,
फिर आपसे भुजंग भी लिपटे रहे तो हमें परवाह नहीं होगा,
हम आपके समर्थक है,
इसलिए कहते है,
काम करो प्रधानमंत्री जी।@मनोरंजन

क्षणिकाएँ

भक्त और भगवान में बहुत फर्क होता है,
भक्त पाकर खुश होता है, भगवान देकर खुश होता है
...........
बस उलझ तब जाता हूँ जब तुम्हे सोचता हूँ।
तुममें सारे गुण भक्तों वाले है पर तेवर भगवानों वाले है,
मुझमें सब गुण भगवान वाले है तो तेवर भक्तों वाले क्यों है? @ मनोरंजन

क्षणिकाएँ

लंगड़ा घोडा और गदहा, दूलाती जरूर मरता है और आस-पास में कुछ और लंगड़े घोड़े और गदहे हों तो आवाज आती है.....क्रन्तिकारी....बहुत क्रन्तिकारी प्रयास है।@मनोरंजन

क्षणिकाएँ

मैं प्यासा बहुत हूँ,
पर जाता नहीं किसी कुँए के पास,
मुझे डूब जाने का डर बहुत लगता है।@ मनोरंजन

क्षणिकाएँ

तुम तक जाती कोई राह बची हो तो,
मेरा रब, मुझे वह राह दिखाए,
नफरतों से अकड़ गया हूँ सूखे, बेज़ान शाखों की तरह,
मेरी जड़ों में, तुम्हारे प्रेम की नमी भर जाए,
मेरा रब, मुझे तुम तक पहुँचने की कोई तरक़ीब बताए। @मनोरंजन

भारतीय जनतंत्र

भारतीय जनतंत्र,
क्या मदाड़ियों के डमरू के आवाज़ पर करतब दिखता बंदर बन कर रह जायेगा?
सँपेरा (साँपों के विषदंत निकाल कर अपराधिक कृत्य करने वाला) हमें इसतरह प्रभावित करता रहेगा और हम मुग्ध होकर,तमाशबीन बन कर कब तक देखते रहेंगे?
ये तरह-तरह के खेल दिखा कर आम जनों को मुग्ध करने वालों का दौर क्या कभी नहीं थमेगा?
हम कब इन करतबों से हट कर अपने बेहतरी के बारे में सोचेंगे?
ना, ऐसा मत कहो की फर्क नहीं पड़ता,
बहुत फर्क पड़ता है सरकारों के द्वारा आम जन के जीवन को बहुत प्रभावित किया जाता है। @मनोरंजन

उच्छ्वास

मैं सिर्फ तुमसे ही दूर नहीं हुआ हूँ,
बल्कि मेरी दुनिया के हर उस अच्छे शख़्स से दूर हो गया हूँ,
जो मेरे लिए कुछ अच्छा कर सकते थे,
मुझमें आत्मविश्वास, उत्साह और उमंग का संचार कर सकते थे,
कोशिश करता हूँ जुड़ने की ऐसे अच्छे इंसानों से,
मगर मुझे छींके आने लगती है,
तुम्हारे बाद अच्छाइयों से एलर्जी हो गई है शायद। @मनोरंजन

पता नहीं क्यों?

पता नहीं क्यों?
==========
पता नहीं क्यों,
मगर जब भी, मेरे जीवन के,
भुली हुई स्मृतियों में से,
कोई बहुत ही सुन्दर सी, रोचक और प्यारी सी,
बात मेरे जेहन में आ जाती है,
तो उसे तुम्हे बताने की उत्कट अभिलाषा होती है,
जिसे सुन कर तुम्हारे होठों पर,
बिल्कुल बच्चों सी,
निश्छल, निर्मल मुस्कुराहट कौंध जाए,
मैं सोचता हूँ रात-रात भर,
ढुंढ़ता हूँ वो किस्से,
जिसे सुना कर तुम्हारे होठों पर,
उस उन्मुक्त मुस्कुराहट हो देख सकूँ,
जिसे देखने के लिए तरसता रहा हूँ हर पल।
पता नहीं क्यों,
मगर जब भी मेरे जीवन की,
गहरे दुख, पिडा, उदासी और निराशा
भरे लम्हे, मुझे असीम दर्द,
के गहराइयों में दुबोने लगते है,
तो वो बात तुम्हे बताने की,
बेचैनी सी हो जाती है,
पता नहीं क्यों मगर,
तुम्हारे आँखों में,
अपने लिए दर्द, सहानुभूति और फिक्र,
देखने की ललक सी लगी रहती है मन में।
पता नहीं क्यों मगर,
हजार परेशानियों के बीच भी,
तुम्हारे लिए परेशान होने को,
कुछ रह जाता है मन में,
और जब तक रात ढलने तक,
तुमसे बात ना कर लूँ,
हर पल लगता है,
कहीं परेशान होगी तुम,
कुछ बुरे से ख्वाब भी आते है,
की कहीं अकेले में बैठी रो रही हो तुम,
पता नहीं क्यों मगर,
ये सोच कर मन इतना व्यग्र हो जाता है की,
भूल जाता हूँ वो सब कुछ,
जो गुस्से में मैने कहा था,
तुमने कहा था,
भूल जाता हूँ वो सारे प्रण,
जो तुमसे बात ना करने के बरे में होता,
भूल जाता हूँ वो सारे वादे,
जो खुद से, और तुमसे किए होते है,
तुम्हे और ज्यादे परेशान ना करने के बारे में।
पता नहीं क्यों मगर,
जिन्दगी चल तो रही है बदस्तूर,
मगर जीने का एहसास नहीं होता तुम बिन।..........................मनोरंजन

उच्छ्वास

बनावटी भावनाओं को अभिव्यक्त करना निषेद्ध है 
----------------------------------------------------
बहुत भौंडी सी लगने लगती है,
ये बनावटीपन /ये झूठ 
जीवन को खोखला बनाना शुरू कर देता है,
दुःख, परेशानियां, आत्मग्लानि
पुरे व्यक्तित्व के साथ चप्पा हो जाते है,
---------------------------------------------
हम पैदा तो नहीं हुए थे ऐसे वृत्तियों के साथ @मनोरंजन

जीवन साथी

जीवन साथी 
----------------
माँ के रुग्णावस्था से,
दुःखी तो शायद सभी है घर में,
मगर एक शख़्स ऐसे है जिनकी,
जिंदगी ठहर गई है माँ के बिस्तर के आस-पास,
हाँ, मैं बाबा की बात कर रहा हूँ,
बाबा ने कभी सिखा ही नहीं माँ के बिना जीना,
हर छोटे-बड़े काम के लिए,
माँ के साथ वाकयुद्ध के लिए अभ्यस्त बाबा,
सुन्न बैठे रहते है शायद इस इन्तजार में,
की कब माँ आकर बड़बड़ाएगी,
तो वे उठ कर खड़े होंगे,
बाहर दालान में सोते हुए रात में कई बार,
माँ के कमरे के खिड़की पर जाकर आवाज़ लगते है,
माँ अंदर से आवाज़ दे देती है तो,
"जिंदा है" ये अश्वस्थ होकर फिर सो जाते है,
आँगन में खुलने वाले गेट को,
बंद करने की कई बार हिदायद देने वाले बाबा,
इधर कुछ दिनों से इसे खुला छोड़ देने को कह रखे है,
जब खिड़की से आवाज़ देने पर जबाब नहीं देती माँ,
तो अंदर जाकर माँ के नाक के नीचे अपनी अँगुली रखते है,
फिर धड़कनों को सुनते है,
हाथों को अपने हाथों में लेकर बैठे रहते है काफी देर तक,
क्या अब घर में चोर के घुस आने का,
या घर के लूट जाने का कोई परवाह नहीं होता होगा उन्हें?
जिसकी पुरी दुनिया ही लूटी जा रही हो उनके आँखों के सामने,
उन्हें नींद आती भी होगी? संदेह है मुझे,
बेअसर होती दवाईयों के पुर्जे को उलटते-पुलटते,
अपने आप से ही कुछ कहते है,
दिन भर में कई लोगों से फोन पर,
माँ के मर्ज और दवाईयों के चर्चे करते,
बड़े ही कातर स्वर में कहते है,
"एक बार डॉक्टर से कह के देखो ना,
कोई फायदा नहीं हो रहा है उनके दवाईयों का,
बाबा अब गुस्सा नहीं होते,
जैसे माँ अपने साथ उनके गुस्से को लिए जा रही है,
बाबा अच्छी तरह जानते है की माँ को बचाया नहीं जा सकता,
पर फिर भी उनकी कोशिशों में कोई कमी नहीं कहीं,
माँ तो एक दिन मौत के नींद सोयेगी,
पर उसके साथ रोज हजार मौत मरते बाबा को देख कर लगता है,
इसे ही जीवन साथी कहते है शायद। @ मनोरंजन

प्रार्थना सर्वशक्तिमान से

सर्वज्ञ/सर्वव्यापी /सर्वशक्तिमान-------
अगर आप हो वाकई तो,
देखो नीचे/ अपनी रचनाओं को,
अपने सृजन को देखो गौर से,
आपने पेड़-पौधों का सृजन किया,
धरती का/ आकाश का सृजन किया,
हवा/पानी/प्राकृतिक सम्पदा/सौंदर्य
जीव-जन्तु /जानवर/पक्षी
नदियाँ/ सागर/ग्रह/उपग्रह/तारें
सब खुबसूरत/हसीन/जहीन बनाया आपने,
और अपना सबसे नयाब सृजन जिसे समझते होंगे आप,
वो इंसान भी गढ़ा आपने,
पर आपका ये नयाब सृजन ही दोषपूर्ण है,
दोषपूर्ण?
मैं तो कहता हूँ पुरी की पुरी आफत ही बना दी है आपने,
कितना सब भर दिया है आपने इस छोटी सी रचना में,
प्रेम भरा और दर्द भी/ इर्ष्या/ द्वेष/नफ़रत/और पछतावा भी
मिलना, संग जीना और फिर बिछड़ना भी,
क्या आपको उस दर्द का अंदाजा होगा?
जिस दर्द को सालों तक साथ जीने वाले लोग,
बिछड़ने के बाद सहते है,
नहीं आपने जरूर गलती की है,
और जो गौर से देखेंगे तो,
निश्चय ही खुश नहीं होंगे आप अपने नयाब सृजन से,
आपके नायब सृजन में इतना बड़ा दोष होगा,
इसका अंदाजा शायद आपको भी नहीं होगा,
काश आपने हमें भी पेड़-पौधों की तरह ही बनाया होता,
या जीव/जंतुओं/पशुओं की तरह ही बनाया होता,
ये प्रेम/स्नेह/करुणा/ममता
ना मिलती, ना सही,
पर ये दर्द...... ये दर्द बहुत असह्य है प्रभु। @ मनोरंजन

मैं और तुम

मैं और तुम 
हर बार हम बनने को मिलते है,
हमारे अहम से टकरा कर,
हम चकनाचूर हो जाता है,
और इसके अणु पुरे ब्रह्मांड में बिखर जाते है,
एक लम्बे समयांतराल के बाद,
फिर से एक जगह जुड़ने लिए,
मैं और तुम मिलते है,
मगर एक-दूसरे को मिटाने लिए,
और ये सही भी है,
क्योंकि जब तक मैं और तुम ख़त्म नहीं हो जायेंगे,
हम आकार नहीं ले सकेगा,
मैं और तुम बात नहीं करते एक -दूसरे से,
मगर हम बात करना चाहते है,
मैं तुमसे बात इसलिए नहीं करता की,
मैं जनता हूँ, मेरी आवाज़ नहीं पहुँच पाएगी तुम तक,
तुम, मुझसे बात इसलिए नहीं करती की,
तुम चाहती हो की मैं झुकूँ तुम्हारे ज़िद के आगे,
मैं और तुम एक दूसरे से प्यार नहीं करते,
बल्कि नफ़रत करते है इतना,
जितना और कोई नहीं करता,
ना मुझसे, ना तुमसे,
पर फिर भी हम मिलते है,
ताकि एक-दूसरे को जला कर राख कर सकें,
पर अफ़सोस की ऐसा हो नहीं पाता पूरी तरह,
मैं और तुम फिर से बिखर जाते है टुकड़ों में
इसलिए हम नहीं बन पाते। @मनोरंजन

प्यास

जी लेने दो मुझे आज,
कि बहुत दिनों से जीने की भूख लगी है,
मर रहे थे मेरे मन के सारे सुक्ष्म एहसास,
उनके लाशों को दफ़न करने में व्यस्त बहुत था,
फिर खो गया किसी मायावी रोशनी के चकाचौंध में,
रास्ता भटक गया था,
पहुँच गया था एक ऐसे देश में,
जहाँ झूठ हाथ में लाउडस्पीकर लिए जोर-जोर से चीख रहा था,
सच बोलने वालों ने अपने कान पर हाथ दबा लिए थे इसकदर,
कि उनके मुँह से सच निकलने के वजाय कराहें निकल रही थी,
सब लाउडस्पीकर वाले को ही सच का मसीहा मान बैठे थे,
मानवीय संवेदनाओं, समाजिक मूल्यों, राजनैतिक गरिमा को,
लोग पैरों तले कुचलते दौड़े जा रहे थे,एक ऐसी जगह,
भव्य सजावटों वाले मैदान में, आलिशान शानो-शौकत से,
ढोंग, पाखंडों,और धूर्तों के हाथों,
नैतिकता, मर्यादा और आदर्शों पर कोड़े बरसाए जा रहे थे,
लोग ख़ुशी में चिल्ला रहे थे,
अपने बच्चों के कानों में कोड़े बरसाने वालों की,
बीरता, शौर्य और सफलता के किस्से दुहरा रहे थे,
और बच्चे अपने मसीहों की तरह बनने के ख्वाबों में गुम हो रहे थे,
लाओ, वो मेरा आखिरी कनस्तर,
जिसमें जीने के लिए कुछ टुकड़े परिश्रम के रखे थे,
जी लेने दो मुझे आज,
कि बहुत दिनों से जीने की भूख लगी है। @ मनोरंजन

Sunday, January 10, 2016

माँ के चले जाने के बाद

माँ के चले जाने के बाद......
-----------------------------------
रोया नहीं एक बार भी,
एक बूँद भी आँसू  बहा नहीं,
माँ के चले जाने के बाद,
माँ ने बहा दिए होंगे मेरे हिस्से के सारे आँसू,
पर अब माँ नहीं है, मैं हूँ यहीं,
और वैसा ही हूँ, जैसा पहले था,
हिसाब-किताब का कच्चा, बचत और भविष्य से लापरवाह,
भावुक, कमजोर और संवेदनशील,
और ये दुनिया भी वैसी ही है, जैसी पहले थी,
निष्ठुर, स्वार्थी और  संवेदनहीन,
इससे अब निपटना होगा मुझे खुद ही,
जनता हूँ कटना पड़ेगा मुझे कदम-कदम पर,
लहू -लुहान होते रहेगा मेरा जमीर,
क्योंकि मेरा ढाल बनने वाला अब कोई ना होगा,
मेरी हर कमज़ोरी को अपने आँसुओं से  ताकतवर,
बना देने वाला कोई नहीं होगा,
घर, परिवार और दुनियादारी,
नाते-रिश्ते और पट्टीदारी,
एक-दूसरे से ऊँचा और बेहतर कहलाने की होड,
और इस होड़ में अकेला पड़ते मुझे,
"तू इतना मत सोच बेटा"
कहने वाला कोई नहीं होगा,
सब इस होड़ में घसीटेंगे मुझे,
रोना तो पड़ेगा ही मुझे आज नहीं तो कल,
क्योंकी मन की वो सारी बातें जो मैं कह नहीं पाता,
उसे जानने वाला और उसे कह कर,
इस होड़ से मुझे साफ़ बचा कर,
मुझे सबसे ऊपर कर देने वाला अब कोई नहीं होगा। @मनोरंजन